ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा । मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥ सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल । कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥ खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार । सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥ ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर । आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥ ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे । बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥ अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥ रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे । किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥ तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण । दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥ व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण । वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥ संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे । तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥ संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजयने कहा जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत । सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५०