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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अथवा मानो ऐसे निखिल । मैं पनका मिलता है फल । सेवन करती लता वेल । क्रमयोगका वह ॥ १८ ॥ क्रमयोगी चक्रवर्तिके मुकुट पर । रहता है चिद्घन मैं ऐसा अलंकार । अपनी जीव-दशा मुझे अर्पण कर । पाया उपलक्षमें ॥ १९ ॥ क्रमयोग प्रासादका । कलश जो है मोक्षका । उसके अवकाशका । हुवा जो विस्तार ॥ १२२० ॥ इस संसारके अरण्यमें । क्रमयोगकी इस राहमें । जुड जाता मदैक्य ग्राममें । चलने पर जो ॥ २१ ॥ अथवा क्रमयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ । पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ २२ ॥ यहां तक जो सुवर्म । क्रमयोगकी महिमा । तुझसे कहते हम । बार बार ॥ २३ ॥ देश काल और पदार्थ । साधके मुझे पाना पार्थ । ऐसा नहीं मैं हूं समस्त । सबका हूं सर्वस्व ॥ २४ ॥ इसलिये हे मदर्थ । न करना कुछ पार्थ । मिलता हूं मैं सतत । इस उपायसे ॥ २५ ॥ गीताकी महत्ताका कथन- एक शिष्य एक गुरु । रूढ यह व्यवहार । यह मत्प्राप्ति प्रकार । जाननेमें ॥ २६ ॥ वसुधाके उदरमें अर्जुन । रखा रहता है सिद्ध निधान । या अग्निका काठ दूधका स्तन । स्थान है जैसे ॥ २७ ॥ स्वभाव सिद्ध ही यह होता । किंतु उपायसे ही मिलता । सिद्ध जो होता वही मिलता । वैसा ही मैं ॥ २८ ॥ फल कहने पर क्या उपाय । कहता है यहां श्रीकृष्णराय । इसको कहनेका अभिप्राय । यहां है ऐसे ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८१८

गीतार्थकी है श्रेष्ठता । मोक्षोपायही है पूर्णता । न अन्य शास्त्रसा होता । प्रमाणसिद्ध ॥ १२३० ॥ वायु जैसे बादल हटाता । सूर्यको वह नहीं बनाता । या हाथ जलकुंबी हटाता । न बनाता नीर ॥ ३१ ॥ आत्म-दर्शनके आड सकल । रहता है जो अविद्याका मल । नाशते हैं शास्त्र वह निर्मल । तब मैं प्रकाशता ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो सभी शास्त्र । अविद्या नाशके हैं पात्र । किंतु नहीं है वे स्वतंत्र । आत्म-बोधमें ॥ ३३ ॥ जहां तक अध्यात्म शास्त्रकी बात । उसकी सच्चाईका प्रश्न निश्चित । आता है तब अंतिम यह गीता । शास्त्र है श्रेष्ठ ॥ ३४ ॥ प्राची जैसे सूर्यसे विभूषित । करती दिशा सतेज सतत । वैसे शास्त्रेश्वर गीता सनाथ । करती शास्त्रोंको ॥ ३५ ॥ बोले हैं ऐसे ये शास्त्रेश्वर । पीछे ही उपाय सविस्तर । जिससे हाथसे ले उठाकर । आत्मतत्व ॥ ३६ ॥ किंतु प्रथम वचनको अर्जुन । न स्वीकारें यदि तत्व अर्जुन । इस विचारसे हो सकरुण । कहता है श्रीहरि ॥ ३७ ॥ वही प्रमेय इस अवसर । शिष्यको करनेके लिये स्थिर । कह रहा है फिर एक बार । यहां श्रीकृष्ण ॥ ३८ ॥ प्रसंग भी है गीता-ग्रंथ । मुक्तायका आया साथ । तभी है दिखाता साद्यंत । एकार्थत्व ॥ ३९ ॥ गीताग्रंथ मध्य-भागमें । नाना अधिकार प्रसंगमें । अनेक सिद्धांतके रूपमें । किया निरूपण ॥ १२४० ॥ वहां जो है सब सिद्धांत । इस शास्त्रमें हैं प्रस्तुत । परंपरासे हो अज्ञात । मानेगा कोई ॥ ४१ ॥ उस महासिद्धांतके अंतर्गत । आ गये हैं अन्य अनेक सिद्धांत । उन सबके साथ ग्रंथ समाप्त । करता है श्रीहरि ॥ ४२ ॥ ८१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

