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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ । जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥ जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित । अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥ स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप । उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥ विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ । श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम- जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास । कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥ उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण । उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥ उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह । अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥ जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद । सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥ अर्जुनका भाग्य- स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन । माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥ जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ । सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥ बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग । वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥ कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर । किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५६

गुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन । प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥ परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान । उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥ सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन । यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥ अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा । जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥ वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान । वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥ इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत । वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥ यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर । तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥ जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब । वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥ यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य । गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥ एक श्लोकमें भारतका सार— एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर । देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥ जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर । लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥ वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत । भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥ ८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

उन्हीं जो सात शतोंका । इत्यर्थ शेष श्लोकका । व्यास-शिष्य संजयका । पूर्णोद्गार ॥ ६२ ॥ इसी एक श्लोक पर । पूर्ण विरक्त होकर । सब इच्छाओंका सार । पायेगा निश्चित ॥ ६३ ॥ गीता महिमा वर्णन- ऐसे ये श्लोक शत-सात । गीता पद उठाते हैं नित । ये शब्द क्या परामृत । कहें आकाशका ॥ ६४ ॥ या आत्मराजाकी गीता सभा । इसे उठाते हैं ये श्लोक स्तंभ । अनुभवती ऐसी प्रतिभा । यहां मेरी ॥ ६५ ॥ अथवा यह गीता सप्तशती । जो मंत्र प्रतिपाद्य भगवती । मोह-महिषासुरसे दे मुक्ति । आनंदती है ॥ ६६ ॥ इसीलिये काया वाचा मन । करता जो इसका सेवन । उसे दे स्वानंद सिंहासन । करती सम्राट ॥ ६७ ॥ अथवा अविद्याका अंधार । जीतने सूर्यसे बाजी मार । ऐसे श्लोक गीता कहकर । प्रकट किये देवने ॥ ६८ ॥ या श्लोकाक्षर द्राक्षालता । फैल मांडव बनी गीता । संसार पथिक वे जो शांत । विश्रांति ले यहां ॥ ६९ ॥ या भाग्यवंत संत-अलि-कुल । बनाकर श्लोक-रूप कमल । श्रीकृष्ण तडागमें खिली बेल । गीता-कमलकी ॥ १६७० ॥ अथवा श्लोक नहीं ये जान । लगता गीताका महिमान । बखानते हैं बंदी जन । अखंड जैसे ॥ ७१ ॥ या श्लोकोंका किला बनाकर । सप्त-शत करके सुंदर । सर्वांगम आये गीता पुर । बसानेको यहां ॥ ७२ ॥ या निजकांता आत्मासे । मिलने आयी प्रीतिसे । बाहु पसारके ऐसे । श्लोक रूप ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८५८

या गीता कमलका भृंग । या गीता सागर तरंग । या हैं श्रीहरिके तुरंग । गीता रथके ॥ ७४ ॥ या श्लोक सर्व तीर्थ समूह । मिले हैं गीता-गंगा प्रवाह । अर्जुन सिंहस्थ पर्व यह । आया है मान ॥ ७५ ॥ या नहीं यह श्लोक श्रेणी । किंतु अचिंत्य चिंतामणि । या निर्विकल्पमें लागणी । कल्पतरुकी ॥ ७६ ॥ सात शत श्लोक हैं जो ऐसे । बढे चढे हैं एक एकसे । किसका वर्णन करें कैसे । चुनाव करके ॥ ७७ ॥ दीप पहला क्या पिछला । छोटा या रवि मोटा भला । भेद गहरा या उथला । क्या अमृत सिंधुमें ॥ ७८ ॥ या बछिया और बछौना । कामधेनुमें भेद नाना । व्यर्थकी है गोष्ठी करना । न करने जैसी ॥ ७९ ॥ आदि है अथवा अंत । गीता श्लोककी है बात । जैसे पुष्प पारिजात । नया या पुराना ॥ १६८० ॥ इसमें नहीं न्यून अधिक । समान इसके सभी श्लोक । तथा न वाच्य वाचक । भेद भी इसमें ॥ ८१ ॥ इस शास्त्रमें है एक । श्रीकृष्ण वाच्य वाचक । जानते हैं सभी लोक । प्रसिद्ध यह ॥ ८२ ॥ इसका अर्थदान और पठन । फल-प्राप्तिमें एकही समान । वैसे वाच्य वाचकमें अभिन्न । भाव साधना यह ॥ ८३ ॥ इसीलिये मुझे इस समय । कहना नहीं है कोई विषय । मानो सब गीता है वाङ्मय । मूर्ति प्रभुकी ॥ ८४ ॥ शास्त्र-पठनमें अर्थ-फल । देकर जाते हैं ये सकल । ऐसे नहीं यह केवल । पर-ब्रह्मही है ॥ ८५ ॥ जगतपे करुणाकर । महानंद सुगम कर । अर्जुनको निमित्त कर । किया प्रकट ॥ ८६ ॥ ८५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

