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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 909

वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष । गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥ इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ । लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥ जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग । भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥ कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान । गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥

गीता और वेदकी समानता—

गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव । दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥ मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र । इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥ फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध । उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥ तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध । विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥ सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना । श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥ और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक । आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥ ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती । तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥ जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे । वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥

८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध