भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 949

कोश भरा ही रहा। साथ साथ पांडवोंकी व मयसभा देख कर, दुर्योधनको उस वैभव पर ईर्ष्या हुई । मय सभा में वहां के कृत्रिम कला कौशलको सच मान लेनेसे उसकी जो दुर्गति हुई और वह दुर्गत देख कर अन्य स्त्रियोंके साथ द्रौपदी भी हंसी इससे वह जलने लगा । वह हस्तिनापुर आया । उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनको शीलका महत्व समझाया था। किंतु पिताका वह उपदेश उसे नहीं भाया। वह पांडवोंकी संपत्ति हरण करनेकी योजना बनाने लगा और उसमेंसे कपट द्यूतकी कल्पना सूझी । शकुनीमामा इस विद्यामें पारंगत था । इस द्यूतमें पांडव अपना सर्वस्व हार गये । दुर्योधनने भरी सभामें द्रौपदीका अपमान किया । इस समय दुर्योधनने भीष्मादिकी बात भी नहीं मानी । पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भुगतना पड़ा । पांडवोंके वनवास जानेके बाद दुर्योधनने अत्यंत सुंदरतासे राज्य किया जिससे लोकप्रियता मिले । वनवास कालमें यह पांडवोंके विषयमें गुप्तरूपसे सारी बातें जानता रहा । बार बार उनको तंग करनेका प्रयास किया, लज्जित करना चाहा किंतु स्वयं अपनी दुर्गत करली । एक बार पांडव जब द्वैतवनमें थे तब वहां जा कर अपने वैभवसे उनको लजानेके प्रयासमें चित्ररथ गंधर्वसे युद्ध करना पडा और उस युद्धमें बंदी हुवा । इस युद्धमें दुःशासन और कर्ण हारकर भाग गये । तब अर्जुनने इसकी रक्षा की । इसको बंधनसे मुक्त किया । तब इसको युधिष्ठिरके सम्मुख नतमस्तक हो कर वापिस लौटना पडा । तब दुर्योधनने अपमानसे अनशन करके शरीरत्याग करनेका भी प्रयास किया था किंतु कुछ दैत्योंके और कर्णके समझानेसे वह शांत हुवा । इसी समय भीष्मने उसको पांडवोंसे साम करनेका उपदेश दिया और दुर्योधनने उसका उपहास किया । इस अपमानको धोनेके लिये दुर्योधनने राजसूय यज्ञ करनेका भी विचार किया किंतु ब्राह्मणोंने कहा "अभी इसी कुलमें युधिष्ठिरने यह यज्ञ किया है इसलिये अब यह असंभव है।" तब इसने वैष्णव याग करके पांडवोंको निमंत्रित किया । यह निमंत्रण पाकर युधिष्ठिरने अत्यंत संतोष प्रकट करते हुए "वनवास और अज्ञातवास पूर्ण होनेके प्रथम घर लौटना अनुचित है" कहकर आमंत्रण ले जानेवालेका सम्मान कर लौटा दिया । इस वनवास और अज्ञातवासमें भी यह लगातार पांडवोंके नाशकी योजना बनाता रहा । उनको कष्ट देता रहा और हरबार उनसे पराजित होता रहा । वनवास और अज्ञातवास पूर्ण करके जब पांडव घर आये तब राज्यके लिये संधान होने लगा । कृष्ण भी संधान करनेके लिये दुर्योधनके पास गया । किंतु इसका कुछ उपयोग नहीं हुवा । दुर्योधनने कृष्णसे इस युद्धमें सहाय्यार्थ यादव सैन्य मांग लिया जिसका सेनानी कृतवर्मा था । श्री परशुराम, कृष्ण, कण्व, भीष्म, द्रोण कृपाचार्य, अश्वत्थामा, आदि लोगोंने दुर्योधनको इस युद्धसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया किंतु दुर्योधनने सबका उपहास किया । कृष्णके साथ उसने अत्यंत धिटाई करके कृष्णको बंदी बनानेका प्रयास करके अपनी दुर्गत करली । इस भांति यह युगांतक युद्ध प्रारंभ हुवा । इस युद्धमें कई बार दुर्योधनका पराभव होकर यह युद्धभूमि छोडकर भागा है । युद्धके अंतमें भी जब सभी सेनापति मारे गये तब यह घबडाकर द्वैपायन सरोवरमें छुपकर बैठ गया ! युधिष्ठिरके कठोर भाषणसे क्रोधावेशसे बाहर आये दुर्योधनके साथ तब भीमका गदायुद्ध हुवा । उस युद्धमें यह भीमसे मारा गया । ३ परिशिष्ट १