ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध । सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता— मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण । कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥ यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त । उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥ पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर । प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥ अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर । पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥ गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता । गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥ ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर । डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥ अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर । सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥ करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान । सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥ पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर । अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥ इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता । पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥ बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर । वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥ ८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध
करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ । तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥ अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल । उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥ वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण । दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥ शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल । कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥ पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र । जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥ द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद— फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन । समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥ जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण । तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥ अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन । भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥ जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन । सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥ उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल । जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥ परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें । न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥ नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार । इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४०
तूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया । सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥ इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर । आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥ नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन । यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥ गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे । नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान । संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥ इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय । कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥ इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ यह इससे नहीं कहना चाहिये— तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था । तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥ या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन । उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥ अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा । न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥ तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता । किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥ न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह । ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥ ८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान । करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥ उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल । गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥ सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार । व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥ दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको । वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥ हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं । उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥ रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण । उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥ इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति । किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥ जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति । इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥ जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता । उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥ तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात । उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥ वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान । किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥ अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण । किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥ सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर । किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४२
बनाया गया नाना विध पक्वान्न । उसमें मिलाया कालकूट मान । अथवा छल भरी मैत्री अर्जुन । रहती है जैसे ॥ ३ ॥ वैसे तप भक्ति मेधा । उसकी जान प्रबुद्धा । करता जो मेरी निंदा । तथा मद्भक्तोंकी ॥ ४ ॥ इसी कारण तू पांडुकुमार । भक्त तपी मेधावी होनेपर । गीता उसको त्याज्य मान कर । न कह तू बाबा ॥ ५ ॥ क्या कहूं यदि वह निंदक । योग्य है सृष्टिकर्ता सरीखा । गीता-ग्रंथ यह सकौतुक । न दे उसको ॥ ६ ॥ तभी है तपका धनुर्धर । पत्थरका बाडा बना कर । रचा गुरु-भक्तिका सुंदर । प्रासाद जिसने ॥ ७ ॥ वैसे ही श्रवणेच्छा द्वार । खुला रखना चारों प्रहर । फिर रचा कलश सुंदर । अनिंदा रत्नका ॥ ८ ॥ य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता कहेगा वह मद्रूप होगा— देख ऐसा भक्तालय सुंदर । प्रतिष्ठा कर वहां गीतेश्वर । तुलेगा तू मेरे समान फिर । इस विश्वमें निश्चित ॥ ९ ॥ क्यों कि जो एकाक्षरपनमें । तीन मात्राओंके उदरमें । फंसाथा वहां गर्भ-वासमें । यह प्रणव ॥ १५१० ॥ यह वेद-बीज जो ओंकार । गीता विस्तारसे फैलकर । या गायत्री फल-फूलकर । आयी है श्लोकोंमें ॥ ११ ॥ यह जो मंत्र-रहस्य गीता । मेरे भक्तोंसे जो है कहता । अनन्य शिशुको जैसे माता । देती है जीव ॥ १२ ॥ कहेगा गूढ जो श्रेष्ठ मेरे भक्त-गणों सह । उसी परम भक्ती से मिलेगा मुझमें वह ॥ ६८ ॥ ८४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-गोम
अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
वैसे भक्तोंको जो गीतासे । परिचय कराता ऐसे । देह-पातपे है मुझसे । मिलता वह ॥ १३ ॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ उसे मैं अपना हृदय-सिंहासन देता हूं— अथवा ले शरीरका भूषण । लेकर रहता है भिन्न जान । तब भी मेरा यह जीव प्राण । जान तू पार्थ ॥ १४ ॥ ज्ञानी कर्मठ तापस । जो है ये मेरे मानस । इनमें वह विशेष । प्रिय है मेरा ॥ १५ ॥ भूतल पर ऐसे संपूर्ण । अन्य कोई नहीं है अर्जुन । गीता कहता जो भक्त-जन- । मेलेमें मेरे ॥ १६ ॥ धरके मुझ ईश्वरका लोभ । गीता कहता है जो हो अक्षय । वह भूषण होता है सुलभ । संत-समाजका ॥ १७ ॥ नव-पल्लवोंसा रोमांचित । तथा मंदानिलसा कंपित । आमोद-जलसा हो द्रवित । पुष्य-नयन जैसे ॥ १८ ॥ कोकिल कल-रव वत । सगद्गद करके बात । मद्भक्तोग्रानमें वसंत । करता प्रवेश ॥ १९ ॥ सफल जन्म माने जैसे चकोर । वैसे उदित होता शशि अंबर । या नव-मेघ आते सुन पुकार । मयूरके जैसे ॥ १५२० ॥ वैसे सज्जनोंके मेलेमें जाकर । गीता पद रत्नोंका बरखा कर । मेरे स्वरूप प्राप्तिकी हेतु भर । रख अपनेमें ॥ २१ ॥ तब उससे मेरा कोई प्रिय । नहीं दीखता मुझे धनंजय । मेरे भक्तोंके सारे समुदाय । मध्यमें और ॥ २२ ॥ कोई मेरा नहीं पार्थ उससे बढके प्रिय । वैसे ही न कभी होगा जगमें उससे प्रिय ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४४
क्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन । देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥ अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥ मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन । खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥ यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद । नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥ उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ । किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥ करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान । प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥ गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे । गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥ श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध । गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥ करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण । करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥ वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास । छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥ यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं । मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥ सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके । पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥ ८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा जैसे उदयाचल पर । झलकते ही रवि-किरणके हार । खो जाता है अंतरालमें तिमिर । उसी भांति ॥ ३२ ॥ वैसे ही कर्णोंके महाद्वार । सुनते हैं गीताका गजर । मिटता है सभी पाप भार । सृष्ट्यादिका भी ॥ ३३ ॥ इससे भावी जन्म सर्वत्र । होते जाते हैं अति पवित्र । इससे अन्य ऐसे हैं अत्र । भारी पुण्य ॥ ३४ ॥ तथा इस गीताके हैं अक्षर । कानोंसे जाके हृदय-गव्हर । उतने ही करते हैं जो पूर । अश्वमेध याग ॥ ३५ ॥ तभी है श्रवणसे पाप हरता । वैसे ही धर्मको उन्नत करता । इससे स्वर्गका राज्य है मिलता । अंतमें जो ॥ ३६ ॥ मेरे पास आनेमें अर्जुन । स्वर्ग है पहला ही सदन । उसको भोग फिर सज्जन । मिलते मुझमें ही ॥ ३७ ॥ इस प्रकार गीता पार्था । जो सुनता और पढ़ता । उसे ब्रह्मानंद मिलता । मेरे रूपका ॥ ३८ ॥ यह सारा रहने दे पार्थ । किस लिये तुझे कही गीता । उसका क्या हुवा है स्पष्टता । कह तू मुझे ॥ ३९ ॥ कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसः । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥ सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या— तो तू मुझसे कह अर्जुन । यह शास्त्र-सिद्धांत संपूर्ण । किया न चित्त देके श्रवण । जीवभावसे ॥ १५४० ॥ हमने यहां जैसे जिस भांति । कानोंको दी है गीताकी संपत्ति कानोंसे वह हृदयमें पूर्ति । रोपी है न ? ॥ ४१ ॥ इसे तूने सुना है न पूरा एकाग्र चित्तसे । अज्ञान रूप जो तेरा मिटा क्या मोह मूलता ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४६
अथवा वह बीचमें । गिरा फैला है व्यर्थमें । या वैसे ही उपेक्षामें । दिया छोड़ ॥ ४२ ॥ या मैंने जैसे कथन किया । हृदयमें वैसे रोपन भया । मुझसे कह तू धनंजया । पूछता हूं मैं ॥ ४३ ॥ था जो स्व-अज्ञान जनित । मोहमें हो चित्त भ्रमित । कर्माकर्म-मोहकी बात । रही क्या अब ॥ ४४ ॥ यह सब भला मैं क्यों पूछता । यह मैं करता या न करता । यह अपने हाथमें मानता । क्या तू अब भी ॥ ४५ ॥ स्वानंदैक्य इसमें पार्थ । गलेगा मान कर द्वैत । भावमें लाता लक्ष्मीनाथ । प्रश्न करके ॥ ४६ ॥
अर्जुनका समरसैक्यसे द्वैतमें अवतरण— पूर्ण-ब्रह्म हुवा है पार्थ । अगला कार्य साधनार्थ । नहीं होने देता श्रीकांत । मर्यादा भंग ॥ ४७ ॥ स्वयं वैसे जो करता । सर्वज्ञ क्या नहीं जानता । किंतु श्रीकृष्ण है पूछता । सकारण ही ॥ ४८ ॥ ऐसे करके वह प्रश्न । लुप्त-प्राय अर्जुनपन । पूर्णत्वसे लाके कथन । कराता है अब ॥ ४९ ॥ जैसे क्षीराब्धि तटपर । नभमें बैठा रश्मिकर । अभिन्न हो भिन्न होकर । दीखता पूर्णचंद्र ॥ १५५० ॥ वैसे ब्रह्म मैं यह भूलता । ब्रह्मसे विश्व ही भरता । यह भी भूल सहज होता । स्वयं ब्रह्मत्व ॥ ५१ ॥ भूलता स्मरता ऐसे ब्रह्मत्व । देह दुख सीमापे मान तत्व । अर्जुन मैं ऐसा नाम-रूपत्व । लेके खडा रहा ॥ ५२ ॥ फिर वह कंपित करतल । दबाकर कुछ रोमांच-मूल । अपने आपमें ही स्वेद जल । पचा करके ॥ ५३ ॥
८४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा । हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥ नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते । आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥ विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर । उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥ वाचाका द्रवना । प्राण संभालना । अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥ अर्जुन उवाच नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ तेरा दर्शन सब कुछ देता है— अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह । गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥ पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार । दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥ ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन । क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥ फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन । किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥ और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं । कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥ अर्जुनने कहा मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा । हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८४८
