भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ । जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥ जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित । अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥ स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप । उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥ विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ । श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम- जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास । कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥ उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण । उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥ उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह । अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥ जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद । सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥ अर्जुनका भाग्य- स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन । माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥ जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ । सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥ बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग । वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥ कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर । किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५६

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