भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 950, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 950

अ० १. श्लो० २-द्रोणाचार्य आंगिरस गोत्रीय भरद्वाज ऋषिका पुत्र । तपश्चर्यामें रत भरद्वाज ऋषि घृताची नामकी अप्सरासे मोहित होकर जो पुत्र हुवा वही द्रोण है। द्रोणके द्रोणाश्व, रुक्मरथ, भारद्वाज ऐसे भी नाम हैं। द्रोणाचार्यने अपने पिताके पास ऋग्वेशादिके साथ धनुर्वेदका अध्ययन भी किया था। भरद्वाज महान् विद्वान था। बृहस्पतिने इन्हे आग्नेयास्त्र दिया था । द्रुपदराजा द्रोणाचार्यका सहा- ध्यायी था। जब द्रोणाचार्य तपश्चर्या कर रहे थे द्रोणाचार्यको यह जानकारी मिली कि जमदग्नि पुत्र परशुराम ब्राह्मणोंको धन बांट रहे हैं। परशुरामके पास गये। परशुरामने सारा धन पहले ही बांट दिया था इसलिये द्रोणाचार्यको अपनी शस्त्र-विद्या दी। इसी समय द्रोणाचार्यको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति हुई। द्रोणाचार्य अस्त्र विद्या निपुण हो गये किंतु आर्थिक दुरवस्थासे मुक्ति नहीं मिली। आर्थिक दृष्टिसे ये अत्यंत विपन्नावस्था भोग रहे थे। तभी द्रव्यार्जनके लिये द्रुपदराजाके पास गये और द्रुपदराजाने इनको अपमानित किया। इससे अस्वस्थ द्रोणाचार्य हस्तिनापुर गये। भीष्माचार्य द्रोणाचार्यकी विद्वत्तासे संपूर्ण परिचित थे। कौरव पांडवोंको शिक्षार्थ उन्हीके पास भेजना चाहते थे किंतु वे ही चलकर यहां आये थे। तब भीष्माचार्यने बडे ही सन्मानसे द्रोणाचार्यका स्वागत करके उन्हे राज-पुत्रोंका गुरुस्थान दे दिया। इससे देशके भिन्न भिन्न नगरोंके विद्यार्थी उनके पास अस्त्रविद्या सीखने आने लगे। उस समयके अनेक राज-पुत्र द्रोणाचार्यके शिष्य रहे हैं। एक बार आचार्य अपने विद्यार्थियोके साथ नदी पर स्नान करने गये थे। एक बडे मगरने द्रोणाचार्यको पकड लिया। यह देख कर अर्जुनके बिना और सब विद्यार्थी डरके मारे भाग गये किंतु अर्जुनने मगरको मार कर गुरुको छुडा लिया तभी द्रोणाचार्यने अकेले अर्जुनको ब्रह्मास्त्रका सप्रयोग ज्ञान दिया। जब द्रोणाचार्यने देखा अपने सभी विद्यार्थी अस्त्र-विद्या पारंगत हो गये हैं आचार्यने द्रुपदराजको बंदी बना कर अपने सामने ला देने की गुरु-दक्षिणा मांगी तब अर्जुनने वह काम किया। जब द्रुपद बंदी बन कर उनके सामने लाया गया तब द्रोणाचार्यने उसका आधा राज उत्तर पांचाल अपने पास रख कर आधा राज उसको छोड दिया। पांडव जब बनवास और अज्ञातवास पूरा करके आये और अपना अधिकार मांगने लगे तब द्रोणाचार्यने दुर्योधनको बहुतेरा समझाया तब कर्णने इसे पांडव-पक्षपात मानकर द्रोणाचार्यको भला बुरा कहा इस समय, कर्ण-द्रोण-वाद तलवारसे निपटनेका प्रसंग आया था किंतु भीष्माचार्यने बीच बचाव किया। दुर्योधनने किसीकी नहीं मानी और युद्धकी नौबत आयी। जीवन भर जिसके साथ बिताया उसका आपत्कालमें साथ छोडना द्रोणाचार्यने उचित नहीं माना और युद्धमें दुर्योधनका साथ दिया। युद्धके दसवे दिन कौरव सेनापति भीष्मका पतन हुवा तब द्रोणाचार्य सेनापति बनाये गये। ज्ञानेश्वरी ४

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