भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 923, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 923

देख यह स्थिति राजाकी । वाणी मूक बनी संजयकी । फिर भी अनुभूति ले सुखकी । पगलायीसी ॥ ८५ ॥ भूलके हर्षावेगसे । कहता था जो राजासे । अयोग्य यह इसे । जान कर भी यह ॥ ८६ ॥ फिर कहता है कुरुनंदन । ऐसे तेरे बंधु-पुत्र अर्जुन । बोला तब सुन यह श्रीकृष्ण । कहता अति मधुर ॥ ८७ ॥ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका वर्णन— पूर्व-पश्चिम सागर । देखनेमें भिन्न पर । संपूर्ण एक है नीर । उसी भांति ॥ ८८ ॥ श्रीकृष्ण अर्जुन हैं ऐसे । भिन्न हैं केवल तनसे । किंतु हैं संवादमें जैसे । सदा अभिन्न ॥ ८९ ॥ स्वच्छ होते हैं जो दर्पणसे । आते ही दोनों सम्मुख जैसे । देखते हैं परस्पर ऐसे । आपसमें आप ॥ १५९० ॥ वैसे श्रीकृष्णमें पांडुसुत । देखता है अपने सहित । वैसे ही अर्जुनमें अनंत । देखता अपनेको ॥ ९१ ॥ भक्तके लिये देव जो अवकाश । देखता था भक्त वही अवकाश । अब दोनोंमें एक ही अवकाश । देखता है पार्थ ॥ ९२ ॥ और कुछ भी नहीं । अपने बिन कहीं । यह मानके वहीं । रहे वे दोनों ॥ ९३ ॥ यदि द्वेत ही अब न रहा । तब प्रश्नोत्तर कहां रहा । अथवा यदि द्वैत भी रहा । कहां संवाद सुख ॥ ९४ ॥ बोलते थे ऐसा दूजापनसे । निगला द्वैतका संवाद ऐसे । वह बोलना मैंने सुना ऐसे । दोनोंका कहा ॥ ९५ ॥ स्वच्छ कर दो दर्पण । सम्मुख रखे हैं जान । उसमें देखता कौन । कहे कैसे ॥ ९६ ॥ ८५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'