भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अथवा दीपके सम्मुख । रखके दीप और एक । कौन किसका प्रयोजक । कहे कौन ॥ ९७ ॥ अथवा अर्कके सम्मुख अर्क । उदय हुवा मानो और एक । कौन कहें उसमें प्रकाशक । तथा प्रकाश्य कौन ॥ ९८ ॥ करनेमें इसका निश्चय । कुंठित हो जाता है निश्चय । दोनों हुए हैं इस समय । संवाद रूप ॥ ९९ ॥ मिलते दो ओघ जिस स्थान । उनको कर देनेमें भिन्न । रख दिया बीचमें लवण । क्षणमें होगा जैसे ॥ १६०० ॥ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका लय होना— वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन । संवादते हैं मन ही मन । उसे सोचनेमें मेरा मन । हुवा है वैसे ॥ १ ॥ ऐसे संजय कहता नहीं । सात्विक भाव इतनेमें ही । ले जाते स्मृति न जाने कहीं । संजयपनकी ॥ २ ॥ रोमांचित हुवा बदन । वैसे ही संकुचित तन । स्वेद स्तंभको है कंपन । रोकता एक ॥ ३ ॥ अद्वय-आनंदके स्पर्शसे । रसमय हुई दृष्टि जैसे । प्रेमका सोता ही बना जैसे । नहीं ये अश्रु ॥ ४ ॥ न जाने उसमें क्या नहीं समाता था । अथवा गलेमें कहां क्या अटका था । किंतु सिसकीसे वाणी-मार्ग रुका था । न उमडते शब्द ॥ ५ ॥ अथवा अष्ट सात्विक भाव । बनाते थे संजयको ठाव । तब हुवा संजय चौराहा । संवाद सुखका ॥ ६ ॥ उस सुखकी ऐसी जाति । अपने आप होती शांति । आयी है फिर देह-स्मृति । संजयकी तब ॥ ७ ॥ स्थिर होकर वह आनंद । कहता है जो उपनिषद् । नहीं जानते व्यास-प्रसाद- । से सुना मैंने ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५२