भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कर्मयोगसे उपासना । ईश्वर-स्थानमें करना । श्रीहरिका यह कहना । चौथेके अंतमें ॥ ४३ ॥ वहांसे जो एकादशाध्याय । पूर्ण होने तक धनंजय । कर्मसे ईश-भजन कार्य । कहा है सारा ॥ ४४ ॥ इन आठ अध्यायोंमें है स्पष्ट । देवताकांड किया है निर्दिष्ट । शास्त्रोंमें कहे गये सभी पट । खोले हैं यहां ॥ ४५ ॥ तथा यही ईश्वर-प्रसादसे । मिलता श्रीगुरु-संप्रदायसे । सच्चा अपरिपक्व ज्ञान जिसे । प्रतीत किया जान ॥ ४६ ॥ वही अद्वेष्टावि श्लोकोंमें । तथा अमानित्वादिकमें । परिपक्व किया ज्ञानमें । बारहवाका अंत ॥ ४७ ॥ वह बारहवाका अध्याय प्रथम । तथा पंद्रहवा अध्याय अंतिम । ज्ञान-फल-पाक सिद्ध निरुपम । है निरूपण ॥ ४८ ॥ इसीलिये इन चारमें । ऊर्ध्व-मूलांत अध्यायमें । ज्ञान-कांड इस स्थानमें । कहा गया है ॥ ४९ ॥ एवं कांडत्रय निरूपण । करता है जो श्रुति-वचन । गीता पद रत्नोंके भूषण । पहनते यहां ॥ १४५० ॥ कहने पर ये कांडत्रयात्मक । श्रुति मोक्ष-फल जो है एक । प्राप्त करना है यह आवश्यक । कहा गरजकर ॥ ५१ ॥ उसीके साधन ज्ञानसे । वैर करते जो सदासे । अज्ञान वर्ग है जो उसे । कहा सोलहवेमें ॥ ५२ ॥ शास्त्रोंके यहां इसी साथीको । साथ ले जीतना है शत्रूको । ऐसा वह संदेश सबको । देता सत्रहवां ॥ ५३ ॥ इसभांति है पहलेसे । सत्रहवें तक जो ऐसे । बखाने हैं स्पष्ट-रूपसे । स आत्म-विश्वास ॥ ५४ ॥ यह अर्थ जात संपूर्ण । किया तात्पर्य अर्थ-पूर्ण । अष्टादशमें निरूपण । कलशाध्याय जो ॥ ५५ ॥ ज्ञानेश्वरी ८३६