अविद्या-नाशका है स्थल । जिससे है मोक्ष प्राप्तिका फल । इन दोनों विषयोंका केवल । साधन है ज्ञान ॥ ४३ ॥ इतने ही हैं जो नाना प्रकार । कहे हैं ग्रंथ विस्तार कर । उसीको अल्पमें चक्रधर । कहता है अब ॥ ४४ ॥ तभी साध्य प्राप्त होने पर । साधनाका विवेचन कर । कहता कर ग्रंथ विस्तार । इसी भावसे ॥ ४५ ॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ गीता साधनाका सारांशमें पुनःकथन- कहता फिर हे सुभट । क्रमयोगी वह स-निष्ठ । मैं होके करता प्रविष्ट । मेरे ही रूपमें ॥ ४६ ॥ स्वकर्मोंके सुमनोंसे । मेरी पूजा करनेसे । पाता प्रसाद रूपसे । ज्ञान-निष्ठाको ॥ ४७ ॥ ज्ञान जब वह हाथ आता । भक्तिमें है उल्लास भरता । इससे फिर है सुख पाता । समरस होके ॥ ४८ ॥ करता जो विश्व-प्रकाशन । आत्मा जो वह मैं हूं अर्जुन । वह आत्मा सर्वव्यापी मान । अनुकरण करता ॥ ४९ ॥ तजके अपनी कठोरता । नून जैसे पानीमें घुलता । या चलके वायु है समाता । आकाशमें जैसे ॥ १२५० ॥ वैसे ही काया वाचा मनसे । मेरा आश्रय करता उसे । निषिद्ध कर्म भी भूलसे । करता तब ॥ ५१ ॥ आनेसे जैसे गंगाका संबंध । गंदा नाला होता है महानद । वैसे ही होने पर मेरा बोध । न रहता शुभाशुभ ॥ ५२ ॥ मेरे आश्रयमें नित्य करके सब कर्मको । पाता मेरी कृपासे ही मेरा ही पद शाश्वत ॥ ६६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२०

तथा कूरा अथवा चंदन । नहीं करता अग्नि भक्षण । तब तक रहते हैं भिन्न । इस प्रकार ॥ ५३ ॥ पांच अथवा षोड़श । तब तक होता कस । जब तक है पारस । नहीं छूता ॥ ५४ ॥ ऐसे हैं यह शुभाशुभ । रहता है भरतर्षभ । जब तक न होता लाभ । मेरे प्रकाशका ॥ ५५ ॥ अजी ! रात्र और दिव । तब तक द्वैत भाव । जब तक है अभाव । सूर्यका जहां ॥ ५६ ॥ इसीलिये होते ही मेरी भेट । उसके सभी कर्म हैं सुभट । मिट कर मिल जाता है पाट । मेरे सायुज्यका ॥ ५७ ॥ देश काल तथा स्वभाव । जिसका नाश न संभव । ऐसा पद वह पांडव । पाता अविनाशी ॥ ५८ ॥ अथवा मानो पांडुसुता । आत्माकी मेरी प्रसन्नता । अलंकार उसे मिलता । इससे बड़ा क्या लाभ ॥ ५९ ॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥ समर्पणका रहस्य— इसीलिये हे अर्जुन । सभी कर्म समर्पण । कर तू अपने जान । मेरे स्वरूपमें ॥ १२६० ॥ वह समर्पण धनुर्धर । कृत्रिम रूपसे तू न कर । आत्म-विवेकसे धरकर । कर तू चित्तवृत्तिको ॥ ६१ ॥ फिर वह विवेक बल । सभी कर्ममें जो निराला । मेरे रूपमें ही निर्मल । देखेगा तू ॥ ६२ ॥ मुझ मत्पर वृत्तीसे सौंपके कर्म जो सब । समत्वमें स्थिरतासे मुझमें चित्त तू रख ॥ ५७ ॥ ८२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तथा कर्मका जन्म-स्थान । मेरी प्रकृति जो अर्जुन । करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६३ ॥ अपनेसे प्रकृति भिन्न । नहीं रहती है अर्जुन । करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६४ ॥ इससे प्रकृतिका नाश । होकरके कर्म-संन्यास । उत्पन्न होगा अनायास । सकारण ॥ ६५ ॥ मिटकर सब कर्म-जात । आत्मा मात्र मैं रहता पार्थ । उसमें बुद्धिको तू व्रतस्थ । करके रख ॥ ६६ ॥ बुद्धि है जो अनन्ययोगसे । मुझमें पैठ जायेगी ऐसे । तब अन्य विषय त्यागसे । मुझेही भजेगा चित्त ॥ ६७ ॥ तज कर विषय जात । चित्त हुवा मुझमें रत । चिंतन करेगा सतत । मेरा ही वह ॥ ६८ ॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥ इस सेवासे जब अभिन्न । भरेगा चित्त मुझसे जान । मेरा प्रसाद हुवा संपूर्ण । जान तू यह ॥ ६९ ॥ वह सकल दुःख धाम । भोगे जाते जो मृत्यु जन्म । दुर्गम वे सब सुगम । होंगे तुझे ॥ १२७० ॥ सूर्य-सहायका जो आश्रय । आंखोंको मिलता धनंजय । रहा क्या वहां तमका भय । कह तू मुझे ॥ ७१ ॥ वैसे ही है प्रसाद मेरा अर्जुन । करता जीवदशा उपमर्दन । उसे कैसे संसारका हौवा जान । डरायेगा कभी ॥ ७२ ॥ इसीलिये हे पार्थ । संसारका जो गर्त । तरेगा तू निश्चित । मेरी कृपासे ॥ ७३ ॥ सभी दुःख तभी मेरी कृपासे तर जायगा । नाश निश्चित पायगा न मान यह मानसे ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२२

अथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन । रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥ यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय । देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥ जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात । भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥ इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार । मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥ यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार । विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥ स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन । संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥ ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन । मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥ मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक । कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥ तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक । यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥ पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका । फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥ इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना । लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥ कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके । यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥ ८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो तू मैं न लडूंगा। ऐसे ही निश्चय करेगा । तो भी वह व्यर्थ करेगा । स्वभाव तेरा ॥ ८५ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥ सभी स्वभावके आधीन हैं— प्राचीकी ओर जो प्रवाह बहता । उसमें उलटा ही कोई तैरता । उसका हठ अवश्य ही रहता । पानी खींचता ओघमेंही ॥ ८६ ॥ या कहेगा चावलका दाना । न उगूंगा मैं चावल बना । उसका स्वभाव बदलना । शक्य है क्या ॥ ८७ ॥ वैसे ही क्षात्र-संस्कार सिद्ध । प्रकृतिने बनाया प्रबुद्ध । कहता युद्ध मुझे निषिद्ध । करायेगा वही ॥ ८८ ॥ शौर्य तेज और दक्षता । इत्यादिक जो पांडुसुता । दिये हैं गुणोंको जन्मता । प्रकृतिने तुझे ॥ ८९ ॥ तब क्षात्र-गुणानुरूप । युद्ध करना मान पाप । युद्धसे रहना निर्लेप । तुझे असंभव ॥ १२९० ॥ क्षात्र-गुणोंसे तू अर्जुन । बंधा है स्वभावसे जान । क्षात्र-प्रवाहमें पतन । होगा ही तेरा ॥ ९१ ॥ अपना जो यह जन्म-मूल । न विचार कर तू केवल । न लडेगा इसपे अचल । व्रत लेगा ॥ ९२ ॥ जैसे बांध कर हाथ पाय । किसीको रथमें डाला जाय । न चलके भी वह निश्चय । पहुंचेगा दिगंतमें ॥ ९३ ॥ कुछ भी न करूंगा मैं ऐसे । कह कर अपनी ओरसे । रहेगा तू यदि निश्चयसे । लड़ेगा ही ॥ ९४ ॥ अपने ही स्वकर्मोंसे बंधा है तू स्वभाविक । टालना चाहता जो है करेगा तू अवश्यश ही ॥ ६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४

विराट राज-पुत्र उत्तर । भागा रण-भूमि छोड़कर । तब लड़ा तू ही धनुर्धर । इसी स्वभावसे ॥ ९५ ॥ महावीर जो ग्यारह अक्षोहिणी । हराये अकेलेने कोदंडपाणी । वही स्वभाव यहां तुझे सेनानी । बनायेगा निश्चित ॥ ९६ ॥ रोगीको कभी क्या रोग भाता । या दरिद्रीको दारिद्य भाता । किंतु जो प्रारब्ध है भोगाता । अति बलवान ॥ ९७ ॥ वह अदृष्ट जो है मित्र । कराता है ईश्वराधीन । वह ईश भी है अर्जुन । हृदयमें तेरे ॥ ९८ ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ सबमें व्याप्त ईश्वर अपनी मायासे विश्व चलाता रहता है— अंतरमें सब भूतोंके । महा नभमें हृदयके । सहस्रकर चिद्वृत्तिके । होता है उदय ॥ ९९ ॥ अवस्थात्रय तीनों लोक । प्रकाश करके अशेष । अन्यथा दृष्टिके पांथिक । जगाते हैं जो ॥ १३०० ॥ देहोदकके सरोवरमें । खिले जो विषय कमलमें । जीव षट्पदसे जीवनमें । चराता है वह ॥ १ ॥ रहने दे रूपक जो ईश्वर । सकल भूतोंका है अहंकार । अपने सिरपे ले निरंतर । प्रकटता है ॥ २ ॥ अपनी मायाका जो आड वस्त्र । लगाके अकेला चलता सूत्र । बाद नटते रहते चित्र । चौरासी लाख ॥ ३ ॥ ब्रह्मादिसे कीटांत । अशेष भूतजात । देख योग्यता पार्थ । दिलाता देह ॥ ४ ॥ रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर । मायासे ही चलाता जो यंत्रोंपर चढा कर ॥ ६१ ॥ ८२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो शरीरका आकार । सम्मुख आया है देखकर । तदनुरूप ही ओढ कर । कहता मैं यह ॥ ५ ॥ सूतसे सूत लपेटा जाता । या घाससे घास बांधा जाता । जल बिंबको आप मानता । बालक जैसे ॥ ६ ॥ उसी भांति देहका आकार । आप ही दूसरा मानकर । देहको आत्मा समझकर । होता प्रकट ॥ ७ ॥ ऐसे हैं ये शरीराकार । यंत्रमें भूत धनुर्धर । डालकर हिलाता डोर । प्रारब्धका जो ॥ ८ ॥ उसका वहां जो कर्मसूत्र । बांधकर रखा है स्वतंत्र । वह उसके गतिका पात्र । होता है सदा ॥ ९ ॥ क्या कहूं मैं तुझे धनुर्धर । उडाता रहता निरंतर । गगनमें तिनके समीर । वैसे भूतोंको है यह ॥ १३१० ॥ जैसे चुंबकके साथ । भ्रमता है लोह नित । वैसे चलते हैं भूत । ईश्वराज्ञासे ॥ ११ ॥ जैसे अपनी चेष्टा पार्थ । करते समुद्रादि नित । चंद्र-सांनिध्यके साथ । उसी प्रकार ॥ १२ ॥ उससे सागर उछलता । सोमकांतमणि पसीजता । कुमुद चकोरका मिटता । सभी संकोच ॥ १३ ॥ वैसे बीज प्रकृति वश । अनेक भूत एक ईश । चलता रहता अशेष । तेरे हृदयमें ॥ १४ ॥ अर्जुनपन नहीं लेकर । 'मैं' ऐसे स्फुरता निरंतर । वही है तत्वता धनुर्धर । उसका रूप ॥ १५ ॥ इसीलिये करना प्रवृत्त । जान तू प्रवृत्तिको सतत । निश्चित ही लड़ायेगी पार्थ । तुझको यह ॥ १६ ॥ इसीलिये स्वामी है यह ईश्वर । उसीकी चलती है प्रकृति पर । वह करा लेती सब धनुर्धर । इंद्रियोंसे कार्य ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२६

करना या न करना पार्थ । प्रकृतिके सिरपे दे नित । वह प्रकृति है आधीनस्थ । जिस हृदयस्थके ॥ १८ ॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन है— अहं वाचा तन मन । देकर जा तू शरण । जाती है गंगा अर्जुन । सागरमें जैसे ॥ १९ ॥ फिर उसके प्रसादसे । सर्वोपशांति-प्रमदासे । कांत होकर स्वानंदसे । रमेगा स्वरूपमें ॥ १३२० ॥ उत्पत्ति होती जहांसे उत्पन्न । विश्रांतिका जहां विश्रांति-स्थान । अनुभूति बोध लेती अर्जुन । अनुभवका जहां ॥ २१ ॥ उस निजात्मपदका राय । होकर रहेगा तू अव्यय । सुनता है यहां धनंजय । कहता श्रीहरि ॥ २२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ गीता नामसे यह विख्यात । सभी वाङ्मयका जो मथित । जिससे होता है हस्तगत । आत्म-रत्न ॥ २३ ॥ वेदांतमें इसको ज्ञान । ऐसा नाम दिया महान । इससे सदा यशोगान । हुवा वेदांतका ॥ २४ ॥ बुद्ध्यादिक जो ज्ञानवान । इसीसे है प्रकाशमान । “मैं” सर्व द्रष्टाका दर्शन । होता है इससे ॥ २५ ॥ उसीकी ओटमें जा तू पायेगा सर्व भावसे । कृपासे उसकी श्रेष्ठ शांतिका स्थान शाश्वत ॥ ६२ ॥ ऐसा जो गूढसे गूढ कहा ज्ञान तुझे अब । सोचके यह सारा तू स्वेच्छासे योग्य जो कर ॥ ६३ ॥ ८२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यह है वह आत्मज्ञान । मेरा गुह्यसे गुह्य धन । तुझसे कैसे मैं वंचन । करूं सखासे ॥ २६ ॥ इस कारणसे है अर्जुन । दिया अपना गुप्त निधान । तुझसे होकर सकरुण । हमने यहां ॥ २७ ॥ ममतासे भूलकर पार्थ । माता बोलती अ-यथार्थ । तुझसे भी हम इस अर्थ । बोलते हैं सदा ॥ २८ ॥ जैसे आकाशको भी छानना । तथा अमृतको भी छीलना । अथवा दियासे कराना । दिव्य जैसे ॥ २९ ॥ जिसका शरीर है प्रकाशन । करता पातालका अणु जान । उस सूर्यकी आंखोंमें अंजन । लगाना कैसे ॥ १३३० ॥ ऐसे मैं सर्वज्ञ अर्जुन । विचारसे कर मंथन । सबसे यह भला जान । कहा तुझसे ॥ ३१ ॥ तू ही अब इस पर । कर अपना निर्धार । निर्धारके बाद फिर । कर जो योग्य ॥ ३२ ॥ यह सुनकर धनंजय । स्वस्थ हो रहा उस समय । तब कहे देव हो सदय । भला तू अवंचक ॥ ३३ ॥ भोजनमें बैठा क्षुधित । कहकर हुवा मैं तृप्त । होता आप क्षुधा पीडित । तथा मिथ्याचारी ॥ ३४ ॥ वैसे मिला सर्वज्ञ श्रीगुरु । करानेमें जो आत्म-निर्धार । नहीं पूछता मान आभार । मनमें उसके ॥ ३५ ॥ तब तो अपनेको ही फंसाता । तथा अपनी ही वंचना करता और अपने आप है दूर जाता । सत्य-स्वरूपसे ॥ ३६ ॥ तेरे मौनमें जो है अर्जुन । भेद जानता है मेरा मन । सुनना है फिर वह ज्ञान । अल्पमें एक बार ॥ ३७ ॥ कहता तब वह धनुर्धर । जानता देव तू मेरा अंतर । ऐसे कौन है जानेगा दूसरा । मेरा हृदय ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२८

यह ज्ञेय जो यहां संपूर्ण । इसका ज्ञाता तू एक जान । सूर्य ऐसे सबका वर्णन । करना क्या फिर ॥ ३९ ॥ सुनके यह श्रीकृष्ण । बोलता है तू अर्जुन । है क्या हमारा वर्णन । यह अल्प ॥ १३४० ॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ अनन्य भक्तसे कहा गया हृदयका गूढ— एकाग्र कर संपूर्ण ध्यान । फिरसे यह बात तू सुन । मेरा वचन यह अर्जुन । जो अति निर्मल ॥ ४१ ॥ वाच्य है इसीलिये बोलना । या श्रव्य है इसीलिये सुनना । ऐसे नहीं तो तेरा अर्जुना । भला है भाग्य ॥ ४२ ॥ नहीं होती है कभी दृष्टि प्रेमार्द्र । पिल्लोंको कूर्माकी दृष्टि है प्रेमार्द्र । वैसे ही होता आकाश भी प्रेमार्द्र । चातकके लिये ॥ ४३ ॥ जहां जो व्यवहार नहीं होता । उसका फल भी तब मिलता । जब दैव अनुकूल हो जाता । उस समय ॥ ४४ ॥ वैसे जो द्वैतका आना जाना । रोकके ऐक्य-घरमें जाना । तथा वहांका सुख भोगना । जो है रहस्य ॥ ४५ ॥ तथा जो निरुपचार प्रेम । विषय होता है प्रियोत्तम । दूसरा नहीं होकर आत्म । जानना यह ॥ ४६ ॥ देखनेके लिये दर्पण । पोंछना स्वच्छ जो अर्जुन । अपने लिये होता जान । उसके लिये नहीं ॥ ४७ ॥ तेरे लिये अब मैं पार्थ । बोलता अपने ही साथ । मैं तू यह भेद यथार्थ । नहीं हममें ॥ ४८ ॥ गूढ जो सब गूढोंका फिरसे वाक्य उत्तम । हितार्थ कहता तेरे होगा तू सुन मप्रिय ॥ ६४ ॥ ८२९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय । अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥ जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न । तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥ वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन । तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥ इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन । यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥ तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार । मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो— अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे । सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥ मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन । मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥ आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध । वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥ सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन । उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥ हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना । यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥ प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे । होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३०

अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय । कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥ एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना । विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥ तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार । इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥ तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर । मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥ तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें । भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥ तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना । फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥ जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब । होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥ पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर । मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥ वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म । फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥ इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें । अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥ जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना । प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥ वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच । उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥ यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप । तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥ ८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन । तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥ राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ । वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥ इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत । तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥ इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता । इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥ जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश । किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥ पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर । किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥ इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय । विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥ देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन । इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥ सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता । उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥ सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे । अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥ इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे । साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥ कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण । मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥ मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध । तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३२

ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब । करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥ अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण । मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥ इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध । देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥ इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता । विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥ तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान । जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥ शरणागतिका विवेचन— आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता । वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥ वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक । तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥ करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार । या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥ अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला । व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥ अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे । अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥ सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर । जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥ (92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय

वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल । तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥ मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान । जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥ वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं । सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥ किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन । उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥ जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश । इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥ स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें । वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥ भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन— अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे । सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥ मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना । निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥ सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार । वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥ अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता । ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥ मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना । ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥ जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ । फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३४

लोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता । सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥ जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न । उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥ अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ— ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ । धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥ कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार । जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥ वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न । रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥ इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं । तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥ जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन । बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥ वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न । मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥ इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज । जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥ इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण । मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥ ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर । कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥ फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण । आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥ ८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग

भक्त और भगवानका सामरस्य— नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको । वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥ ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक । देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥ हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक । द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥ दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया । द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥ तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर । बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥ सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता । उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥ वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन । किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥ गीता वेदका भी मूल-सूत्र है— ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र । श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥ वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता । तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥ अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास । सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥ इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित । अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥ स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता । उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६

वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष । गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥ इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ । लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥ जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग । भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥ कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान । गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥

गीता और वेदकी समानता—

गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव । दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥ मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र । इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥ फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध । उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥ तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध । विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥ सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना । श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥ और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक । आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥ ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती । तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥ जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे । वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥

८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध