भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥ वह एकांतकी गोष्ठि । ब्रह्मत्वकी पडी मिठी । मैं तू पनकी जो दृष्टि । मिट गयी पूरी ॥ ९ ॥ योग जो ये संपूर्ण । आते हैं जिस स्थान । सुलभ वे वचन । किये व्यासदेवने ॥ १६१० ॥ दिखाकर अर्जुनका कारण । बता करके अपनेको भिन्न । अपने दिये बोल वचन । आप ही देव ॥ ११ ॥ वहां हैं मेरे ये श्रोत्र । सुननेमें हुए पात्र । क्या कहें यह स्वतंत्र । सामर्थ्य गुरूका ॥ १२ ॥ राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ बोलनेमें हुवा वह विस्मित । जिससे हो गया है देह विस्मृत । रत्नमें हो रत्नसे प्रकाशित । छिपता है जैसे ॥ १३ ॥ हिमालयके जो सरोवर । होते चंद्रोदयमें काश्मीर । सूर्योदयमें पिघल कर । बहते जैसे ॥ १४ ॥ वैसे होते ही शरीरका स्मरण । संजय करता संवाद धारण । यही होता देह विस्मृतिके कारण । दूसरी बार ॥ १५ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ योग-गुह्य महाश्रेष्ठ कृपासे व्यासदेवकी । सुना प्रत्यक्ष जो मैने कहा योगेश कृष्णने ॥ ७५ ॥ जो कृष्णार्जुन संवाद राजन् अद्भुत पावन । सोचके मनमें भारी हर्षता मैं पुनः पुनः ॥ ७६ ॥ स्मरके वह जो रूप हरिका अति अद्भुत । राजन् विस्मित होके मैं नचता हूं पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ ८५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग