ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर खडा हो कहता नृप । श्रीहरिका देख विश्व-रूप । देख कर ऐसे बैठा कैसे चुप । किस प्रकार ॥ १६ ॥ न देख कर जो दीखता । न होकर जो है रहता । न स्मरकर भी स्मरता । उसे टालता कैसे ॥ १७ ॥ देख कर यह चमत्कार । बैठनेमें भी नहीं विस्तार । मुझ सह वह महापूर । ले जाता बहाके ॥ १८ ॥ ऐसा है श्रीकृष्णार्जुन । संवाद संगम स्थान । कर देता तिल-दान । अहंताका मैं ॥ १९ ॥ उमड असंवृत्त आनंद । अलौकिक सिसक सद्गद । करता श्रीकृष्ण कृष्ण शब्द । अपने आप ॥ १६२० ॥ धृतराष्ट्रकी जडता दर्शन— ये जो अष्ट-सात्विक भाव । न जाने कौरवका गांव । तब कल्पना हो संभव । कैसे राजाको ॥ २१ ॥ उस सुख-लाभकर अनुभव । अपनेमें लाकर स्थिर भाव । पचालिये अष्ट सात्विक-भाव । संजयने अपनेमें ॥ २२ ॥ इतनेमें है राजा कहता । युद्धमें कब क्या होता जाता । यह सब कहने निमित्त । रखा तुझे व्यासने ॥ २३ ॥ वह छोड़ कर तू यह ऐसे । बिठाया गया किस उद्देश्यसे । सब भूलकर क्या ऐसे वैसे । बोलता अप्रासंगिक ॥ २४ ॥ वनका जब प्रासादमें आता । दस दिशा सब सूना मानता । या उदयसे पिशाच जानता । रात हुई अब ॥ २५ ॥ जिसका जो गौरव न जानता । उसको विपरीत ही लगता । तभी है अप्रासंगिक कहता । इसमें क्या अचंबा ॥ २६ ॥ फिर कहता कह प्रस्तुत । लडाई चली है जो सांप्रत । उसमें किसकी हार जीत । होती यह कह तू ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५४