ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध । सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता— मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण । कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥ यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त । उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥ पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर । प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥ अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर । पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥ गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता । गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥ ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर । डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥ अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर । सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥ करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान । सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥ पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर । अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥ इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता । पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥ बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर । वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥ ८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध