ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे कहता अपना मन । सहज विचार कर क्षण । पराक्रममें है दुर्योधन । अधिक हमारा ॥ २८ ॥ यह छोड़ करभी कहां । सैन्य रहा है ड्योढ़ा जहां । विजय निश्चय है वहां । सहज प्राप्त ॥ २९ ॥ हमको अब लगता ऐसे । किंतु तेरा ज्योतिष है कैसे । कह संजय जैसे है वैसे । मुझसे तेरी बात ॥ १६३० ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ गीताकी फलश्रुति— प्रश्न सुन यह संजय कहता । किसका क्या होगा यह न जानता । जहां आयुष्य वहां जीवन होता । जानता यह ॥ ३१ ॥ चंद्र जहां चंद्रिका । शंभु जहां अंबिका । संत्र जहां विवेका । होता ही है ॥ ३२ ॥ नृपति जहां सैनिक । सौजन्य जहां संपर्क । अग्निमें जैसे दाहक । शक्ति है होती ॥ ३३ ॥ दया जहां वहां धर्म । वहां सुखायाम । सुखमें पुरुषोत्तम । रहता वैसे ॥ ३४ ॥ वसंत जहां वहां वन । वन जहां वहां सुमन । सुमन सह है गूंजन । सदा भ्रमरोंका ॥ ३५ ॥ गुरु जहां वहां ज्ञान । ज्ञानसे आत्म-दर्शन । दर्शनमें समाधान । होता नित्य ॥ ३६ ॥ जहां भाग्य वहां विलास । विलासमें रहा उल्हास । जहां सूर्य वहां प्रकाश । होता सहज ॥ ३७ ॥ योगेश्वर जहां कृष्ण जहां पार्थ धनुर्धर । वहां मैं देखता नित्य धर्म श्री जय वैभव ॥ ७८ ॥ ८५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-नोब