ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराष्ट्रके दूसरे एक महान संत श्री एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी ग्रंथका संशोधन करके इस ग्रंथके विषयमें निम्न अभिप्राय लिख रखा है । श्रीशक पंद्रह सौ छ उत्तर । आया तारण नाम संवत्सर । एका जनार्दनने अत्यादर । की ज्ञानेश्वरी प्रति शुद्ध ॥ १ ॥ पहले ही था ग्रंथ अति शुद्ध । पाठांतरसे था शुद्ध अबद्ध । शोधित कर वह एवं बिध । शुद्ध सिद्ध प्रति ज्ञानेश्वरी ॥ २ ॥ नमो ज्ञानेश्वर निष्कलंक । पढके उनके गीता टीका । ज्ञानी होंगे जो ग्रंथार्थि लोक । भाविक अत्यंत ॥ ३ ॥ बहुकाल पर्वणी गोमटी । भाद्रपदकी कपिला षष्ठी । प्रतिष्ठानमें है गोदा तटी । लेखन संपूर्ण ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर - स्तुति - सुमन सत - नामदेव ज्ञानराज मेरी योगियोंकी माय । उनसे प्रकट हुवा निगमकाय ॥ १ ॥ गीता अलंकार नाम ज्ञानेश्वरी । प्रकट गई है ब्रह्मानंदलहरी ॥ २ ॥ अध्यात्म - विद्याका दिखाया है रूप । उजला दिया है चैतन्य - महादीप ॥ ३ ॥ देशी भाषाओंका किया है गौरव । छोड दी उसने भावार्णवमें नाव ॥ ४ ॥ श्रवण निमित्त बैठना आकर । स्वानंद पीठपे सुखसे निरंतर ॥ ५ ॥ नामा कहे श्रेष्ठ ग्रंथ ज्ञानेश्वरी । प्रतीत करो जी चितमें एक ओवी ॥ ६ ॥ ८७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग