ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अ० १. श्लो० २-द्रोणाचार्य आंगिरस गोत्रीय भरद्वाज ऋषिका पुत्र । तपश्चर्यामें रत भरद्वाज ऋषि घृताची नामकी अप्सरासे मोहित होकर जो पुत्र हुवा वही द्रोण है। द्रोणके द्रोणाश्व, रुक्मरथ, भारद्वाज ऐसे भी नाम हैं। द्रोणाचार्यने अपने पिताके पास ऋग्वेशादिके साथ धनुर्वेदका अध्ययन भी किया था। भरद्वाज महान् विद्वान था। बृहस्पतिने इन्हे आग्नेयास्त्र दिया था । द्रुपदराजा द्रोणाचार्यका सहा- ध्यायी था। जब द्रोणाचार्य तपश्चर्या कर रहे थे द्रोणाचार्यको यह जानकारी मिली कि जमदग्नि पुत्र परशुराम ब्राह्मणोंको धन बांट रहे हैं। परशुरामके पास गये। परशुरामने सारा धन पहले ही बांट दिया था इसलिये द्रोणाचार्यको अपनी शस्त्र-विद्या दी। इसी समय द्रोणाचार्यको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति हुई। द्रोणाचार्य अस्त्र विद्या निपुण हो गये किंतु आर्थिक दुरवस्थासे मुक्ति नहीं मिली। आर्थिक दृष्टिसे ये अत्यंत विपन्नावस्था भोग रहे थे। तभी द्रव्यार्जनके लिये द्रुपदराजाके पास गये और द्रुपदराजाने इनको अपमानित किया। इससे अस्वस्थ द्रोणाचार्य हस्तिनापुर गये। भीष्माचार्य द्रोणाचार्यकी विद्वत्तासे संपूर्ण परिचित थे। कौरव पांडवोंको शिक्षार्थ उन्हीके पास भेजना चाहते थे किंतु वे ही चलकर यहां आये थे। तब भीष्माचार्यने बडे ही सन्मानसे द्रोणाचार्यका स्वागत करके उन्हे राज-पुत्रोंका गुरुस्थान दे दिया। इससे देशके भिन्न भिन्न नगरोंके विद्यार्थी उनके पास अस्त्रविद्या सीखने आने लगे। उस समयके अनेक राज-पुत्र द्रोणाचार्यके शिष्य रहे हैं। एक बार आचार्य अपने विद्यार्थियोके साथ नदी पर स्नान करने गये थे। एक बडे मगरने द्रोणाचार्यको पकड लिया। यह देख कर अर्जुनके बिना और सब विद्यार्थी डरके मारे भाग गये किंतु अर्जुनने मगरको मार कर गुरुको छुडा लिया तभी द्रोणाचार्यने अकेले अर्जुनको ब्रह्मास्त्रका सप्रयोग ज्ञान दिया। जब द्रोणाचार्यने देखा अपने सभी विद्यार्थी अस्त्र-विद्या पारंगत हो गये हैं आचार्यने द्रुपदराजको बंदी बना कर अपने सामने ला देने की गुरु-दक्षिणा मांगी तब अर्जुनने वह काम किया। जब द्रुपद बंदी बन कर उनके सामने लाया गया तब द्रोणाचार्यने उसका आधा राज उत्तर पांचाल अपने पास रख कर आधा राज उसको छोड दिया। पांडव जब बनवास और अज्ञातवास पूरा करके आये और अपना अधिकार मांगने लगे तब द्रोणाचार्यने दुर्योधनको बहुतेरा समझाया तब कर्णने इसे पांडव-पक्षपात मानकर द्रोणाचार्यको भला बुरा कहा इस समय, कर्ण-द्रोण-वाद तलवारसे निपटनेका प्रसंग आया था किंतु भीष्माचार्यने बीच बचाव किया। दुर्योधनने किसीकी नहीं मानी और युद्धकी नौबत आयी। जीवन भर जिसके साथ बिताया उसका आपत्कालमें साथ छोडना द्रोणाचार्यने उचित नहीं माना और युद्धमें दुर्योधनका साथ दिया। युद्धके दसवे दिन कौरव सेनापति भीष्मका पतन हुवा तब द्रोणाचार्य सेनापति बनाये गये। ज्ञानेश्वरी ४
पाँच दिन तक ये सेनापति रहे और पांडव सेनाके बड़े बड़े महारथी इसी कालमें मारे गये । उनमें अभिमन्यु और घटोत्कच मुख्य हैं । इन्होंने प्रतिज्ञापूर्वक अभिमन्यु वध किया । अभिमन्यु वधसे संतप्त अर्जुनने जयद्रथ-वधकी प्रतिज्ञा की और वह पूर्ण की । द्रोणाचार्यने जयद्रथकी रक्षाके लिये विशिष्ट व्यूह रचना की थी फिर भी अर्जुनने जयद्रथका वध किया इससे संतप्त होकर द्रोणाचार्यने रात्रीके समय भी युद्ध चालू रखा । वह युद्धका पंद्रहवा दिन था। दिन भर लडकर थके हुए वीरोंने बड़े आवेशसे रातको भी लडाई की । इसी युद्धमें घटोत्कच और भीमने त्राही मचा दी । रात दिन लडकर थके हुए वीरों पर जब निद्रा देवीने अपना जाल बिछाया भीमने इसका पूरा लाभ लिया । उसने इंद्र वर्माका अश्वत्थामा नामका हाथी मारा ! सारी पांडवी सेना "अश्वत्थामा मारा गया !" कह कर चीखने चिल्लाने लगी । यह सुन कर द्रोणाचार्य दुःखी हुए । आचार्यने निर्णयके लिये युधिष्ठिरसे पूछा । कृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरने "अश्वत्थामा मारा गया !" कहते हुए भी धीरेसे "हाथी !" कहा जो द्रोणाचार्य नहीं सुन सके । उन्होंने पुत्रशोकमें शस्त्रसंन्यास लिया । इसी समय भरद्वाज आदि पितरोंने " तू ब्राह्मण होकर भी युद्धमें शस्त्र उठानेका पाप किया !" कहते हुए शस्त्र छोड कर योगमार्गका आसरा लेनेको कहा और धृष्टद्युम्नने "यही ठीक समय !" जान कर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । ये मार्गशीर्ष वद्य द्वादशीको दोपहर मारे गये । मृत्यूके समय इनकी आयू ९५ वर्षके आस पास थी । कृष्णाजिन और कमंडलु इनका ध्वज चिन्ह था । इन्होंने द्रुपदराजा, विराट, द्रुपदपुत्र शंख, और वसुदानका वध किया है । गीता अ० १. श्लो. ३-द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्रुपदराजाका पुत्र ! अयोनिंसभव ! द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे द्रुपदराजाको बंदी बना कर उसका आधा राज्य छीनकर छोड़ दिया था । परिणामस्वरूप द्रुपदराजा दुम पर पैर देकर छोडे हुए सांपकी भांति द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये पागल हो गया । द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये द्रुपदराजाने जो यज्ञ किया उस यज्ञसे धृष्टद्युम्न पैदा हुवा और द्रौपदी भी । द्रोणाचार्य ही इसके अस्त्र-गुरु थे । यह युद्धमें अत्यंत पराक्रमी था । वैसे ही चतुर भी । जब द्रौपदी स्वयंवरमें ब्राह्मणकी वेष-भूषामें आये पांडवोंने द्रौपदीको जीता तब सारी राज-सभा उद्विग्न हो गयी । "ब्राह्मणोंने क्षत्रिय-कन्या कैसे जीती ?" यह उद्विग्नता इतनी तीव्र थी कि उसी समय महा-युद्ध होनेकी नौबत आयी किंतु धृष्टद्युम्नने अत्यंत योग्यता पूर्वक पांडवोंका परिचय देकर प्रसंग निभा लिया । भारत युद्धमें आदिसे अंत तक यही सेनापति रहा । और अत्यंत कुशलतासे सेना-संचालन करता रहा । युद्धके अंतमें बचे हुए कुछ सेनानियोंमें यह भी एक था । युद्धके पंद्रहवे दिन दोपहरको भीमने अश्वत्थामा नामका एक हाथी मारा । और सारी पांडव सेनामें भीमने अश्वत्थामाको मारा "कोलाहल मच गया ।" द्रोणाचार्यने सोचा "मेरा पुत्र अश्वत्थामा मारा गया" और शोक-मग्न द्रोणाचार्यने शस्त्र रख दिया । "यही मौका" जान कर धृष्टद्युम्नने गुरु द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया ! यह देखकर सात्यकीने "असहाय स्थितिमें निःशस्त्र ५ परिशिष्ट १.
शत्रु पर वार किया" कह कर इसकी भर्त्सना की। परिणाम स्वरूप दोनोंमें युद्ध होनेकी स्थिति निर्माण हो गयी तब कृष्णने बीच बचाव करके दोनोंको शांत किया। युद्ध समाप्ति के बादकी रातको शिविरमें निद्रस्त धृष्टद्युम्नकी अश्वत्थामाने हत्या की। धृष्टद्युम्नके पाँच पुत्र थे। क्षत्रंजय, क्षत्रवर्मन्, क्षत्रधर्मन्, क्षत्रदेव, धृष्टकेतु, सबके सब भारत-युद्धमें द्रोणाचार्यसे मारे गये। इस प्रकार भारत-युद्धमें संपूर्ण पांचाल-वंश ही नष्ट हो गया। गीता अ० १, श्लो० ४-भीम पांडुराजा और कुंति पुत्र। द्वितीय पांडव। जब यह पैदा हुआ तब आकाशवाणी हुई कि "यह महाबली है।" बचपनमें ही यह इतना बली था कि एक बार माताके हाथसे छूट कर पत्थर पर गिर पड़ा तो पत्थरके टुकड़े टुकड़े हो गये ! पहले इसने अपने अन्य भाइयोंके साथ ही शर्यातीके शुक नामके पुत्रसे शस्त्र विद्या सीखी। सब पांडव तब अपने पिताके साथ हेमवत पर्वतके शतशृंग नामक अरण्यमें थे। जब पांडुकी मृत्यू हुई तब वहाँके ऋषियोंने कुंति माद्रीके साथ पांडवोंको हस्तिनापुर पहुंचाया। तबसे पांडव और कौरव साथ साथ पढ़ते बढते और खेलते रहते। भीम खेलमें सबको तंग करता था। इसके सामने कौरवोंकी एक भी नहीं चलती थी। हर बातमें अपनी हेठी होती देख कर ईर्ष्यासे दुर्योधनने कई बार इसको मार डालनेका षडयंत्र किया। एक बार जलक्रीडाके समय जहर देकर जल केलीमें थक कर सोये हुए-विषबाधासे बेसुध-भीमको हाथ पैर बांधकर नदीमें फेंक दिया। जहां इसको फेंका था वहां पानी अत्यंत गहरा था। नीचे अमृत कुंड थे। वासुकीकी सहायतासे पेट भर अमृत पीकर, भीम युद्धमें कभी न थकनेकी शक्तिके साथ वहांसे ऊपर आया। यह गदायुद्धमें निपुण था। अपनी शिक्षा दीक्षाकी परीक्षा देते देते एक बार भीम और दुर्योधन युद्ध-प्रवृत्त हुए तब द्रोणने उनको रोका। इससे धृतराष्ट्रने कौरव और पांडवोंको दूर रखनेका निश्चय किया। उस समय "वारणावतमें बड़ा मेला होगा !" ऐसी अफवा उठाकर, पांडवोंको वहां जानेको प्रवृत्त किया और दुर्योधनने वहां पांडवोंको कुंती माताके साथ लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेकी योजना बनाई। किंतु विदुरसे पहले ही इसकी और इस गृहसे बाहर जानेके गुप्त मार्गकी जानकारी मिलनेसे इस समय भी पांडव बच गये। स्वयं भीम ही घरमें आग लगा कर माता तथा भाइयोंको साथ लेकर गुप्त मार्गसे बाहर निकल आया। वहांसे जब ये गंगातीर पर आये वहां विदुरके लोगोंने इन्हे गंगा पार उतार दिया। वहां भीम अपनी माता तथा भाइयोंको उठा कर वनमें चला गया। तब कुंति और युधिष्ठिरको प्यासा देखकर उन्हे वहीं छोड़ कर यह पानी लाने गया। पानी ले आया तब सभी नींदमें सो गये थे। यह वहीं उनका रक्षण करने बैठ गया। पास ही हिडिंब नामका राक्षस रहता था। उसको मनुष्यकी गंध आने लगी। उसने अपना शिकार देखनेके लिये बहन हिडिंबाको भेज दिया। हिडिंबा भीमको देख कर मोहित हो गयी। वह अपना स्वीकार करके भाग जानेको कहने लगी। भीमने उसकी बात नहीं मानी। गयी हुई बहन इतनी देर होने पर भी क्यों नहीं आयी यह देखनेके लिये हिडिंब वहां आया। भीमसे उसकी बातचीत हुई, तू तू मैं मैं होकर, लडाई प्रारंभ हो गयी। इस द्वंद्व युद्धसे पांडव सब जग गये। भीमने हिडिंबका वध किया। हिडिंबाने कुंतीसे सारी बातें कहीं। वह अपनी माता और भाइयोंको साथ लेकर जाने लगा तो हिडिंबा भी उनके पीछे पीछे आने लगी। भीमने उसको भी मारनेकी बात कही, किंतु कुंति और युधिष्ठिरके कहनेसे उसका पाणिग्रहण किया। तब भीमने केवल ज्ञानेश्वरी ६
एक संतान होने तक उसके साथ रहनेका वचन दिया था। हिडिंबाने भी इसको मान लिया। इसी समय हिडिंबाको भीमसे घटोत्कच हुवा था। इस घटनाके बाद पांडव कुंतिके साथ एकचक्र नगरमें रहने गये। वहां भीमने बकासुरका वध किया। कुछ दिनमें पांडवोंको पता लगा कि द्रुपदराजाकी कन्या द्रौपदीका स्वयंवर है। पांडव उस स्वयंवरमें गये। अर्जुनने स्वयंवरमें द्रौपदीको जीत लिया। वहां अन्य राजाओंसे भीम और अर्जुनका युद्ध हुवा। फिर वे द्रौपदीके साथ घर आये। भीमने कहा "मां भिक्षा लाये हैं।" और कुंतीने कहा "पांचो बांटकर खावो!" फिर खूब चर्चा होनेके बाद द्रुपदराजाने द्रौपदीका अलग अलग दिन पांडवोंसे अलग अलग विवाह कर दिया। स्वयंवरमें कृष्ण भी था। उसने पांडवोंको पहचान कर बलरामसे कहा था। फिर कृष्ण और बलराम पांडवोंसे मिलने भी गये थे। इस घटनाके बाद पांडव द्रौपदीके साथ हस्तिनापुर आये। भीष्म धृतराष्ट्र आदि वृद्ध जनोंने खूब विचार विनिमय करके पांडवोंको आधा राज्य दिया। इसी समय युधिष्ठिरने राजसूय-यज्ञ किया। राजसूय-यज्ञके प्रारंभमें युधिष्ठिरने भीम और अर्जुनको कृष्णके साथ जरा- संघको मारनेके लिये भेज दिया। वहां ये तीनों ब्राह्मणवेषमें गये थे। वहां कृष्णने युद्ध भिक्षा मांगी। जरासंघने भीमको चुना। दस दिन तक भीम और जरासंघका द्वंद्व युद्ध हुवा। दस दिनके बाद जरासंघ थक गया। तब भीमने जरासंघको चीर कर फेंक दिया। उसके बाद भीमको अन्यान्य राजाओंको जीतनेके लिये पूर्व दिशामें भेज दिया। इस दिग्विजयमें भीमके साथ मद्रक राजा थे। भीमने पूर्वमें पांचाल, विदेह, गंडक, दशार्ण दक्षिणमें पुलिंद, कुमारका श्रेणिमंत, कोसलका बृहद्वल, अयोध्याका दीर्घयज्ञ, गोपालकक्षदेश, मल्ल, हिमालयकी तराईका जलोद्भव, भल्लाट, शुक्तिमान्-पर्वत, काशिराज, सुबाहु, सुपार्श्व, मत्स्यदेश, अभयदेश, आदि २१ राज्योंको जीता। इस यज्ञमें भीम पाकशालाकी व्यवस्था देखता था। जिस स्थान पर यज्ञ हुवा था वह मय-सभागार अत्यंत कुशलतासे बनाया गया था। उसकी कुशल कलास्मिकताके कारण बार बार दुर्योधनकी दुर्गत होती थी तब भीम उसको हंसता था। इसीके परिणाम स्वरूप कपट-द्यूत हुवा। इस द्यूतमें दुर्योधनने पांडवोंका सर्वस्व हरण किया था। युधिष्ठिर द्रौपदी भी हार गया। तब सभामें दुश्शासनने उसके बाल पकड़ें और भीमने प्रतिज्ञा की "यह तेरा हाथ शरीरसे अलग करके फेंक दूंगा और तेरा खून पीऊंगा!" इसी समय दुर्योधनने अपनी जंघा खुली करके दिखाते हुए द्रौपदीसे कहा "तू मेरी मांद पर बैठ जा !" तब भीमने कहा "वहां मेरी गदा बैठेगी।" पांडव वनवासमें गये । चौथे दिन जिस वनमें गये वहां एकचक्र नगरके बकासुरका भाई किर्मीर रहता था। उसकी और युधिष्ठिरकी कुछ बोलचाल हुई। इस बोलचालने युद्धका रूप ले लिया और भीमने उसका वध किया। एक दिन हवामें उड़ता आया हुवा एक सहस्रदल कमल, देखकर भीम द्रौपदीसे "तुझे ऐसे कमल ला दूंगा !" कहता हुवा गंधमादन पर्वत पर गया। वहां उसने रास्ते पर अपनी दुम फैलाकर बैठा हुवा एक वानर देखा। भीमने उस वानरको अपनी दुम हटानेको कहा किंतु वानर नहीं माना ! उसने कहा "तू यह दुम हटा दे फिर आगे जा !" वहां इसका मद उतरा। उसको ज्ञात हुवा कि यह हनुमानजी हैं। फिर हनुमानजीने अपना विराट् रूप दिखाया। भीमको आशीर्वाद दिया। और "अब तू युद्ध-भूमिमें सिंहनाद करेगा परिशिष्ट १
तब मेरी गर्जनसे मैं उसे गूंजाऊंगा!" कह कर आगे छोड़ दिया। वहींसे वह सौगंधिक वनमें गया। वहां सौगंधिक सरोवरमें सहस्रदल कमल थे। इन कमलोंकी रखवालीमें क्रोधवश नामके राक्षस थे। उन्होने भीमको एक भी कमल देनेसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कुबेरकी आज्ञा ले आनेको कहा। इसीमें कहासुनी होकर दोनोंमें द्वंद्वयुद्ध छिड़ गया और उसमें उन राक्षसोंको मार खाकर भाग जाना पड़ा। वे राक्षस कुबेरकी ओरसे रखे गये थे। उन्होंने कुबेरसे सब बात कही और कुबेरने उनको कमल लेनेकी आज्ञा दी। इसी बीच युधिष्ठिर घटोत्कचकी सहायतासे वहां आया। कुबेरने वहां उनका स्वागत किया। वे कुछ दिन वहां रहकर गंधमादन पर्वत पर जा कर अर्जुनकी प्रतीक्षा करने लगे। वहां भीमने जटासुरको मारा। तब द्रौपदीने भीमसे कहा "यहां का यह सुंदर प्रदेश तू निर्भय कर दे!" भीमने तुरंत कई क्रोधवश राक्षस मार दिये। कुबेरका एक मित्र राक्षस मणिमान्को मार दिया। पांडवोंने वहांसे मेरु-पर्वतका दर्शन किया और गंधमादन पर्वत पर आ कर रहने लगे। वहांसे पांडव द्वैतवनमें रहने गये। पांडव जब मृगयामें गये थे तब आकर जयद्रथ द्रौपदी और धौम्यको भगाकर ले गया। यह सुन कर भीम और अर्जुनने जयद्रथके सैन्यको हराकर उसको बांधकर धर्मराजके सम्मुख खड़ा किया। भीमने तब जयद्रथके सिर पर लाथ मारी। धर्मराज युधिष्ठिरने उसको क्षमाकरके छोड़ दिया। वनवासके बाद ये सब अपना वेष बदलकर विराटके घर रहे। तब भीम वहां रसोइया और मल्ल बनकर रहा। वहां इसका प्रसिद्ध नाम बल्लव था। वैसे यह जयेश भी कहलाता था। इसने तब विराटसे कहा था "मैं युधिष्ठिरके पास रसोया था।" विराट नगरमें जब एक दिन शंकरोत्सव हुवा तब वहां कुश्तियां हुईं। उन कुश्तियोंमें जीमूत नामका एक प्रसिद्ध मल्ल आया था। वह अत्यंत शक्तिमान था। कोई भी उसके साथ लड़ने के लिये तैयार नहीं थे। फिर भीमसे कहा गया। भीमको डर था कहीं कोई मुझे पहचानेगा। हां ना करते करते वह उठा। फिर उस कुश्तीमें भीमने जीमूतका वध किया। इन्हीं दिनोंमें विराट राजाका सेनापति और श्यालक कीचक द्रौपदी पर मोहित हुवा। वह द्रौपदीको तंग करने लगा। द्रौपदीने भीमसे कहा। भीमने कहा "प्यारसे बातें करके उसको दूसरी प्रहर रातको नृत्यशालामें भेज दे!" कीचक रातको वहां आया। भीम और कीचकका द्वंद्व-युद्ध हुवा। भीमने कीचकको मार डाला। दूसरे दिन प्रातःकालमें कीचकके बंधुओंने कीचकके साथ द्रौपदीको भी जला देनेकी सजा सुना दी। अब द्रौपदीको जलायेंगे इतनेमें भीम अपने मुख पर बाल बिछाकर हाथमें एक बड़ा वृक्ष उठाकर आ गया। द्रौपदीने अपनेको गंधर्व-पत्नी घोषित कर रखा था। "गंधर्व आया!" कह कर कीचक-बंधु भागने लगे किंतु भीमने उनको पकड़ कर मसल दिया ! युद्धके पहले भीमने एक बार कृष्णसे शांति-संधान करनेको कहा था। सुनकर कृष्णको आश्चर्य हुवा। तब भीमकी बात सुन कृष्ण चकित हो गया था। युद्ध प्रारंभ होते ही भीमने, दूसरे दिनमें भानुमान कलिंग, उसके चक्र रक्षक सत्य और सत्यदेव, भानुमानका पुत्र शक्रदेव केतुमान्, आदिका वध किया। चौथे दिनमें भीम और दुर्योधनका मुकाबला हुवा। भीमने दुर्योधनकी गजसेनाका धुव्वा उड़ाया। दुर्योधनकी आज्ञासे उसका सारा सैन्य भीम पर आक्रमण कर उठा तब भीमने उस सेनाका भी धुव्वा उड़ाया। तब भीष्म बीचमें आये और सात्यकीने भीष्मको रोका। दुर्योधन अपने सभी भाइयोंके साथ खड़ा है यह देखकर भीम उन पर आक्रमण ज्ञानेश्वरी ६
करने लगा । तब दुर्योधनके बाणसे वह बेहोश हुवा और उठते ही उसने सेनापति जरासंध, सुषेपेण, उग्र, वीरबाहू और उसका सारथी, भीमरथ और सुलोचन इन लोगोंका वध किया। युद्धके छठे दिनमें भीमने अत्यंत पराक्रम किया। जैसे किसी हथौडेसे मिट्टीके गोले तोडे जाते हैं वैसे भीमने शत्रु सैन्यको नष्ट किया है। आठवे दिन भीष्म क्रुद्ध हो कर इस पर टूट पडा। तब भीमने भीष्मके सारथीको मारा। भीष्मका रथ अस्ताव्यस्त होकर भाग खडा हुवा। फिर भीमने सुनामा, आदित्य, केतु, बहबासी, कुंढाधार, महोदर, अपराजित, विशालाक्ष इन धृतराष्ट्र पुत्रोंको मारा। इसी दिन मध्यान्हमें भीमने अनाधृष्टि, कुंडली, कांडमेदी, विराज, दीप्तलोचन, दीर्घबाहू, सुबाहु, मकरध्वज आदि कौरवोंका वध किया। नवमें दिन भगदत्त और श्रुतायुके गजदलका भीमने नाश किया। दसवे दिन भीम, भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा, अवंत्य, बंधु, जयद्रथ, विकर्ण, दुर्मर्षण, इन दस लोगोंसे लड कर भी पराजित नहीं हुवा। जब अर्जुन शिखंडीको आगे करके भीष्म पर आक्रमण करने जा रहा था तब भीमने इन सबको राहसे हटा दिया। ग्यारहवे दिन अभिमन्युने शल्यके सारथीको मारा और शल्यने जब अभिमन्युको गदायुद्धके लिये ललकारा तब अभिमन्युको हटा कर भीम शल्यसे गदायुद्ध करने लगा। इस युद्धमें शल्य मूच्छित हो गया। चौदहवे दिन जयद्रथ वध हुवा। अर्जुन उस युद्धमें उलझ गया था तब युधिष्ठिरने भीमको भी वहां जानेको कहा। युधिष्ठिरकी आज्ञासे जब भीम उस ओर जा रहा था तब दुःशल, चित्रसेन, कुंडभेदी, विविंशति, दुर्मुख, दुःसह, विकर्ण, शल, विंद, अनुविंद, सुमुख, दीर्घबाहु, सुदर्शन, वृंदारक, सुहस्त, सुषेण, दीर्घलोचन, अभय, रौद्रकर्म, सुवर्मन्, तथा दुविमोचन इतने लोगोंने एक साथ भीमपर आक्रमण कर दिया, किंतु भीमने इन सबको हटाकर इनके घेरेका अतिक्रमण कर दिया। स्वयं द्रोणाचार्य आगे आये। मानापमानका प्रश्न लेकर इन दोनोंमें कुछ बातचीत हुई। भीम भडक उठा। उसने द्रोणके रथको तोडकर फेंक दिया। द्रोण पादचारी बने। भीमने दुश्शासनको मार भगाया। द्रोण दूसरे रथमें आये। पादचारी भीमने वह रथ भी तोड कर फेंक दिया । उस दिन भीमने द्रोणके एकके बाद एक ऐसे आठ रथ तोड कर फेंक दिये । साथ ही साथ कुंडभेदी, शैद्रकर्मन्, अभय इन धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया और अंतमें अर्जुनके पास पहुंच ही गया तब अर्जुनसे मिलनेका संकेत मानकर अपना प्रचंड शंखनाद किया। कर्ण तब भीम पर चढायी कर आया और भीमने कर्णके घोडे मार दिये। कर्ण वृषसेनके रथपर चढ़ कर आगे बढ़ आया तब भीमने कर्णको मूच्छित किया और सारथी रथको लेकर भाग गया। होश संभाल कर कर्ण पुनः भीम पर चढाई कर आया। इस बीचमें भीमने दुःशलका वध किया। दुर्मुखका वध किया और कर्णको पुनः रथ-हीन करके भगा दिया। कर्णकी यह पराजय देखकर दुर्मर्षण, दुर्मद, दुर्धरने, भीमपर आक्रमण किया और भीमके प्रहारोंसे मर भी गये। इसके बाद भी कर्ण भीम पर पुनः चढ़ाई कर आया। भीम कर्ण युद्ध हुवा। इस युद्धमें भी कर्णकी पराजय होती है यह देख कर, दुर्योधनने अपने बंधु शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र, चित्रायुध, दुष्ट, चित्रसेन, और विकर्णको भीम पर चढाई करनेको कहा और भीमने उन सबको वहीं मसल दिया। इनके साथ ही साथ चित्राक्ष, चित्रवर्मा तथा शरासनको भी मार गिराया। किंतु विकर्ण भीमका प्रियपात्र था इसलिये उसकी मृत्युपर भीमको शोक हुवा। इसके बाद भी भीम-कर्ण युद्ध हुवा। थोडी ही देरमें कर्णने इसके साथ लडना छोड दिया। इस दिन रातको ९ परिशिष्ट १. (३)
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भी युद्ध चलता रहा । रातको भानुमान कलिंगका पुत्र बापका बदला लेनेके लिये भीम पर चढाई कर आया किंतु भीमने उसको मुक्केसे ही मार डाला ! फिर जयत्सनके रथ पर चढ कर उसको उसीके रथमें एक झांपड मार कर ही खतम कर दिया । वैसे ही दुष्कर्णको मसल दिया । फिर बाल्हीकोंसे भीमका युद्ध हुवा । उसमें बाल्हीकके पुत्रको मूर्च्छित किया । किंतु बाल्हीकोंसे यह आहत भी हुवा और उससे जरा संभालते ही इसने दृढरथ, नागदत्त, विरजा, और सुहस्तका वध किया । तब स्वयं दुर्योधन इस पर आक्रमण करके पराजित होकर हठ गया । फिर कर्णसे युद्ध हुवा । इस युद्धमें दोनों पादचारी हुए । भीम तब नकुलके रथ पर चढा । युद्धका पंद्रहवा दिन । द्रोणाचार्य कहर बरपा रहे थे । तब कृष्णने भीमको कुछ संदेसा दिया । भीम इंद्रवर्माका हाथी अश्वत्थामाको गदासे मारकर द्रोणके आस पास जा कर "अश्वत्थामा मर गया !"-अश्वत्थामा मर गया !' ऐसे चीखते चिल्लाने उछलते लगा । यह सुनकर द्रोणने शस्त्र नीचे रखे और धृष्टद्युम्नने "यही समय" मानकर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । द्रोणाचार्यकी मृत्युसे अर्जुनको बडा दुःख हुवा । वह आत्महत्याका विचार भी करने लगा । भीमने तब उसको डांट फटकारकर परावृत्त किया । सोलवे दिन इसने क्षेमधूर्ति और उसके हाथीको मारा । फिर अश्वत्थामा और भीमका युद्ध हुवा । उसमें दोनों आहत हो गये और साथियोनें रथ पीछे हटाया । सत्रहवे दिन कौरव सेनाका भुर्ता बन गया । अपनी सेना तहस नहस होते देखकर दुर्योधन सेनाको प्रोत्साहित करते हुए स्वयं भीम पर चढाई कर गया किंतु पराजित हुवा । भीमने इसकी गजसेनाका विध्वंस कर डाला । फिर कर्ण इसपर चढाई कर आया । कर्ण भी पराजित हो कर रणभूमि छोडना चाहता था कि दुर्योधनने अपने भाइयोंको भीमपर चढाई करनेको ललकारा । एक साथ श्रुतश्रवा, दुर्धर, क्रोध, विवित्सु, विकट, सम, निसंगी, कवची, पाशी, नंद, उपनंद, दुष्प्र, धर्ष, सुबाहु, वातवेग, सुवर्चस, धनुर्ग्रह, शाल, और सह भीमपर चढाई कर आये । भीमने विवित्सु, विकट, सह, क्रोध, नंद, उपनंदका वध किया । इतनेमें कर्ण पुनः तैयार हो कर आया । तब भीमने एक बाणसे कर्णको आर पार छेद दिया और उसका रथ चूर चूर कर फेक दिया । फिर इसने दुर्योधनकी सेनाका संहार करना प्रारंभ कर दिया । तब शकुनी भीम पर चढाई कर आया । भीमने शकुनीको रथसे भूमि पर पटककर घसीट दिया और दुर्योधन उसको अपने रथ पर डाल कर ले गया । युद्ध चलही रहा था । भीमकी भीषणता क्षण क्षण बढती जा रही थी तब दुःशासन उस पर चढाई कर आया । भीमने उसके घोडे मारे, सारथी मारा, रथ तोड दिया, फिर उसको पकड कर भूमिपर पटक दिया । उसका दाहिना हाथ जिससे उसने द्रौपदीके बाल खींचे थे शरीरसे उखाड कर फेंक दिया । उसका हृदय फाड कर उसका खून पिया और खूनसे सने हाथोंको उछालता हुवा द्रौपदीकी वेणी बांधने चला गया । इसी समय भीमने अलंखु, कवचिन, खड्गिन्, दंडधार, धनुर्धर, निसंगी, वातवेगू, सुवार्चा आदि धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया । अठारहवे दिन इसने कृतवर्मा और शल्यसे युद्ध किया । शल्यने इसको गदायुद्धमें मूर्च्छित किया । इस मूर्च्छांसे सचेत होते ही भीमने पुनः कौरव-सेनाका संहार-कार्य प्रारंभ कर दिया । इस युद्धमें भीमने कौरवोंकी गजसेनाके साथ ही साथ दुर्मर्षण, श्रुतांत, जैत्र, भूरिबल, रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विषह, दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष, तथा श्रुत- श्रवाका वध किया । इसके बाद सुदर्शनका वध किया । फिर प्रत्यक्ष दुर्योधन और भीमका अंतिम गदायुद्ध हुवा उसमें कृष्णकी सूचनासे भीमने दुर्योधनकी जांघ पर गदा-प्रहार करके उसका वध किया । इस पर बलरामने इसको अधर्म-युद्ध कहा और कृष्णने भीमकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिला ज्ञानेश्वरी १०
कर उसका समाधान किया। अंतमें अश्वत्थामासे लडकर उसका मणि ले आया इस प्रकार भारत युद्धका अंत हुवा। महाभारतके बाद सिंहासनारोहणके समय युधिष्ठिरने भीमको युवराजाभिषेक किया। युद्धके बाद सभी पांडव धृतराष्ट्र और गांधारीसे प्रेमसे रहे किंतु भीम ही अकेला उनको जली कटी सुनाता रहा। अंतमें इसकी बातोंसे तंग आकर धृतराष्ट्र गांधारीके साथ वनमें गया। आगे अनेक वर्ष राज्य करनेके बाद पांडव शस्त्र-संन्यास करके उत्तर दिशामें स्वर्गारोहण करने गये। तब राहमें जब भीमका पतन हुवा भीमने युधिष्ठिरसे पूछा "मैं क्यों गिरा ?" युधिष्ठिरने कहा अपनेको बलवान मानता था। शक्तिका अभिमान करता था तथा तू बडा पेटू था इसलिये तेरा पतन हुवा। इस समय भीमकी एक सौ सात सालकी आयु थी। इसकी तीन पत्नियां थी। हिडिंबा, द्रौपदी, तीसरी काशीराजाकी कन्या जलंधरा। इनके हिडिंबासे घटोत्कच, द्रौपदीसे श्रुतसोम और जलंधरासे सर्वत्रात ऐसे तीन पुत्र थे। धृतराष्ट्रके सभी सौ पुत्रोंको इसीने मारा था। इसका शंख पौंड्र था। गीता अ० १. श्लो० ४-अर्जुन— कुंती पुत्र। तृतीय पांडव। यह फाल्गुन मासमें उत्तराफाल्गुनी सह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें पैदा हुवा था इसलिये इसको फाल्गुन भी कहते हैं। इसका जन्म हिमालयके शतशृंग पर्वत पर हुवा था। यह द्रोणाचार्यका पट्टशिष्य था। यह अत्यंत दक्ष था। एक दिन रातको जब यह भोजन करने बैठा था तब दीप बुझ गया। अंधारमें यह खाता रहा। अंधारमें जरा भी चूक होनेके पहले भोजन होनेसे यह सोचने लगा कि अभ्यासके बलसे जैसे अंधारमें भी न चूकते भोजन हुवा ऐसे अन्य बातें भी हो सकती हैं और इसने अंधारमें ही लक्ष्यवेधी अभ्यास किया। धनुर्विद्यामें यह अत्यंत कुशल था। एक बार द्रोणाचार्यने सबकी परीक्षा लेनेके लिये एक कृत्रिम पक्षी एक पेड पर बिठा कर पूछा "वहां क्या दीखता हे !" केवल अर्जुनने ही कहा था "केवल पक्षीकी गर्दन दीखती है!" इतना यह एकाग्र रहता था। एक बार अर्जुनने पांच बाण मार करके मगरके मुखसे द्रोणको मुक्त किया था। इसकी धनुर्विद्या कुशलता पर द्रोणने "ब्रह्मशिर" नामका उत्तम अस्त्र दिया था। एक बार परीक्षा समारोहमें अर्जुनने एकसा दीखने वाले पांच बाण छोडकर, हिलते सींगमें बीस बाण भर कर, अपना चातुर्य दिखाया था और सबसे प्रशस्ति पायी थी। शस्त्र-विद्या समाप्त होने पर गुरु दक्षिणाके रूपमें गुरु द्रोणने द्रुपदराजाको सजीव पकड लानेको कहा तब केवल अर्जुन ही यह काम कर सका, और किसीसे यह नहीं हुवा। अपनी छोटीसी आयुमें ही अर्जुनने सौवीराधिपति दत्तमित्रको जीत लिया था जिसे पांडु भी नहीं जीत सका था। विपुलको भी इसने जीता। पांडवोंका कीर्ति-सौरभ सर्वत्र फैलनेमें अर्जुनके पराक्रमका खूब ही हाथ रहा है। लाक्षागृहसे पार होनेके बाद राहमें अंगारपर्ण गंधर्व अपनी स्त्रियों सह जल-क्रीडा कर रहा था। उसने पांडवों को रोका इसी बात पर अर्जुन और अंगारपर्णका युद्ध हुवा। उसमें अर्जुन जीत गया। अल्पायुमें ही अर्जुनकी शस्त्र-कुशलता देख कर उसने अर्जुनको सूक्ष्मपदार्थ दर्शक चाक्षुषीविद्या सिखायी। साथ साथ अर्जुनसे अग्निशस्त्र-विद्या सीखली। इसीके कहनेसे पांडवोंने धौम्य ऋषिको पुरोहित बना लिया था। इस घटनाके बाद, अर्जुन द्रौपदी स्वयंवरमें द्रुपदराजाके घर गया। वहां पर द्रौपदी-स्वयंवरका प्रण जीत कर इसने द्रौपदीको जीत लिया। द्रौपदी स्वयंवरमें ११ परिशिष्ट १-