चकोरको कर निमित्त । त्रिभुवनको जो संतप्त । शांत करता कलावंत । चंद्रमा जैसे ॥ ८७ ॥ अथवा गौतमको बनाके साधन । मिटाते कलिकाल ज्वरका पीड़न । नीचे छोड़ दिया शंकरने महान । गंगा-प्रवाह ॥ ८८ ॥ वैसे गीताका यह पय । बनाके वत्स धनंजय । देती श्रीकृष्ण रूप गाय । विश्वको बहु ॥ ८९ ॥ श्रद्धासे यदि यहां डूबेंगे । आप तद्रूप बन जायेंगे । पाठसे यदि-जीभ करेंगे । गीली तो भी ॥ १६९० ॥ एक अंशसे यदि पारस । लोहको कर देता है स्पर्श । तो भी वह होता है सरस । सुवर्ण जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे पाठ रूपसे यह कटोरा । होंठोंको लगायेंगे ये श्लोक सारा । ब्रह्म-प्रेमसे होगा शरीर सारा । सतेज पुष्ट ॥ ९२ ॥ उस ओर करके यदि टेढ़ा मुख । लेंगे यदि थोड़ा श्रवण सुख । उससे भी मिलेगा वहां देख । होगी वही प्राप्ति ॥ ९३ ॥ इसका श्रवण पाठ और अर्थ । नहीं देता है मोक्षसे अन्य बात । नहीं न कहता है दाता समर्थ । किसीको जैसे ॥ ९४ ॥ पा लेनेमें यों संपूर्ण । पूर्ण है गीताका सेवन । अन्य शास्त्रोंका कारण । रहता है फिर ॥ ९५ ॥ कृष्णार्जुनकी खुली । गोष्ठी जो ऐसी निराली । व्यासने की करतल- । में आए ऐसी ॥ ९६ ॥ शिशुको ले बैठती लाड़से । माता भोजनके निमित्तसे । कौर बना देती है वह उसे । जैसे चाहता वह ॥ ९७ ॥ अथवा जो असीम पवन । करनेमें अपना आधीन । बनाते हैं पंरवासा साधन । शयाने जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे शब्दसे न हो लाभ । उसके बनाके अनुष्टुभ । सम हो स्त्री शूद्रकी प्रतिभा । कहा ऐसे ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६०

जैसे यदि स्वातीका नीर । न बनाता मोति सुंदर । तो सुंदर शरीर पर । शोभता कैसे ॥ १७०० ॥ नाद यदि वाद्यमें न आता । तब है कैसे गोचर होता । फूल यदि गंध नहीं देता । तो परिमल कैसे ॥ १ ॥ मधुर नहीं होता यदि अन्न । चखती है क्या फिर रसना । तथा दर्पण बिन नयन । नयन देखे कैसे ॥ २ ॥ दृष्टा जो श्रीगुरुमूर्ति । नहीं आते दृश्य-पंक्ति । तब कैसे हैं उपास्ति । पाते उनको ॥ ३ ॥ वैसे वस्तु जो असंख्यात । उनको संख्या शत सात । न करते वह प्रस्तुत । जान सकते कौन ॥ ४ ॥ मेघ सिंधुका पानी लेता । तो भी विश्व मेघ देखता । असीम हाथमें न आता । इसीलिये ॥ ५ ॥ तथा वाचामें जो नहीं आता । वह सुंदर श्लोक बनाता । सुखसे कान भोग सकता । ऐसे होता क्या ? ॥ ६ ॥ इसी लिये व्यासका है महान । हुवा विश्वमें उपकार मान । आकार दे श्रीकृष्ण कथन । किया ग्रंथ ॥ ७ ॥ कविकी नम्रता— और वही है जो मैं अब । व्यासके देख पद सब । लाया श्रवण पथमें शुभ । देश भाषाके ॥ ८ ॥ व्यासादिकोंके उन्मेख । होते जहां है साशंक । वहां पे मैं एक रंक । बोलता बहु ॥ ९ ॥ किंतु गीतेश्वर है भोला । ले व्यासोक्ति सुमनमाला । फिर भी मेरे दूर्वादला । ना नहीं कहता ॥ १७१० ॥ जैसे क्षीर-सिंधुके तट पर । पानी पीने आते हैं गज ढेर । किंतु रोकता क्या सिंधु घुरघुर । तू न आ कहके ॥ ११ ॥ ८६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

पंखेरू फूटा हुवा पर । न उड़ता नभमें स्थिर । गगनाक्रमी जो सत्वर । गरुडमी वहीँ ॥ १२ ॥ राजहंसका चलना । पृथ्वीपे उत्तम माना । तो क्या औरोंका चलना । मानना क्या वर्ज ॥ १३ ॥ अजी ! अपनेमें लेकर आकाश । जल भरलेता बहुत कलश । कुल्लेमें होता है अल्पसा आकाश । आता न उतना पानी ? ॥ १४ ॥ मशालका आकार विशेष । देता वह बहुत प्रकाश । बाति भी अपना-सा तेजस । देती है न ? ॥ १५ ॥ अजी ! समुद्रका विस्तार है जैसा । उसमें आकाश आभास वैसा । छोटेसे डबरेमें पड़ता वैसा । बिंब भी छोटा ॥ १६ ॥ जैसे व्यासादिककी महामती । इस ग्रंथको बखानने आती । हमने भी मानके यही युक्ति । कही अपनी भी ॥ १७ ॥ सागरमें जहां जलचर । संचरते हैं पर्वताकार । वहां जानता हूं मैं शफर । तरना जानता ॥ १८ ॥ पास ही रहकर अरुण । करता है सूर्यका दर्शन । तब भूतलकी चींटी जान । न देखता क्या सूर्य ॥ १९ ॥ इसीलिये हम हैं प्राकृत । देशी आकारमें लाते गीता । यह करना है अनुचित । कैसे भला ॥ १७२० ॥ बाप जहां आगे चलता । पुत्र ही वही अनुगमता । पुत्र वहां न पहुंचता । नहीं कोई कारण ॥ २१ ॥ वैसे व्यासका कर अनुकार । भाष्यकारोंसे राह पूछ कर । अयोग्य वहां न पहुंचकर । जाऊंगा कहां मैं ॥ २२ ॥ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा— तथा पृथ्वी है जिसकी क्षमा । न ऊबती स्थावर जंगमा । जिसके अमृतसे चंद्रमा । देता विश्वको शांति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६२

जिसके अंगका अंश भर । तेज लेकर ही जो भास्कर । करता है विपत्तियां दूर । अंधारकी ॥ २४ ॥ समुद्रको जिसका तोय । तोयको जिसका माधुर्य । माधुर्यमें जो है सौंदर्य । उससे ही ॥ २५ ॥ पवनको जिसका बल । जिससे आकाश विशाल । तथा ज्ञान भी उज्ज्वल । उससे सार्वभौम ॥ २६ ॥ जिससे हैं वेद सुभाष । सुख है जिससे सोल्हास । रहने दे जो है रूपस । विश्व उससेही ॥ २७ ॥ सर्वोपकारी वह समर्थ । सद्गुरु है श्रीनिवृत्तिनाथ । बैठ कर मुझमें ही स्थित । है निरंतर ॥ २८ ॥ उसी श्रीगुरुसे है गीता-ज्ञान । मिला मुझे किसी श्रम बिन । करना देशीमें वह कथन । इसमें क्या आश्चर्य ॥ २९ ॥ श्रीगुरूके नामसे मृत्तिका- । मूर्ति रख वनमें विद्याका । टेव कर डंका श्रेष्ठताका । बताया भिल्लने ॥ १७३० ॥ जो चंदनसे वेष्टित । होते चंदनसे सुगंधित । वसिष्ठकी काठी प्रकाशित । हुई सूर्यसी स्पर्धासे ॥ ३१ ॥ और मैं हूं यहां चित्त संपन्न । कृपा-दृष्टिसे होता पदासीन । ऐसा श्रीगुरु है सामर्थ्यवान । सिरपे मेरे ॥ ३२ ॥ सहज ही है जो स्वच्छ दृष्टि । उसे मिलती सूर्यकी पुष्टि । वह न देखता ऐसी गोष्टि । क्या है विश्वमें ॥ ३३ ॥ इसीलिये है मेरे नित्य-नूतन । श्वासोच्छ्वास करते काव्य कथन । गुरुकृपासे सभी संभव जान । कहता ज्ञानदेव ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें— लाया मैं इसी कारण । गीतार्थ देशीमें जान । किया है इसका जन- । दृष्टिका विषय ॥ ३५ ॥ ८६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग-

किंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीता-पद मधुर । न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ ३६ ॥ और कहेंगे यदि मूल गा कर । बनेगा वह मूलका अलंकार । वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ ३७ ॥ चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान । सुंदर तनुका बना भूषण । वह अति योग्य ॥ ३८ ॥ या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति । या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ ३९ ॥ या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हुवा हो उसका । एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १७४० ॥ मूल सहित भी जो है सजता । उसके बिना भी जो है शोभा लाता । रचा मैंने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ ४१ ॥ इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध । ब्रह्म-रसमें हैं सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ ४२ ॥ कभी चंदनका तरुवर । सुगंधके लिये फूलकर । फलने तक लगाके देर । बैठना पड़ता क्या ॥ ४३ ॥ यह प्रबंध जो सुनता । तत्क्षण समाधिमें जाता । कान व्यसन ही लगाता । व्याख्यान सुननेका ॥ ४४ ॥ तथा पाठ करनेसे नित्य । आता है पाठकमें पांडित्य । अनुभवनेसे है लालित्य । भूलेगा अमृत ॥ ४५ ॥ कवित्व हुवा ऐसे यह सरल । विश्रांति स्थान हुवा सुख-महल । श्रवण मननसे ध्यान निर्मल । जीतेगा यह ॥ ४६ ॥ स्वानंद भोग यह बढिया । देगा किसीको भी हो सदया । पोषित होंगी सभी इंद्रियां । सुनने केवल ॥ ४७ ॥ चंद्रामृत करके स्वाधीन । भोगता चकोर बुद्धिमान । किंतु पाते हैं चंद्र किरण । सभी लोग ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६४

वैसे अध्यात्म शास्त्रमें निपुण । अंतरंगके अधिकारी जान । किंतु वाक्चातुर्यसे सभी जन । पाएंगे सुख ॥ ४९ ॥ वैसे श्रीनिवृत्तिनाथका । महान गौरव है नीका । ग्रंथ नहीं यह उनका । कृपा-गौरव ॥ १७५० ॥ इस ज्ञानकी आदि परंपरा— क्षीरसागरका परिसर । माता शक्तिका कर्ण कुहर । बोला त्रिपुरारी श्रीशंकर । न जाने कब ॥ ५१ ॥ क्षीर कलोलमें रत । मकरोदरमें गुप्त । था यह उसके हाथ । आया सहज ॥ ५२ ॥ वह श्रीमत्स्येंद्र सप्त-शृंगपर । भग्न तन चौरंगीसे मिलकर । कृपासे किया उसको सशरीर । पूर्णांग पूर्ण ॥ ५३ ॥ फिर अखंड समाधि भोगना । उनको होनेसे यह वासना । दिया श्रीगोरक्षनाथको दान । वह मुद्रा ॥ ५४ ॥ उन्होंने योगाब्जिनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक्य वीर । उस पदमें वह सर्वेश्वर । किया अभिषेक ॥ ५५ ॥ फिर वह जो शांभव । अद्वयानंद वैभव । प्राप्त किया स-प्रभव । 'श्रीगहनीनाथने ॥ ५६ ॥ फिर वह कलिकाल ग्रस्त । भूतमात्रका करने हित । आज्ञा दी जो निवृत्तिनाथ । इस भांति ॥ ५७ ॥ यह जो आदि गुरु शंकर । से चला शिष्य-परंपरा । बोध लाभ आया है संसार । हम तक जो ॥ ५८ ॥ वह सब लेकर तू संपूर्ण । कलिसे ग्रस्त जीवोंका जीवन । संकटसे करने विमोचन । सहाय कर तू सत्वर ॥ ५९ ॥ पहले ही वह अति कृपालु । फिर है श्रीगुरु आज्ञाका बोल । मिला जैसे सहज वर्षाकाल । मेघोंको नित ॥ १७६० ॥ ८६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (94)

पीडितोंकी करुणाके कारण । वर्षा हुई शांत रसकी मान । तभी है यह गीतार्थ प्रथन । हुवा उससे ॥ ६१ ॥ मैं केवल निमित्त मात्र हूं— इतनेमें मैं आर्त चातक । स्वेच्छासे हुवा गुरु सम्मुख । बना यशका कारण एक । इस प्रकार ॥ ६२ ॥ ऐसे है गुरु परंपरागत । अपना समाधि-धन जो प्राप्त । दिया रचकर यह ग्रंथ । स्वामीने मुझे ॥ ६३ ॥ वैसे मैं हूं अपढ अशिक्षित । नहीं की स्वामी-सेवा अपेक्षित । कैसे हुवा रचनामें समर्थ । ऐसे ग्रंथके ॥ ६४ ॥ किंतु है सच ही श्रीगुरुनाथ । बनाके मुझे इसका निमित्त । ग्रंथ-रूपसे करते हैं हित । विश्वका चिरंतन ॥ ६५ ॥ फिर भी मैंने पुरोहित बन । किया हो कम अधिक कथन । मातृ-भावसे आप संत जन । सहन करें मुझे ॥ ६६ ॥ कैसे करना शब्दका वचन । या चढ़ते प्रमेयोंका व्याख्यान । नहीं मुझे इसका भी ज्ञान । अलंकार क्या है ? ॥ ६७ ॥ श्रीगुरुकी मैं कठपुतली । जैसे वे चलाते वैसे चली । मुझे आगे कर स्वयं ही बोली । गुरु-माता मेरी ॥ ६८ ॥ इसलिये मैं कोई गुण-दोष । विषयमें क्षमा बिना विशेष । आचार्य-संजात ग्रंथ अशेष । कहता हूं मैं ॥ ६९ ॥ यदि इसमें कोई न्यूनता रही तो इसका दायित्व आप पर है— तथा आप संत समाजमें । यदि न्यून रहा हो इसमें । वह मिटा नहीं तो स्नेहमें । रूठेंगे आपसे ॥ १७७० ॥ होने पर भी पारसका स्पर्श । न मिटिती लोहेकी हीन दशा । तब इसका किसका है दोष । कहें आप ही ॥ ७१ ॥ नालेको यही करना । गंगा में जाके डूबना । फिर भी गंगा न बना । दोषि किसका ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६६

इसलिये मैं अति भाग्यसे । आया संतोंके पगमें ऐसे । तमी विश्वमें मुझे इससे । खामी है किसकी ॥ ७३ ॥ जीवन कृतार्थ हुवा है आज— अजी ! मेरे स्वामी नाथ । मुझे जोड दिये संत । हुवा सबमें कृतार्थ । इससे आज ॥ ७४ ॥ आपके साथ रहकर । फूटे मुझमें सुखांकुर । तथा ग्रंथका हठ पूरा । हुवा आज ॥ ७५ ॥ अजी ! अब कनकसे अखिल । ढाल सकेंगे यह भूमंडल । चिंता रत्नोंसे सप्त-कुलाचल । कर सकेंगे निर्माण ॥ ७६ ॥ अजी ! जो सागर सात । उनमें भरना अमृत । होगी तारोंसे तारानाथ । रचना सहज ॥ ७७ ॥ तथा कल्पतरुका आराम । लगाना नहीं विषम । किंतु है गीतार्थ मर्म । न होगा स्पष्ट ॥ ७८ ॥ एक मैं ऐसा सर्व-मूक । बोल करके देशी भाषा । आंखोंसे ही ले सके लोक । ऐसा करता हूं ॥ ७९ ॥ इतना बड़ा ग्रंथ सागर । उतार ले जाना पैलतीर । फड़काना यश-ध्वज फिर । वहां पहुंचनेका ॥ १७८० ॥ गीतार्थका बनाकर भवन । कलशका मेरू गिरि महान । उसमें मैं गुरुलिंग पूजन । करता हूं यह ॥ ८१ ॥ गीता है जो निष्कपट माता । उसे भूल शिशु भटकता । उसका यह मिलन होता । आपके पुण्यसे ॥ ८२ ॥ आप संतोंने जो कुछ दिया । वही सब मैं बोलता भया । यह वैसे अल्प कहा जाय । कहता ज्ञानदेव ॥ ८३ ॥ क्या बोलूं मैं अब बोल । पा लिया मैंने सब जन्म-फल । ग्रंथ-सिद्धिका यह जो निर्मल । देखा समारोह ॥ ८४ ॥ ८६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

मैंने जिस जिसकी आशा । की कर आपका भरोसा । वह पूर्ण किया बहुतसा । सुखसे आपने ॥ ८५ ॥ यह अनुपम ग्रंथरत्न है— मुझसे इस ग्रंथका महान् । बना लिया नव-सृष्टि निर्माण । देखके हंसते मन ही मन । विश्वामित्रको हम ॥ ८६ ॥ देख कर भी त्रिशंकुका दोष । विधाताको ओछा बनाके खास । बनाई सृष्टि होती है जो नाश । वैसी नहीं है यह ॥ ८७ ॥ शंभुने कर उपमन्युका लोभ । उसको दिया है क्षीराब्धिका लाभ । किंतु वह भी रहा है विषगर्भ । नहीं उपमायोग्य ॥ ८८ ॥ अंधकारका जो निशाचर । निगलता जब चराचर । तारता भी है यदि भास्कर । देकर ताप ॥ ८९ ॥ संतप्त जगतके कारण । चंद्र देता शीतल किरण । उससे भी यह न समान । चंद्र है कलंकित ॥ १७९० ॥ आप संतोंने जो मुझपर । ग्रंथ-रूप किया उपकार । मैं कहता हूं कर विचार । विश्वमें अनुपम ॥ ९१ ॥ यह जो आपके कारण । सिद्ध हुवा है धर्म-कीर्तन । यहां रहा सेवकपन । मेरा केवल ॥ ९२ ॥ सेवाका मूल्य-रूप प्रसाद-दान— मुझको दे अब विश्वात्मक देव । इस वाग्यज्ञ यज्ञसे तुष्ट हो सदैव । संतुष्ट होकर दें यह वैभव । पसाय दानका ॥ ९३ ॥ मिटे इससे खलोंकी खलता । उनमें बढे सत्कर्म-प्रियता । प्राणियोंमें परस्पर मित्रता । हो जीव भावकी ॥ ९४ ॥ मिटे दुरितका तिमिर । विश्व देखे स्वधर्म-भास्कर । जो जो चाहे सो पावे वर । प्राणिमात्र ॥ ९५ ॥ बरसत रहे सकल मंगल । बने सदा ईश-निष्ठोंके मंडल । अनवरत जीव यह सकल । पाये भूमंडलके ॥ ९६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६८

कल्पतरुके हो चलते उपवन । गांव हो चैतन्य चिंतामणिके खान । सतत अमृत-सिंधु सम वचन । मिले परस्पर ॥ ९७ ॥ चंद्रमा हो यहां अलांछन । तथा मार्तंड हो ताप हीन । सदा प्रिय हो सभी सज्जन । सबसे आप्त ॥ ९८ ॥ अथवा पाये सभी सुख । पूर्ण होकर तीनो लोक । और भजे आदि पुरुष । अखंडित ॥ ९९ ॥ तथा है इस लोकमें जिसे । यह ग्रंथही जीवन उसे । पाये पूर्ण विजय इससे । दृष्ट अदृष्ट पर ॥ १८०० ॥ तब कहे श्रीगुरु महान । मिलेगा यह प्रसाद-दान । इससे सुखी मनही मन । हुवा ज्ञानदेव ॥ १ ॥

गीता श्लोक ७८ ओवी १८०१ ज्ञानेश्वरी संपूर्ण

८६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

—:श्रीगुरुका प्रसाद-दान ग्रंथ लेखनका स्थान काल:— ऐसे यह कलियुगमें । है महाराष्ट्रमंडलमें । गोदावरीके किनारेमें । दक्षिणका जो ॥ १ ॥ या त्रिभुवनैक पवित्र । अनादि पंचक्रोश क्षेत्र । जगका जहां जीव-सूत्र । है महालया ॥ २ ॥ वहां यदुवंश विलास । जो सकलकलानिवास । न्यायसे पोसता क्षितीश । श्रीरामचंद्र ॥ ३ ॥ वहां महेशान्वय संभूत । है जो श्रीनिवृत्तनाथ सुत । गाया ज्ञानदेव ये गीत । देशीका भूषण ॥ ४ ॥ एवं श्रीभारतकी गोदमें । प्रसिद्ध भीष्मनाम पर्वमें । श्रीकृष्णार्जुनने वैभवमें । गोष्टि जो की है ॥ ५ ॥ उपनिषदका है सार । सब शास्त्रोंका मातृ-घर । परम-हंस सरोवर । करते सेवन ॥ ६ ॥ उस गीताका यह कलश । संपूर्ण हुवा है अष्टादश । कहता श्रीनिवृत्तिका दास । ज्ञान देव ॥ ७ ॥ पुनः पुनः आगे भी इससे । इस ग्रंथ पुष्प-संपत्तिसे । सर्वभूत सर्वतोमुखसे । होना है संपूर्ण ॥ ८ ॥ श्रीशक बारह शत बारा । टीका बोला यह ज्ञानेश्वर । सच्चिदानंद बाबा सादर । हुवा लिपिक ॥ ९ ॥ ॐ ज्ञानेश्वरी ५७१

महाराष्ट्रके दूसरे एक महान संत श्री एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी ग्रंथका संशोधन करके इस ग्रंथके विषयमें निम्न अभिप्राय लिख रखा है । श्रीशक पंद्रह सौ छ उत्तर । आया तारण नाम संवत्सर । एका जनार्दनने अत्यादर । की ज्ञानेश्वरी प्रति शुद्ध ॥ १ ॥ पहले ही था ग्रंथ अति शुद्ध । पाठांतरसे था शुद्ध अबद्ध । शोधित कर वह एवं बिध । शुद्ध सिद्ध प्रति ज्ञानेश्वरी ॥ २ ॥ नमो ज्ञानेश्वर निष्कलंक । पढके उनके गीता टीका । ज्ञानी होंगे जो ग्रंथार्थि लोक । भाविक अत्यंत ॥ ३ ॥ बहुकाल पर्वणी गोमटी । भाद्रपदकी कपिला षष्ठी । प्रतिष्ठानमें है गोदा तटी । लेखन संपूर्ण ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर - स्तुति - सुमन सत - नामदेव ज्ञानराज मेरी योगियोंकी माय । उनसे प्रकट हुवा निगमकाय ॥ १ ॥ गीता अलंकार नाम ज्ञानेश्वरी । प्रकट गई है ब्रह्मानंदलहरी ॥ २ ॥ अध्यात्म - विद्याका दिखाया है रूप । उजला दिया है चैतन्य - महादीप ॥ ३ ॥ देशी भाषाओंका किया है गौरव । छोड दी उसने भावार्णवमें नाव ॥ ४ ॥ श्रवण निमित्त बैठना आकर । स्वानंद पीठपे सुखसे निरंतर ॥ ५ ॥ नामा कहे श्रेष्ठ ग्रंथ ज्ञानेश्वरी । प्रतीत करो जी चितमें एक ओवी ॥ ६ ॥ ८७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

संत एकनाथ महाराज— कैवल्यका है पूतला । प्रकट हुवा है भूतला । चैतन्यकी जो चित्कला । ज्ञानदेव मेरा ॥ साधकके हैं मायबाप । दर्शनसे हरता पाप । सब भूतोंमें सुखरूप । ज्ञानदेव मेरा ॥ ज्ञानियोंका जो मुकुटमणि । चिंतनशीलौंका चिंतामणि । पूज्य स्थानमें जो महान ज्ञानी । ज्ञानदेव मेरा ॥ चलाकर दिखायी जड़ भित्ति । हरण की चांगदेवकी भ्रांति । मोक्ष-मार्गका है महान साथी । ज्ञानदेव मेरा ॥ भैसेके मुखसे वेद कहलाया । ब्रह्म वृंदका अभिमान मिटाया । शांतिका पुतला बन व्यक्त भया । ज्ञानदेव मेरा ॥ परब्रह्म साम्राज्यकी है दीपिका । कही तूने गीताकी भावार्थ दीपिका । पंढरीके विठ्ठलका तू प्राणसखा । ज्ञानदेव मेरा ॥ गुरुसेवाके लिये जान । शरण एका जनार्दन । त्रिभुवनका जीवन । ज्ञानदेव मेरा ॥ 'ज्ञानेश्वरी ८७२

परिशिष्ट पहला श्रीमद्भगवद्गीताके पहले अध्यायमें जिन महारथियोंके नाम आये हैं उनका अल्प-सा जीवन परिचय ।

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परिशिष्ट पहला अ० १. श्लो० १-धृतराष्ट्र सत्यवतीकी आज्ञासे व्यास द्वारा उत्पन्न अंबिकाका पुत्र । गर्भाधानके समयमें व्यासका तेज सहन न होनेसे अंबिकाने आंखें मूंद लीं इसलिये यह जन्मांध रहा । भीष्मके निरीक्षणमें इसकी शिक्षा दीक्षा हुई । यह बुद्धिमान् होनेसे शास्त्र संपन्न था । गांधारीसे विवाह । गांधारीके अतिरिक्त सत्यव्रता, सत्यसेना, सुदेष्णा, संहिता, तैजःश्रवा, सुश्रवा, शम्वठा, तोया दशार्णा ये नामभी उनकी स्त्रियोंके रूपमें मिलते हैं । गांधारीके दुर्योधनादि सौ पुत्र तथा दुःशला नामकी एक पुत्री थी । जब कौरवोंने पांडवोंको छलना प्रारंभ किया तब यह बिना कुछ कहे स्वस्थ रहा । लाक्षागृहमें पांडवोंकी मृत्यु हुई यह जान कर इसने "दिखावटी" शोक पर्याप्त किया । तथा द्रौपदी स्वयंवरके बाद-आधा राज्य भी दिया । दुर्योधनके कपट द्यूतके लिये धृतराष्ट्रकी पूर्ण सम्मति थी । दुर्योधनने पांडवोंको जीता यह सुनकर इसने अत्यंत हर्ष प्रकट किया था। द्रौपदीकी मानखंडना करते समय इसने कौरवोंको परावृत्त नहीं किया । इस समय यह स्वस्थ रहा किंतु आगे द्रौपदीके कहनेसे इसने पांडवोंको कौरवोंके दासत्वसे मुक्त किया । पांडव-वनवास समाप्त होनेके बाद जब शिष्टाई होने लगी तब इसने युधिष्ठिरको "तू दुर्योधनसे युद्ध करके अपने तेरह वर्षकी तपस्याका नाश मत कर । यदि दुर्योधन राज्य नहीं देता है तो भिक्षान्न पर जीवन कर किंतु दुर्योधनसे युद्ध न कर !" ऐसा उपदेश दिया था । जब थोडे समय बाद भारत युद्ध प्रारंभ हुवा तब यह युद्ध नहीं देख सकता था । इसलिये युद्धकी वार्ता कहनेके लिये संजयकी नियुक्ति की गयी । युद्धमें जब भीष्म द्रोणादि वीर मारे गये, अन्य भी अनेक योद्धा पडे तब इसको कृष्णका वचन स्मरण हो आया "इस युद्धसे कुरुकुलका संपूर्ण विनाश हो आयगा ।" और इसने दुर्योधनको "पांडवोंको उनका योग्य दायभाग देनेको" कहा किंतु इसका कोई उपयोग नहीं हुवा । अंतमें संपूर्ण कुरु सैन्यमें अश्वत्थामा, कृप, तथा कृतवर्मा यही तीन महारथी रहे तब धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे अत्यंत विव्हल हुआ । भीमने ही इसके सर्वाधिक पुत्रोंको मारा था इसलिये यह भीमसे बड़ा ही द्वेष करता था । युद्धके बाद प्रेमालिंगनके बहाने यह भीमको दबा कर मारना चाहता था । किंतु यह कपट जानकर कृष्णने भीमके स्थान पर लोहेकी एक मूर्ति आगे की और इसने उस मूर्त्तिका चूर्णही बना दिया । जब इसको वस्तुस्थितिका ज्ञान हुवा तब बड़ा ही लज्जित हुवा । जब युधिष्ठिर हस्तिनापुरके सिंहासन पर बैठा इसने युधिष्ठिरको राजनीतिशास्त्रका उपदेश दिया । अंतमें यह वनवास के लिये गया और वहां तपाचरण करते समय ही वनमें लगी आगमें जल कर मर गया । धृतराष्ट्रकी मृत्युके समय उसका एक भी पुत्र जीवित नहीं था ।