भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 948

गीता अ. १. श्लो० १-संजय गावल्गण सूतका पुत्र । धृतराष्ट्रका सारथी और सलाहकार । दुर्योधनने भीष्मादिकी बात नहीं मानी, द्रौपदीका अपमान किया तब इसने दुर्योधनकी निंदा की थी । व्यासने संजयको दिव्य दृष्टि देकर धृतराष्ट्रको युद्ध-वार्त्ता कहनेके लिये बिठाया । यह रणभूमि पर जाता था । इसको व्यासने श्रम रहित अथक कर्म करनेकी शक्ति दी थी । साथ ही साथ "रणमें तू सदैव अवध्य रहेगा " ऐसा वर दिया था । इसने एक बार धृष्टद्युम्न पर, जब उसने स्वस्थ बैठे हुए निहत्थे द्रोणका वध किया तब, आक्रमण भी किया था किंतु धृष्टद्युम्नने इसे भगा दिया । सात्यकीने भी इसको युद्धभूमिसे मार भगाया था । दुर्योधन इसके साथ धृतराष्ट्रको संदेश भेजता था । इस परसे ऐसा लगता है कि यह स्वयं युद्ध-भूमिपर "वार्ताहर" के रूपमें रहता था और सब बातों पर अपनी दृष्टि रखता था । कृष्णार्जुन संवाद रूप गीता इसीने धृतराष्ट्रको सुनायी है । युद्धके बाद धृतराष्ट्रके साथ यह युधिष्ठिरके पास भी रहा । अंतमें जब धृतराष्ट्र वनमें गया तब विदुरकी सम्मतिसे उसे छोड़कर वनमें गया । यह अपने साथीके वियोगसे नारदकी दी हुई जानकारीके बल बूते पर धृतराष्ट्रके पीछे पीछे उनके शोधमें भी गया था । गीता अ. १. श्लो० २-दुर्योधन धृतराष्ट्रसे उत्पन्न गांधारीके सौ पुत्रोंमें प्रथम पुत्र । उत्तम रथी, शस्त्रविद्या निपुण, उत्तम सारथी, दुर्योधन और भीम एक ही दिन पैदा हुए थे । इसके जन्मके समय बहुत ही असगुन हुए थे । इसके जन्म-कालमें जो अपशकुन हुए वह देखते हुए ब्राह्मणोंने धृतराष्ट्रसे कहा था "यह कुलक्षयका कारण बनेगा । इसलिये इसका त्याग करनेमें ही भला है । यदि कुलका हित चाहते हैं तो इसका त्याग करें । कुल और राज्यकी रक्षा करें ।" बचपनमें, हर बातमें पांडव श्रेष्ठ होते थे इससे दुर्योधन उनसे द्वेष करने लगा । इस द्वेषसे दुर्योधन पांडवोंका नाश करनेकी योजनायें बनाने लगा । दुर्योधन भीमको विष खिला कर, उसके साथ खूब जल केली करने लगा और भीमके थककर बेसुध होने पर उसको हाथ पैर बांधकर गंगा में फेंकके घर आया । इस घटनासे दुर्योधनको बड़ा हर्ष हुवा था किंतु भीम लौट आया और उसने सारी बात अपने भाइयोंसे कही । कौरव और पांडव दोनों द्रोणके पास शस्त्रविद्या सीखे । विद्याध्ययन पूर्ण हुवा । कुमारोंके रण कौशल्यसे सभी प्रसन्न हुए । द्रोणने द्रुपदको युद्धमें जीतकर लानेकी गुरु दक्षिणा मांगी । तब दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ आगे गया और मार खा कर लौटा । फिर अर्जुन उसको जीत कर बंदी बनाकर लाया । दुर्योधन बलरामसे गदायुद्धकी कला सीखा । जब धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको युवराज पद देनेका निश्चय किया तब यह द्वेषसे बेभान हो गया और इसने पांडवोंको मारनेके लिये लाक्षागृहकी योजना बनाई किंतु विदुरकी पूर्व सूचनाके कारण पांडव इससे बच निकले । यहां भी दुर्योधन हारा और धृतराष्ट्रने पांडवोंको इंद्रप्रस्थमें ला रखा । काशीराजाकी लड़की भानुमती इसकी पत्नी थी । यह कलिंग देशका राजा चित्रांगदकी पुत्रीको स्वयंवरमें से उठाकर लाया था । पांडवोंने इंद्रप्रस्थमें राज्य करते हुए राजसूय यज्ञ किया । उस यज्ञमें यह कोषाध्यक्ष था । दुर्योधनने वहां अत्यधिक व्यय किया फिर भी धनकी कोई तंगी नहीं हुई । सारा खर्च करके भी ज्ञानेश्वरी २