अनेक क्षत्रिय राजा आये थे किंतु मत्स्य भेदकी बाजी जीतनेका साहस करनेवाला कोई विरला ही था। इस घटनाके बाद धृतराष्ट्रने विदुरको भेजकर पांडवोंको हस्तिनापुर बुल लिया। एक बार वहां एक ब्राह्मणकी यज्ञीय सामग्री चोरी गयी। वह अर्जुनके पास आकर रोने लगा। अर्जुन उस ब्राह्मणको आश्वस्त करके शस्त्र लानेके लिये शस्त्रागारमें गया। वहां युधिष्ठिर और द्रौपदी एकांतमें थे। इसलिये नियमानुसार अर्जुनको एक वर्ष तीर्थयात्राके लिये जाना पडा। तब युधिष्ठिरने कहा था "तू मुझसे छोटा है। छोटोंका बडोंके एकांतमें जाना दोष नहीं है। और तू स्वधर्म पालनके लिये गया था।" किंतु अर्जुनने युधिष्ठिरको समझा बुझाकर तीर्थयात्राके लिये उसकी आज्ञा ली। इस तीर्थाटनमें उसने कौरव नामक नागकी उलूपी नामक कन्यासे गांधर्व- विवाह किया। फिर वह उत्तरमें हिमालयकी और गया। वहांसे बिंदुतीर्थ, पूर्वकी ओर मुडकर उत्पालिनी नदी, अपरनंदा, महानदी, गया आदि तीर्थ-स्थानोंको देखकर अंग वंग कलिंगका भ्रमण कर मणिपुर गया। मणिपुरका राजा चित्रवाहन था। उसकी लडकी थी चित्रांगदा। अर्जुनने चित्रांगदाकी मंगनी की। राजाने लडकीका लडका ननिहाल ही रहेगा इस शर्तपर चित्रांगदाका पाणिग्रहण कर दिया। वह मणिपुरमें तीन वर्ष रहा। इस अवधिमें चित्रांगदाको अर्जुनसे एक लडका हुआ। उसका नाम बभ्रुवाहन। यहांसे वह गोकर्ण गया। यहांसे प्रभास क्षेत्रमें जानेके बाद इसने कृष्णकी सहायतासे उसकी बहन सुभद्राको भगा ले जानेका निश्चय किया। इसके लिये युधिष्ठिरकी सम्मति भी ली और रैवतक पर्वत पर जा कर देव-दर्शन करके घर लौटनेवाली सुभद्राको अपने रथमें चढाकर यह हस्तिनापुरकी ओर भागा। कृष्णने अर्जुनका समर्थन करके बलरामका क्रोध शांत किया। बलरामने अर्जुनको द्वारका बुला कर बडे वैभव और समारोहके साथ उससे सुभद्राका विवाह कर दिया। कभी श्वेतकी राजाने शतसंवत्सरादि यागमें सतत हवि डालनेसे अग्नीको मांद्य आया। वह ब्रह्माके पास गया। ब्रह्माने उसको खांडववन खानेको कहा। किंतु जब जब अग्नि खांडववन खाने जाता तब तब इन्द्र प्रचंड वर्षा करके अग्निको परास्त कर देता। अग्नि तब अर्जुनके पास जा कर खांडवनका दान मांगने लगा। अर्जुनने कहा "हममें युद्ध सामाग्रिकी न्यूनता है वह हमें दीजिये, मैं आपको खांडववन देता हूं"। अग्निने कपिध्वजयुक्त दिव्य रथ, जिसे चार श्वेत अश्व जुडे हुए थे, गांडीव धनुष्य, तथा अक्ष्यथ तूणीरके साथ युद्ध सामग्री दी और अर्जुनने खांडववन । अग्निने खांडववनका ग्रास लिया। इन्द्रने पर्जन्य वर्षा की। कृष्णार्जुनने इन्द्रकी एक भी नहीं चलने दी पंद्रह दिन तक अग्नि खांडववन चाटता रहा। तब उसका मांद्य गया। उसमेंसे केवल तक्षक पुत्र अश्वसेन, मायासुर, महर्षी मंदपालके चार पुत्र जरितारि, सारिसृक्त, द्रोण तथा स्तंभ मित्र और सांगंक पक्षी इतने बचकर निकले। अग्नीने ठीक तीन सप्ताह इस वनका आहार किया। दनुपुत्र मय खांडववनसे बाहर निकला और कृष्ण उसका संहार करेगा इतनेमें वह अर्जुनको शरण गया। अर्जुनने उसकी रक्षा की। तब अर्जुनसे कृतज्ञ मयासुरने राजसूय यज्ञमें मय-सभा बांध दी। इस मय-सभाके लिये आवश्यक सामान वृषपर्वाके भांडारमें था। मयने वहींसे इसको पाया। साथ ही साथ इसने उसी कोषागारसे गदा लाकर भीमको दी थी। अर्जुनको वरुणका देवदत्त नामका शंख इसीने इसी कोषागारसे दिया था। युधिष्ठिरने जब राजसूय यज्ञ किया था तब अर्जुनने अपने दिग्विजयमें प्रथम कुलिंद, आनर्त, कालकूट, तथा सुमंडल जीतकर सुमंडल राजाको साथ लेकर शाकलद्वीप, प्रतिविंध्य इन पर आक्रमण करके इन्हें जीत लिया। तब शाकलद्वीपके सभी राजाओंको इसने जीता था। इनके साथ अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १२
An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
प्राग्ज्योतिष देशको जीत लिया । वहां भगदत्तसे अर्जुनका आठ दिन तक घोर युद्ध हुवा था । भगदत्त भौमासुरका पुत्र था । भगदत्त चीन किरात आदि देशोंका आश्रय-स्थान था । जब भगदत्तने हार मान कर, कर देना स्वीकार किया तब अर्जुनने कुबेरकी आलकावती पर आक्रमण किया । कुबरसे कर लिया । उसके बाद उलूक देशका राजा बृहंत, सेनाबिंदु, मोदापुर, सुदामन, उत्तर-उलुक आदि राजाओंसे करभार लेकर, सेनाबिंदुके देवप्रस्थ नगरमें जा कर वहांसे पौरव विश्वागश्वापर हमला करके उनको जीता । इसके बाद उत्सवसंकेत 'गणों' को जीता । काश्मीरको जीता तथा दस मांडलिकोंके साथ लोहितको जीता । फिर अभिसारी, उरगा नगरी, आदि जीतकर सिंहपूर नगर उध्वस्त किया । सुह्य, चोल आदिको जीतकर इसने बाह्लीक पर आक्रमण करके कांबोजको भी जीत लिया । इन सबमें ऋजिक देशमें भयंकर युद्ध हुवा । अंतमें अनेक देशोंको जीतकर, उन देशोंको मांडलिक बनाकर जब यह मानस-सरोवरकी ओर आगे बढा वहां इसने ऋजिकोंके बनाये हुए नेहर देख लिये । वहांसे यह गंधर्वोपर आक्रमण करके आगे बढा और वहांसे तित्तिरकल्भाष, मंडूक, नामके उत्तम अश्वोंको लेकर हरिवर्षकी ओर आगे बढा । वहाँ इसको ऋषियोंने रोका क्यों कि आगे सभी अदृश्य है । अर्जुन भी आगे न जाकर वहां तक सबसे युधिष्ठिरकी सत्ता मनवाकर इंद्रप्रस्थकी ओर लौट आया । युधिष्ठिरके राजसूयके बाद बढी हुई दुर्योधनकी ईर्ष्याग्निमें जब पांडवोंका सर्वस्व स्वाहा हुवा और कपट द्यूतमें सभी हारकर पांडव बनवास गये तब अर्जुन पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिके लिये इंद्रकीलपर्वत पर जाकर पशुपति नाथकी तपस्या करने लगा । उस समय शंकरने किरात रूपमें आकर अर्जुनकी परीक्षा ली । अर्जुन उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुवा और पशुपति-नाथने इसको विश्व-संहारक पाशुपतास्त्रका " रहस्य-पूर्ण ज्ञान " दिया जो पृथ्वी पर और कोई नहीं जानता था । इसके बाद अर्जुन इंद्रके आमंत्रण पर उसीके भेजे गये विमानसे इंद्रलोक गया । इंद्रने अर्जुनका सन्मान करके उसको अपने अर्धासन पर स्थान दिया । वहां पर भी अर्जुनने अनेक विद्याओंका अध्ययन किया । अर्जुन वहां करीब पांच वर्ष तक रहा । वहां वह वाद्यवादन तथा नृत्यकला सीखा । चित्ररथ गंधर्व जो पहले अंगारपर्ण नामसे विख्यात था यहां अर्जुनके काम आया । उसीने अर्जुनको गांधर्ववेद सिखाया । एक बार उर्वशीने अर्जुनसे प्रेम याचना की और अर्जुनने उसका अस्वीकार किया इस पर उर्वशीने उसको षंढ होनेका शाप दिया । पांडवोंके अज्ञातवासमें अर्जुनको इसका उपयोग हुवा जब वह बृहन्नलाके रूपमें विराट राजाके पास रहा । अर्जुनका यह देवलोक वास समाप्त होते होते अज्ञातवासका काल आया । तब इसीने द्रौपदीको कंधेपर लेकर विराट नगरी जानेका काम किया । अर्जुन अज्ञातवासमें बृहन्नला नामसे षंढ-वेषमें द्रौपदी की "परिचारिका थी" कह कर उत्तराको नृत्यकला सिखानेका काम करता था । आगे विराटादि सभी लोग जब दक्षिण गोग्रहणमें उलझे हुवे थे तब दुर्योधनादिने उत्तर गोग्रहण किया । राजधानीमें तब केवल भूमिंजय-उत्तरकुमार-था । बृहन्नला सारथ्य करेगी यह सुन कर यह युद्ध पर चला ! किंतु शत्रुको देखते ही भूमिंजय रथ परसे कूद कर भागने लगा । बृहन्नलाने उसको समझा बुझा कर स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया । शमी वृक्ष परसे अपने आयुध उतार कर उसको अपना वास्तविक परिचय दिया और कौरवोंसे अकेला—बिना सारथीके-युद्ध करके गायोंको छुडा ले आया । इस युद्धमें कर्ण था । अर्जुनके सामनेसे कर्ण जी लेकर भाग निकला । इसी समय कर्णके सामने उसका भाई मारा गया !! १५ परिशिष्ट १-
