भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 947

परिशिष्ट पहला अ० १. श्लो० १-धृतराष्ट्र सत्यवतीकी आज्ञासे व्यास द्वारा उत्पन्न अंबिकाका पुत्र । गर्भाधानके समयमें व्यासका तेज सहन न होनेसे अंबिकाने आंखें मूंद लीं इसलिये यह जन्मांध रहा । भीष्मके निरीक्षणमें इसकी शिक्षा दीक्षा हुई । यह बुद्धिमान् होनेसे शास्त्र संपन्न था । गांधारीसे विवाह । गांधारीके अतिरिक्त सत्यव्रता, सत्यसेना, सुदेष्णा, संहिता, तैजःश्रवा, सुश्रवा, शम्वठा, तोया दशार्णा ये नामभी उनकी स्त्रियोंके रूपमें मिलते हैं । गांधारीके दुर्योधनादि सौ पुत्र तथा दुःशला नामकी एक पुत्री थी । जब कौरवोंने पांडवोंको छलना प्रारंभ किया तब यह बिना कुछ कहे स्वस्थ रहा । लाक्षागृहमें पांडवोंकी मृत्यु हुई यह जान कर इसने "दिखावटी" शोक पर्याप्त किया । तथा द्रौपदी स्वयंवरके बाद-आधा राज्य भी दिया । दुर्योधनके कपट द्यूतके लिये धृतराष्ट्रकी पूर्ण सम्मति थी । दुर्योधनने पांडवोंको जीता यह सुनकर इसने अत्यंत हर्ष प्रकट किया था। द्रौपदीकी मानखंडना करते समय इसने कौरवोंको परावृत्त नहीं किया । इस समय यह स्वस्थ रहा किंतु आगे द्रौपदीके कहनेसे इसने पांडवोंको कौरवोंके दासत्वसे मुक्त किया । पांडव-वनवास समाप्त होनेके बाद जब शिष्टाई होने लगी तब इसने युधिष्ठिरको "तू दुर्योधनसे युद्ध करके अपने तेरह वर्षकी तपस्याका नाश मत कर । यदि दुर्योधन राज्य नहीं देता है तो भिक्षान्न पर जीवन कर किंतु दुर्योधनसे युद्ध न कर !" ऐसा उपदेश दिया था । जब थोडे समय बाद भारत युद्ध प्रारंभ हुवा तब यह युद्ध नहीं देख सकता था । इसलिये युद्धकी वार्ता कहनेके लिये संजयकी नियुक्ति की गयी । युद्धमें जब भीष्म द्रोणादि वीर मारे गये, अन्य भी अनेक योद्धा पडे तब इसको कृष्णका वचन स्मरण हो आया "इस युद्धसे कुरुकुलका संपूर्ण विनाश हो आयगा ।" और इसने दुर्योधनको "पांडवोंको उनका योग्य दायभाग देनेको" कहा किंतु इसका कोई उपयोग नहीं हुवा । अंतमें संपूर्ण कुरु सैन्यमें अश्वत्थामा, कृप, तथा कृतवर्मा यही तीन महारथी रहे तब धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे अत्यंत विव्हल हुआ । भीमने ही इसके सर्वाधिक पुत्रोंको मारा था इसलिये यह भीमसे बड़ा ही द्वेष करता था । युद्धके बाद प्रेमालिंगनके बहाने यह भीमको दबा कर मारना चाहता था । किंतु यह कपट जानकर कृष्णने भीमके स्थान पर लोहेकी एक मूर्ति आगे की और इसने उस मूर्त्तिका चूर्णही बना दिया । जब इसको वस्तुस्थितिका ज्ञान हुवा तब बड़ा ही लज्जित हुवा । जब युधिष्ठिर हस्तिनापुरके सिंहासन पर बैठा इसने युधिष्ठिरको राजनीतिशास्त्रका उपदेश दिया । अंतमें यह वनवास के लिये गया और वहां तपाचरण करते समय ही वनमें लगी आगमें जल कर मर गया । धृतराष्ट्रकी मृत्युके समय उसका एक भी पुत्र जीवित नहीं था ।