उलझा था मैं अर्जुनपनसे । मुक्त हुवा हूं समरैक्यसे । अब कहना पूछना जो ऐसे । नहीं रहा कुछ ॥ ६३ ॥ अब मैं तेरे ही प्रसादसे । प्राप्त जो इस आत्मबोधसे । मोहको सब मूल रूपसे । भूल गया हूं ॥ ६४ ॥ तेरे बिना भिन्न कुछ न होनेसे संदेह भी नहीं रहा— अब करना या नहीं करना । रहता यह कैसे द्वैत-स्थान । वह न रहा तेरे बिन भिन्न । कहीं भी यहां ॥ ६५ ॥ इस विषयमें मुझमें कहीं । संदेहका नाम तक भी नहीं । त्रिशुद्धि-पूर्वक कर्म है नहीं । वह मैं हुवा आज ॥ ६६ ॥ तुझसे पाकर स्व-स्वरूप । कर्तव्य मिटा है पूर्ण रूप । अब रहा है आज्ञाके रूप । करना सारा ॥ ६७ ॥ क्यों कि जो दृश्य दृश्यको नाशता । तथा जो द्वैत द्वैतको ग्रासता । एक ही एक सर्वत्र बसता । सर्वकाल ॥ ६८ ॥ जिस संबंधसे बंधुत्व मिटता । जिसके लोभसे लोभही टूटता । मिलनेसे जो सब ही मिल जाता । अपनेमें आप ॥ ६९ ॥ वह जो गुरु-लिंग तू मेरा । एकत्वको जो पोसता है सारा । उसके लिये कहते हैं पूरा । अद्वय बोध ॥ १५७० ॥ स्वयं आप ही हो कर ब्रह्म । दूर कर कृत्याकृत्य कर्म । फिर करना जो निःसीम । सेवा जिसकी ॥ ७१ ॥ सिंधुसे गंगा मिलने गयी । मिलते ही समुद्र हो गयी । वैसे भक्तोंको सेवा हो गयी । जिस पदकी आज ॥ ७२ ॥ वह तू मेरा निरुपचार । श्रीकृष्ण सेव्य जगदीश्वर । मानता ब्रह्मत्व उपकार । ऐसा है तो ॥ ७३ ॥ हम दोनोंमें जो आड़ । था जो भेदका किवाड़ । दूर कर दिया गोड़ । सेवाके रूपमें ॥ ७४ ॥ (93) ८४९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोश
तब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा । मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥ सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल । कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥ खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार । सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥ ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर । आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥ ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे । बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥ अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥ रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे । किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥ तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण । दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥ व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण । वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥ संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे । तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥ संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजयने कहा जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत । सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५०
देख यह स्थिति राजाकी । वाणी मूक बनी संजयकी । फिर भी अनुभूति ले सुखकी । पगलायीसी ॥ ८५ ॥ भूलके हर्षावेगसे । कहता था जो राजासे । अयोग्य यह इसे । जान कर भी यह ॥ ८६ ॥ फिर कहता है कुरुनंदन । ऐसे तेरे बंधु-पुत्र अर्जुन । बोला तब सुन यह श्रीकृष्ण । कहता अति मधुर ॥ ८७ ॥ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका वर्णन— पूर्व-पश्चिम सागर । देखनेमें भिन्न पर । संपूर्ण एक है नीर । उसी भांति ॥ ८८ ॥ श्रीकृष्ण अर्जुन हैं ऐसे । भिन्न हैं केवल तनसे । किंतु हैं संवादमें जैसे । सदा अभिन्न ॥ ८९ ॥ स्वच्छ होते हैं जो दर्पणसे । आते ही दोनों सम्मुख जैसे । देखते हैं परस्पर ऐसे । आपसमें आप ॥ १५९० ॥ वैसे श्रीकृष्णमें पांडुसुत । देखता है अपने सहित । वैसे ही अर्जुनमें अनंत । देखता अपनेको ॥ ९१ ॥ भक्तके लिये देव जो अवकाश । देखता था भक्त वही अवकाश । अब दोनोंमें एक ही अवकाश । देखता है पार्थ ॥ ९२ ॥ और कुछ भी नहीं । अपने बिन कहीं । यह मानके वहीं । रहे वे दोनों ॥ ९३ ॥ यदि द्वेत ही अब न रहा । तब प्रश्नोत्तर कहां रहा । अथवा यदि द्वैत भी रहा । कहां संवाद सुख ॥ ९४ ॥ बोलते थे ऐसा दूजापनसे । निगला द्वैतका संवाद ऐसे । वह बोलना मैंने सुना ऐसे । दोनोंका कहा ॥ ९५ ॥ स्वच्छ कर दो दर्पण । सम्मुख रखे हैं जान । उसमें देखता कौन । कहे कैसे ॥ ९६ ॥ ८५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
अथवा दीपके सम्मुख । रखके दीप और एक । कौन किसका प्रयोजक । कहे कौन ॥ ९७ ॥ अथवा अर्कके सम्मुख अर्क । उदय हुवा मानो और एक । कौन कहें उसमें प्रकाशक । तथा प्रकाश्य कौन ॥ ९८ ॥ करनेमें इसका निश्चय । कुंठित हो जाता है निश्चय । दोनों हुए हैं इस समय । संवाद रूप ॥ ९९ ॥ मिलते दो ओघ जिस स्थान । उनको कर देनेमें भिन्न । रख दिया बीचमें लवण । क्षणमें होगा जैसे ॥ १६०० ॥ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका लय होना— वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन । संवादते हैं मन ही मन । उसे सोचनेमें मेरा मन । हुवा है वैसे ॥ १ ॥ ऐसे संजय कहता नहीं । सात्विक भाव इतनेमें ही । ले जाते स्मृति न जाने कहीं । संजयपनकी ॥ २ ॥ रोमांचित हुवा बदन । वैसे ही संकुचित तन । स्वेद स्तंभको है कंपन । रोकता एक ॥ ३ ॥ अद्वय-आनंदके स्पर्शसे । रसमय हुई दृष्टि जैसे । प्रेमका सोता ही बना जैसे । नहीं ये अश्रु ॥ ४ ॥ न जाने उसमें क्या नहीं समाता था । अथवा गलेमें कहां क्या अटका था । किंतु सिसकीसे वाणी-मार्ग रुका था । न उमडते शब्द ॥ ५ ॥ अथवा अष्ट सात्विक भाव । बनाते थे संजयको ठाव । तब हुवा संजय चौराहा । संवाद सुखका ॥ ६ ॥ उस सुखकी ऐसी जाति । अपने आप होती शांति । आयी है फिर देह-स्मृति । संजयकी तब ॥ ७ ॥ स्थिर होकर वह आनंद । कहता है जो उपनिषद् । नहीं जानते व्यास-प्रसाद- । से सुना मैंने ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५२
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥ वह एकांतकी गोष्ठि । ब्रह्मत्वकी पडी मिठी । मैं तू पनकी जो दृष्टि । मिट गयी पूरी ॥ ९ ॥ योग जो ये संपूर्ण । आते हैं जिस स्थान । सुलभ वे वचन । किये व्यासदेवने ॥ १६१० ॥ दिखाकर अर्जुनका कारण । बता करके अपनेको भिन्न । अपने दिये बोल वचन । आप ही देव ॥ ११ ॥ वहां हैं मेरे ये श्रोत्र । सुननेमें हुए पात्र । क्या कहें यह स्वतंत्र । सामर्थ्य गुरूका ॥ १२ ॥ राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ बोलनेमें हुवा वह विस्मित । जिससे हो गया है देह विस्मृत । रत्नमें हो रत्नसे प्रकाशित । छिपता है जैसे ॥ १३ ॥ हिमालयके जो सरोवर । होते चंद्रोदयमें काश्मीर । सूर्योदयमें पिघल कर । बहते जैसे ॥ १४ ॥ वैसे होते ही शरीरका स्मरण । संजय करता संवाद धारण । यही होता देह विस्मृतिके कारण । दूसरी बार ॥ १५ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ योग-गुह्य महाश्रेष्ठ कृपासे व्यासदेवकी । सुना प्रत्यक्ष जो मैने कहा योगेश कृष्णने ॥ ७५ ॥ जो कृष्णार्जुन संवाद राजन् अद्भुत पावन । सोचके मनमें भारी हर्षता मैं पुनः पुनः ॥ ७६ ॥ स्मरके वह जो रूप हरिका अति अद्भुत । राजन् विस्मित होके मैं नचता हूं पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ ८५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर खडा हो कहता नृप । श्रीहरिका देख विश्व-रूप । देख कर ऐसे बैठा कैसे चुप । किस प्रकार ॥ १६ ॥ न देख कर जो दीखता । न होकर जो है रहता । न स्मरकर भी स्मरता । उसे टालता कैसे ॥ १७ ॥ देख कर यह चमत्कार । बैठनेमें भी नहीं विस्तार । मुझ सह वह महापूर । ले जाता बहाके ॥ १८ ॥ ऐसा है श्रीकृष्णार्जुन । संवाद संगम स्थान । कर देता तिल-दान । अहंताका मैं ॥ १९ ॥ उमड असंवृत्त आनंद । अलौकिक सिसक सद्गद । करता श्रीकृष्ण कृष्ण शब्द । अपने आप ॥ १६२० ॥ धृतराष्ट्रकी जडता दर्शन— ये जो अष्ट-सात्विक भाव । न जाने कौरवका गांव । तब कल्पना हो संभव । कैसे राजाको ॥ २१ ॥ उस सुख-लाभकर अनुभव । अपनेमें लाकर स्थिर भाव । पचालिये अष्ट सात्विक-भाव । संजयने अपनेमें ॥ २२ ॥ इतनेमें है राजा कहता । युद्धमें कब क्या होता जाता । यह सब कहने निमित्त । रखा तुझे व्यासने ॥ २३ ॥ वह छोड़ कर तू यह ऐसे । बिठाया गया किस उद्देश्यसे । सब भूलकर क्या ऐसे वैसे । बोलता अप्रासंगिक ॥ २४ ॥ वनका जब प्रासादमें आता । दस दिशा सब सूना मानता । या उदयसे पिशाच जानता । रात हुई अब ॥ २५ ॥ जिसका जो गौरव न जानता । उसको विपरीत ही लगता । तभी है अप्रासंगिक कहता । इसमें क्या अचंबा ॥ २६ ॥ फिर कहता कह प्रस्तुत । लडाई चली है जो सांप्रत । उसमें किसकी हार जीत । होती यह कह तू ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५४
वैसे कहता अपना मन । सहज विचार कर क्षण । पराक्रममें है दुर्योधन । अधिक हमारा ॥ २८ ॥ यह छोड़ करभी कहां । सैन्य रहा है ड्योढ़ा जहां । विजय निश्चय है वहां । सहज प्राप्त ॥ २९ ॥ हमको अब लगता ऐसे । किंतु तेरा ज्योतिष है कैसे । कह संजय जैसे है वैसे । मुझसे तेरी बात ॥ १६३० ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ गीताकी फलश्रुति— प्रश्न सुन यह संजय कहता । किसका क्या होगा यह न जानता । जहां आयुष्य वहां जीवन होता । जानता यह ॥ ३१ ॥ चंद्र जहां चंद्रिका । शंभु जहां अंबिका । संत्र जहां विवेका । होता ही है ॥ ३२ ॥ नृपति जहां सैनिक । सौजन्य जहां संपर्क । अग्निमें जैसे दाहक । शक्ति है होती ॥ ३३ ॥ दया जहां वहां धर्म । वहां सुखायाम । सुखमें पुरुषोत्तम । रहता वैसे ॥ ३४ ॥ वसंत जहां वहां वन । वन जहां वहां सुमन । सुमन सह है गूंजन । सदा भ्रमरोंका ॥ ३५ ॥ गुरु जहां वहां ज्ञान । ज्ञानसे आत्म-दर्शन । दर्शनमें समाधान । होता नित्य ॥ ३६ ॥ जहां भाग्य वहां विलास । विलासमें रहा उल्हास । जहां सूर्य वहां प्रकाश । होता सहज ॥ ३७ ॥ योगेश्वर जहां कृष्ण जहां पार्थ धनुर्धर । वहां मैं देखता नित्य धर्म श्री जय वैभव ॥ ७८ ॥ ८५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-नोब
वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ । जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥ जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित । अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥ स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप । उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥ विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ । श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम- जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास । कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥ उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण । उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥ उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह । अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥ जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद । सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥ अर्जुनका भाग्य- स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन । माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥ जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ । सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥ बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग । वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥ कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर । किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५६
गुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन । प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥ परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान । उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥ सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन । यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥ अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा । जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥ वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान । वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥ इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत । वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥ यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर । तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥ जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब । वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥ यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य । गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥ एक श्लोकमें भारतका सार— एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर । देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥ जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर । लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥ वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत । भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥ ८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
उन्हीं जो सात शतोंका । इत्यर्थ शेष श्लोकका । व्यास-शिष्य संजयका । पूर्णोद्गार ॥ ६२ ॥ इसी एक श्लोक पर । पूर्ण विरक्त होकर । सब इच्छाओंका सार । पायेगा निश्चित ॥ ६३ ॥ गीता महिमा वर्णन- ऐसे ये श्लोक शत-सात । गीता पद उठाते हैं नित । ये शब्द क्या परामृत । कहें आकाशका ॥ ६४ ॥ या आत्मराजाकी गीता सभा । इसे उठाते हैं ये श्लोक स्तंभ । अनुभवती ऐसी प्रतिभा । यहां मेरी ॥ ६५ ॥ अथवा यह गीता सप्तशती । जो मंत्र प्रतिपाद्य भगवती । मोह-महिषासुरसे दे मुक्ति । आनंदती है ॥ ६६ ॥ इसीलिये काया वाचा मन । करता जो इसका सेवन । उसे दे स्वानंद सिंहासन । करती सम्राट ॥ ६७ ॥ अथवा अविद्याका अंधार । जीतने सूर्यसे बाजी मार । ऐसे श्लोक गीता कहकर । प्रकट किये देवने ॥ ६८ ॥ या श्लोकाक्षर द्राक्षालता । फैल मांडव बनी गीता । संसार पथिक वे जो शांत । विश्रांति ले यहां ॥ ६९ ॥ या भाग्यवंत संत-अलि-कुल । बनाकर श्लोक-रूप कमल । श्रीकृष्ण तडागमें खिली बेल । गीता-कमलकी ॥ १६७० ॥ अथवा श्लोक नहीं ये जान । लगता गीताका महिमान । बखानते हैं बंदी जन । अखंड जैसे ॥ ७१ ॥ या श्लोकोंका किला बनाकर । सप्त-शत करके सुंदर । सर्वांगम आये गीता पुर । बसानेको यहां ॥ ७२ ॥ या निजकांता आत्मासे । मिलने आयी प्रीतिसे । बाहु पसारके ऐसे । श्लोक रूप ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५८