विराटने तब पांडवोंका सम्मान किया। अर्जुनने उत्तराको अभिमन्युके लिये स्वीकार किया। भारत युद्धकी तैयारी होने लगी। कृष्णकी सहायता मांगनेके लिये दोनों ओरसे दुर्योधन और अर्जुन कृष्णके पास गये । कृष्ण तब सोये हुए थे। दुर्योधन उनके सिरहाने बैठा और अर्जुन पैरोंके पास । जब कृष्ण उठे तब कृष्णने दोनोंको देखा। अर्जुन दुर्योधनसे छोटा था इसलिये मांगनेका उसका अधिकार पहला था। कृष्णने यादवोंकी नारायणी सेना और स्वयं निःशस्त्र कृष्ण, ऐसे दो भागोंमें विभाजित करके पूछा किसको कौन चाहिए। अर्जुनने निःशस्त्र कृष्णकी मांग की और दुर्योधन तीन अक्षोहिणीकी विशाल नारायणी सेना प्राप्त करनेके उत्साहसे घर गया। भारत युद्धके प्रथम, अर्जुनको युद्धके अनिष्ट परिणामकी कल्पनासे विषाद हुआ। इस मोहमय विषादसे जब अर्जुन कर्तव्य विमुख होने लगा तब कृष्णने जो उपदेश दिया उसीको आज भगवद्गीता कहते हैं। भीष्मार्जुन युद्धसे ही महाभारत युद्धका श्रीगणेश हुआ। युद्धके तीसरे दिन ऐसा लगा कि भीष्म पांडवी सेनाका नामोनिशानही मिटा देंगे। तब कृष्णने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके हाथमें चक्र उठा लिया। उस समय अर्जुनने भी अपने युद्ध कौशल्यसे सबको चमत्कृत किया। इसी तीसरे दिनके अंतिम प्रहरमें अर्जुनने कौरवी सेनाकी धज्जियां उड़ा दीं। नौवे दिनमें सबसे प्रथम अर्जुन और द्रोणका युद्ध हुआ। भीष्मसे भी गहरी झड़प हो गयी। संध्या समय युद्ध शांत हुआ। भीष्म पितामहके सम्मुख किसीकी कुछ भी नहीं चलती थी। वे इच्छा मृत्युके स्वामी थे। तब कृष्णकी सलाहसे भीष्मसे ही उनकी मृत्युकी चर्चा की गयी। भीष्मने स्वयं अपनी पराजय अथवा मृत्युकी व्यवस्था कही और दसवे दिन शिखंडीको आगे करके अर्जुन भीष्मकी ओर बढा। शिखंडीका अभ्रद्र ध्वज, उसका वह स्त्री-सुलभ हावभावका पौरुष ! यह सब देखकर भीष्मने उस पर शस्त्र न उठानेके अपने नियमका पालन किया और अर्जुनने शिखंडीकी ढाल सामने करके कौरव-सैन्यकी धज्जियां उड़ायीं। उस दिन कौरव वीरोंने अर्जुनको रोकनेकी पराकाष्ठा की। अर्जुनने भीष्म पर शर-संधान करके उन पर हजारों तीर छोड़ कर, उनको गिरा दिया। हजारों बाणोंका शरीरमें घुस जानेसे भीष्म वीरोचित शरशैया पर पडे। तब उनका सिर लटकने लगा। भीष्मने सिरहाना मांगा। दुर्योधनादिने नरम नरम सिरहाने ला दिये किंतु अर्जुनने भूमिमें तीन बाण मारकर उस पर भीष्मका सिर टिका दिया। तब भीष्मने पानी मांगा। दुर्योधनादिक पीनेके लिये स्वर्ण-कलशमें शीतल सुगंध जल ले आये। भीष्मने वह अस्वीकार करके अर्जुनकी ओर देखा और अर्जुनने पृथ्वीमें बाण मारकर पृथ्वीके अंदर जो दिव्य जल था उसका झरना बहा दिया; भीष्म उस पानीसे तृप्त हुए। इसके बाद अर्जुनने 'मारेंगे या मरेंगे' इस प्रतिज्ञासे लड़ने आये हुए त्रिगर्तोंके सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु, तथा सत्यकर्माको युद्ध-भूमिमें परलोक दिखाया। वैसे ही प्रस्थलाधिपति सुशर्माको मारा। मयलोक, मद्रदेश आदिके सबीरोंको मारा। हाथी पर बैठकर लडनेवाले महा-पराक्रमी भगदत्तको मारा। मरते समय अभिमन्यूको जयद्रथने लाथ मारी थी, अभिमन्युको इसकी वेदना थी। इसलिये अर्जुनने सूर्यास्तके अंदर जयद्रथका सिर उड़ानेकी प्रतिज्ञा करके प्रतिज्ञाके अनुसार जयद्रथका सिर उड़ाया। भारत-युद्धमें दुर्योधन दुःशासन कर्ण आदि कई बार अर्जुनके सामनेसे भाग गये हैं। इसने अंबष्ट, श्रुतायुस् तथा अश्रुतायुस्का वध किया। अंतमें कर्णार्जुन युद्धका समय आया ही। अर्जुनने कर्णको मूर्च्छित किया। कर्णका सर्पास्त्र, बीचमें ही तोड डाला। जब युद्ध जोरों पर था, दोनों ओरसे घमासान चल रहा था तब कर्णका रथ-चक्र भूमिमें धंस गया। वह ऊपर उठाही नहीं। कर्ण जब उसे उठानेके लिये नीचे उतरा तब अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १४
उसका शिरच्छेद किया। दुर्योधनकी मृत्यु- बाद जब सब अपने शिबिरमें आये, अर्जुन रथसे नीचे उतरा, उसके बाद जैसे कृष्ण रथसे उतरे रथ जलकर भस्म हो गया। उसी दिन रातको अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके सबको जलाने लगा। तब अर्जुनने भी उसको रोकनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया किंतु इससे विश्वका अहित होता हुवा देखकर दोनोंने वह संवारण कर लिया। भारत महा-युद्धके बाद युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञमें अर्जुन ही अश्व-रक्षक था। अश्व-रक्षणमें उत्तरमें इसने छोटी मोटी अनेक लडाइयां लडी हैं। त्रिगर्तोंके राजा सूर्यवर्मा तथा उनका भाई केतुवर्माको इसने पराजित किया। भगदत्तके पुत्र यज्ञदत्तको पराजित किया। वहांसे सिंधुदेशमें गया। सिंधुदेश जयद्रथका देश, अर्जुनने महाभारतमें जयद्रथको मारा था। वहां अर्जुन पर गहरा प्रहार किया गया। तब अर्जुनके हाथसे गांडीव गिर पडा। उसको उठाकर अर्जुनने फिरसे युद्ध किया। अर्जुन आगे बढ़ रहा है यह सुनकर ही जयद्रथका लड़का सुरथ मर गया। तब दुर्योधनकी बहन-अर्जुनकी भी चचेरी बहनने-शरण आ कर अर्जुनको युद्ध-परावृत्त किया। वहांसे यह मणिपुरमें गया। वहां बभ्रुवाहन राज्य करता था। वह अनेक लोगोंको साथ लेकर इसका स्वागत करने आया। किंतु क्षत्रियोचित बर्ताव न करनेके कारण उसको अर्जुनने अपमानित किया। उलूपीने सवतके लड़केको युद्धके लिये भडकाया। बभ्रुवाहनने अर्जुनसे युद्ध किया। पितापुत्रमें घमसान मचा। बभ्रुवाहन अर्जुनको मूर्च्छित कर स्वयं मूर्च्छित हो गया। चित्रांगदाने युद्ध भूमी पर आ कर पति व पुत्रके लिये विलाप किया। सबने उलूपीको भला बुरा कहा। अंतमें उलूपीके प्रयाससे संजीवनी ला कर दोनोंको बचा लिया गया। अर्जुन वहांसे मगध आया। मगधमें जरासंधके पौत्र मेघसंधको जीतकर अर्जुन चेदी देशमें गया। शिशुपालके पुत्रने वहां अर्जुनका सत्कार किया। एकलव्यका लडका निषादराज शरभसे युद्ध करके उसको जीतकर दक्षिणमें आंध्र, रौद्र, महिषक आदि देशोंको जीतकर गोकर्ण, प्रभास, द्वारका, आदि होता हुवा गांधार गया। वहां शकुनि पुत्रसे घनघोर युद्ध हुवा। शकुनिकी पत्नीने-अपने पुत्रकी भी पतिकी-सी दुर्गत होगी इस विचारसे-आगे बढ़कर अपने पुत्रको युद्धसे परावृत्त किया। घोडा गांधारसे माघ पौर्णिमाके लगभग हस्तिनापुरकी ओर लौट पड़ा। चैत्र पूर्णिमाको अश्वमेध यज्ञ होनेवाला था। भारतवर्षके अनेक राजाओंको जीतकर अर्जुनने उनको यज्ञमें निमंत्रण दिया था। अर्जुनका यह दूसरा दिग्विजय है! अर्जुनने सभी अतिथि राजाओंका सम्मान किया। विशेष करके उसने बभ्रुवाहनका विशेष सम्मान किया। आश्वमेध यज्ञके कुछ ही काल बाद कृष्णका सारथि दारुकने हस्तिनापुर आकर सभी यादवोंका संहार होनेकी बात कही। यह सुनकर अर्जुनको सच नहीं लगा। फिर भी वह द्वारका गया। वहां जाकर देखा तो उसका हृदय विदीर्ण हुवा। कृष्णकी स्त्रियोंका वह हृदयभेदी विलाप। वसुदेवका क्रंदन, अर्जुन वसुदेव पैर पकडाकरके रोने लगा। वसुदेव भी “राम-कृष्ण गये और यह देख- नेक लिये मैं रहा” कहकर खूब रोये। वसुदेवने अब कृष्णकी द्वारका जल्दी समुद्रमें डूब जायगी तू इन सबको लेकर हस्तिनापुर जा” कहकर देह-त्याग किया। अर्जुनने वसुदेव, बलराम तथा कृष्णकी देहको अग्नि-संस्कार किया और स्त्री, रत्न-भूषणादि लेकर हस्तिनापुरके लिये चला। अकेला अर्जुन इतनी सब स्त्रियां तथा रत्नादि ले जाता है यह देखकर रास्तेपर पंचनद राज्यमें आभीने उस पर हमला किया। उस समय अर्जुन इतना खिन्न था कि उसको अस्त्रोंके मंत्र भी स्मरण नहीं होते थे। १५ परिशिष्ट १-
आयु भी खूब हो चुकी थी। उसने तब धनुष्यकी उठाकर लाठीकी भाँति उसीसे शत्रुओंको मारना शुरू किया और जो कुछ बचा वह लेकर हस्तिनापुर आया। यदुवंशके जो कुछ अंकुर बचे थे उनकी कुछ व्यवस्था की। कृतवर्माके पुत्रको (?) मृत्तिकावतकी गद्दीपर बिठाया गया। अश्वपतिको खांडववनका राज्य दिया। अनिरुद्ध-पुत्र वज्रको इंद्रप्रस्थ दे दिया। इस भांति कुछ व्यवस्था करके अर्जुन उद्विग्न मनःस्थितिमें व्यासाश्रममें गया। व्याससे सारी बातें कहकर वहांसे हस्तिनापुर आया। इसके बाद यह युधिष्ठिरके साथ हिमालयकी ओर गया। हिमालय चढ़ते चढ़ते वह बीचमें ही गिरकर मर गया। तब भीमने युधिष्ठिरसे पूछा इसका पतन क्यों हुवा ? "मैं अकेला सभी शत्रुओंका नाश करूंगा ऐसे मामता था। किंतु यह ऐसे नहीं कर सका। वैसेही यह अन्य धनुर्धारि- योंका अपमान करता था। इसलिये इसका पतन हुवा।" द्रौपदीसे इसका एक पुत्र था श्रुतकीर्ति वह भारत युद्धमें मारा गया। सुभद्रासे एक पुत्र था अभिमन्यु, यह चक्रव्यूहमें मारा गया। चित्रांगदासे जो पुत्र था बभ्रुवाहन वह मणिपूरका राजा बना। उलूपि पुत्र इरावान् युद्धमें मारा गया। इरावान्ने भी भारत युद्धमें खूब पराक्रम किया है। इसने शकुनीके छ भाई मारे। अर्जुनका पौत्र अभिमान्युका पुत्र परीक्षित, हस्तिनापुराका राजा हुवा। मृत्युके समय अर्जुनकी आयु १०६ वर्ष थी। इसका धनुष्य गांडीव । ध्वज कपिध्वज । शंख देवदत्त । तुणीर अक्षय तुणीर । शक्ति पाशुपतास्त्र । गीता अ० १. श्लोक० ४- युयुधान- सोमवंशी वृष्णिकुलके सत्यकका लड़का। धनुर्विद्यामें अर्जुनका शिष्य। द्रौपदी स्वयंवरमें यह भी था। पांडवोंका कट्टा अभिमानी। जब पांडव वनवासमें थे तब इसने कृष्ण और बलभद्रसे कहा था "पांडवोंको वनवास पूरा करने दो। हम कौरवोंका वध करके अभिमन्युको सिंहासन पर बिठायें।" किंतु "दूसरोंका जीता हुवा राज्य पांडव स्वीकार नहीं करेंगे !" कहते हुए कृष्णने इसका अस्वीकार कर दिया। पांडव जब वनवाससे लौट आये, शिष्टाईका विचार होने लगा तब बलरामके इस विचार पर कि शिष्टाईमें जानेवाला "नम्र झुककर चलनेवाला हो।" युयुधानने उनका विरोध किया। पांडवोंकी न्याय मांगका समर्थन किया और सभामें यह भी सिद्ध कर दिया कि पांडव पक्ष ही न्यायका पक्ष है। द्रौपदीने इनके इस व्याख्यानका खूब स्वागत किया था। यह सदैव पांडवोंकी ओरसे कौरवोंसे युद्ध करनेमें उत्सुक रहता था। कृष्ण जब शिष्टाई करने चला तब यही कृष्णका सारथी था। संभवतः यह अतिरथी था। पांडव-पक्षके सात उपसेनापतियोंमें यह एक था। एकबार युद्धमें गांधारोंने इसका रथ टुकड़े टुकड़े कर दिया था। तब इसने अभिमन्युके रथ पर चढकर शकुनीकी सेनाको तहस नहस कर दिया। एकबार यह भीमके संरक्षणमें भीष्माचार्य पर भी टूट पड़ा था। भूरिश्रवाने इसके सभी पुत्र मारे थे। द्रोणाचार्यपर भी इसने एक बार आक्रमण किया था। एक बार द्रोणाचार्यके हाथसे धृष्टद्युम्नकी रक्षा की थी। लगातार इसने १०१ बार द्रोणाचार्यका धनुष्य तोडा था। तब द्रोणाचार्यने इसके युद्ध कौशलकी भूरि भूरि प्रशंसा की थी। जयद्रथ वधका दिवस था। उसी दिन युद्धभूमिमें अर्जुनको अपनी दृष्टिथमें न पाकर ज्ञानेश्वरी १९
युधिष्ठिरको अर्जुनके विषयमें भयसा लगा और युधिष्ठिरने युयुधानसे अर्जुनकी रक्षाके लिये जानेको कहा तब युयुधानने कहा “मेरे यहांसे जाने पर आपके पास कोई नहीं रहेगा !” किंतु युधिष्ठिरकी आज्ञा पर यह अर्जुनके पास गया । इसने प्रथम राहमें कुशलता पूर्वक द्रोणको टाला, कृतवर्माका पराभव किया, आगे द्रोण और कृतवर्माका एक साथ पराभव किया ! यवनोंका पराभव किया । दुर्योधनको युद्धभूमिसे खदेड़ दिया । दुःशासनका पराभव किया । अलंबुष और जलसंघको मारा किंतु भूरिश्रवासे पराजित हुवा, भूरिश्रवाने इसको भूमि पर पटक कर घसीटा तब अर्जुनने भूरिश्रवाका हाथ तोड डाला ! इसके बाद युयुधानने भूरिश्रवाका वध किया । बचपनसे यह दुर्योधनका भी मित्र रहा है किंतु युद्धमें दुर्योधनसे वैसे ही घोर युद्ध भी किया है। जब धृष्टद्युम्नने असहाय अवस्थामें द्रोणाचार्यका वध किया तब इसने धृष्टद्युम्नकी भर्त्सना की थी । धृष्टद्युम्नसे लडाई होने तक प्रसंग आया था किंतु युधिष्ठिर और कृष्णके कहने पर टल गया । इसने कर्ण पुत्र प्रसेनका वध किया । भारत-युद्धमें बचे हुए कुछ वीरोंमें यह भी एक है । यादवी युद्धमें कृष्णकी निंदा किये हुए कृतवर्माका प्रतिज्ञा पूर्वक वध करके यह इतना क्रुद्ध हो गया कि जो सामने आया उसका वध करता हुवा आगे बढा । कृष्णने इसको शांत करनेका प्रयास किया किंतु अन्य यादव इस पर टूट पडे । इसकी रक्षा करनेमें प्रद्युम्न आगे आया और इसकी रक्षा करते करते वह भी मारा गया । यह भी मारा गया !! यह कृष्णार्जुनका परम प्रिय मित्र था, अनुयायी था । इसको सात्यकी भी कहा गया है । गीता अ० १. श्लो० ४-विराट- मत्स्य-देशका क्षत्रिय राजा । विराट इसकी राजधानी । इसकी दो पत्नियां थीं। प्रथम पत्नी सुरथा, उससे दो पुत्र श्वेत और शंख । दूसरी पत्नी सुदेष्णा । इसके भी दो संतान भूमिंजय अथवा उत्तरकुमार, कन्या उत्तरा । सुदेष्णा इसकी पट्टराणी । इसके ग्यारह भाई थे । ये सभी कुरु-पांडव युद्धमें पांडवोंकी ओरसे लडे हैं। शंख और उत्तर इन दो पुत्रोंके साथ यह द्रौपदी-स्वयंवरमें गया था । पांडवोंने अपना अज्ञातकाल इसीके घर बिताया था । अपने पास “कंक” इस नामसे रहनेवाले युधिष्ठिरको इसने द्यूतके गुट्टीसे मारा था । तब युधिष्ठिरकी नाकसे खून आया किंतु जब इसको मालूम हुवा कि कंक युधिष्ठिर था इसको अत्यंत पश्चात्ताप भी हुवा था । इस वर्ष भरमें पांडवोंने जो उपकार किये थे उससे यह इतना लीन हो गया था कि इसने अपनी पुत्री उत्तराको अभिमन्युको देकर विवाह किया । भारत युद्धमें यह स-परिवार-बंधु-पुत्रोंके साथ-पांडवोंकी ओरसे लडा था। जयद्रथ वधके दिवस रात्रि-युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया । भारत-युद्धमें इसका संपूर्ण वंश नष्ट हुवा । गीता अ० १. श्लो० ४-द्रुपद राजा- पृषत् राजाका पुत्र । पांचाल देशका राजा । इसको यज्ञसेन, पांचाल, और पार्षत भी कहा गया है । द्रोणाचार्यका पिता भारद्वाज इसका शस्त्र और शास्त्र गुरु । इसने अपना अध्ययन पूर्ण करके जब गुरु-दक्षिणा दी तब द्रोणाचार्य-अपने गुरु-बंधुसे-कहा था कि जब मैं राजा बनूंगा तब कभी तुम मेरे पास आओगे मैं तुम्हारी सहायता करूंगा । द्रुपद राजा हुवा । द्रोणाचार्यको आर्थिक सहायताकी आवश्यकता पडी । द्रोणाचार्य द्रुपदके पास गये । द्रुपदने आर्थिक सहायता नहीं दी इतना ही नहीं द्रोणाचार्यका अपमान किया । १० परिशिष्ट १
परिणाम स्वरूप द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे इसका बदला लिया। इनका आधा राज छीन लिया गया। इससे क्रुद्ध होकर द्रुपद द्रोणके नाशका विचार करने लगा। इसी विचारसे वह पागलसा घूमने लगा। तब अभिचार विद्या-संपन्न, लोभी, अपयाज ब्राह्मणके ऋत्विजत्वमें "द्रोण-शत्रु" पुत्र प्राप्तिके लिये यज्ञ किया। इसी यज्ञके परिणाम स्वरूप धृष्टद्युम्न और द्रौपदीका जन्म हुआ। द्रौपदी जब विवाह-योग्य बनी उसका स्वयंवर किया गया। इस स्वयंवरमें जो जो क्षत्रिय राजा आये थे उनको पांडवोंकी वेषभूषा देख कर ऐसा भ्रम हुवा कि द्रुपदराजने हम सबको अपमानित करके द्रौपदीको ब्राह्मण-कुमारको दे कर विवाहित किया है। इससे युद्धका प्रसंग भी आया। इस समय पांडवोंने अपने शौर्यसे सबका निवारण किया। आगे जब अपने पुरोहितसे पांडव क्षत्रिय होनेका ज्ञात हुवा, इसने बडे ही उत्साह और आनंदसे पांडवोंसे द्रौपदीका विवाह कर दिया। पांडवोंका वनवास और अज्ञातवास समाप्त होनेके बाद द्रुपदराजाने शिष्टाईके लिये अपने पुरोहितको धृतराष्ट्रके पास भेजा था। किंतु संधानका सभी प्रयास विफल होकर जब युद्ध अनिवार्य हुवा तब यह पांडवोंकी ओरसे लडनेके लिये आ गया। यह भी, अपने पुत्र और बंधुजनके साथ युद्धमें आया था। युद्धमें भी इसने खूब ही पराक्रम किया। यह भी जयद्रथ-वधके दिनके रातके युद्धमें, मार्गशीर्ष बद्य एकादशीको, अंतिम प्रहरमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया। द्रुपदको द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नके साथ शिखंडी, सुमित्र, प्रियदर्शन, चित्रकेतु, सुकेतु, ध्वजकेतु, धीरकेतु, सुरथ और शत्रुंजय ऐसे पुत्र थे। ये सब युद्धमें मारे गये। और यह वंश संपूर्ण रूपसे नष्ट हो गया। गीता अ० १. श्लो० ५-धृष्टकेतु- चेदिराजा, शिशुपालका लड़का। यह अत्यंत पराक्रमी था। इसके लड़के भी बडे शूर थे। बहुत ही कम लोग युद्ध भूमिमें इससे लड़नेका साहस कर सकते थे। भारत युद्धमें इसने अत्यंत योग्यताके साथ अर्जुनके चक्र-रक्षकका काम किया। यह अपने रथमें कांबोज-देशके घोडे बांधता था। एक बार जब यह द्रोण पर आक्रमण करके आगे बढ़ रहा था वीरधन्वाने इसे रोककर इसका धनुष्य तोड डाला, तब इसने अपना शक्रायुध इतने जोरसे वीरधन्वापर फेंक दिया कि उसके आघातसे वीरधन्वाका रथ चूर चूर हो गया और वीरधन्वा युद्ध-भूमिपर पटक दिया गया। इसके बाद यह अत्यंत वेगके साथ द्रोण पर आक्रमण करके आगे बढ़ा और द्रोणने इसको तत्काल मार गिराया। इसकी एक कन्या रेणुमति नकुलकी पत्नी थी। वीतिहोत्र इसका पुत्र था। गीता अ० १. श्लो० ५-चेकितान- वृष्णिवंशका क्षत्रिय राजा । दुर्योधनने इसका वध किया था। द्रौपदी स्वयंवरमें यह भी गया था। गीता अ० १. श्लो० ५-पुरुजित- कुंतिभोज राजाका पुत्र । कुंतीका भाई । पांडवोंका मामा। इसके रथके घोडे इंद्रधनुष्यके रंगके होते थे। युद्धमें द्रोणाचार्यसे यह मारा गया था। ज्ञानेश्वरी १८
गीता अ० १. श्लो० ५-कुंतिभोज— प्रथम यह निपुत्रिक था । इसलिये वसुदेवके पिता शूरसेनने अपनी कन्या पृथा-जो कुंती नामसे प्रसिद्ध है-इसको दत्तक दी। यह शूरसेनकी बूभाका लडका था। आगे इसका पुरुजित् नामका पुत्र हुआ। इस पुरुजितके अलावा इसके और दस पुत्र भी हुए थे। ये भी सब कुरु-युद्धमें लडने आये थे और इन सबको अश्वत्थामाने मारा। इसका द्रोणाचार्यसे जो युद्ध हुआ उस युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया। और यह वंश भी कुरु-युद्धमें समाप्त हुआ।
गीता अ० १. श्लो० ६-युधामन्यु— पांचाल । महारथी । महाधनुर्धर । धनुर्विद्या और गदायुद्धमें प्रवीण । कुरु-युद्धमें इसने द्रोण, दुर्योधन आदिसे युद्ध किया है। कुरु-युद्धमें लडकर जो कुछ थोडेसे वीर अंत तक बचे रहे इसमें यह भी एक था। युद्धके अंतिम दिन रातको नींदमें अश्वत्थामाके द्वेषाग्निमें जो आहुति हुए उनमें यह भी एक है। इस समय भी इसने अश्वत्थामा पर सोये सोये ही गदा-प्रहार किया किंतु इसके उठनेके पहले ही अश्वत्थामाने इसका वध किया। कुरुयुद्धमें यह अत्यंत वीरतासे लडा था।
गीता अ० १. श्लो० ६-उत्तमौजा— पांचाल देशीय राजपुत्र । यह भी कुरु युद्धके अंतिम दिनको रातके हत्याकांडमें अश्वत्थामासे मारा गया।
गीता अ० १. श्लो० ६-सौभद्र— अभिमन्यु । अर्जुनका पुत्र । माताका नाम सुभद्रा। जन्मके समय ही यह अत्यंत निर्भय और क्रोधी-सा लगता था । इसीलिये इसे अभिमन्यु कहा गया । यह अर्जुनके नेतृत्वमें धनुर्विद्या सीखा। इसकी शस्त्र-रचना और अस्त्र-कौशल्यसे प्रसन्न होकर बलरामने इसको रौद्र नामका धनुष्य दिया था। अपने पराक्रमके बलपर यह अत्यंत अल्पायुमें ही महारथी कहलाया। कुरु-युद्धमें द्रोणाचार्यने अत्यंत कुशलतासे अर्जुनको दूसरे युद्धमें उलझा कर मुख्य-युद्धमें चक्र- व्यूहकी रचना की । पांडवसेनामें अर्जुनके बिना चक्रव्यूहका भेदन करनेवाला महारथी दूसरा कोई नहीं था। तब अभिमन्युने भीमकी सहायतासे चक्रव्यूहका भेदन करनेका निश्चय किया। इसको चक्रव्यूहमें कैसे घुसना चाहिये इसकी जानकारी थी किंतु व्यूह भेदन करके कैसे बाहर आना चाहिये इसकी जानकारी नहीं थी। यह धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञा और आशीर्वाद लेकर युद्ध-भूमिमें उतरा। द्रोणाचार्य स्वयं व्यूहकी रक्षा कर रहे थे। फिर भी अभिमन्यु व्यूह तोड कर अंदर घुस गया। व्यूहमें घुसते ही इसने अपने शौर्यसे बडे बडे महारथियोंको भी मैदान छोड़नेके लिये बाध्य किया। सारी सेना पीछे हटने लगी। यह देखकर स्वयं द्रोणाचार्य इस पर चढ आये । अभिमन्युने कुशलता-पूर्वक उनको टालकर अश्मक राजाका वध किया । शल्यके भाईको मारा । इस पर चढ़ाई करके आये हुए कर्णको जर्जर करके युद्ध भूमि छोड़नेके लिये बाध्य किया ।
१५ परिशिष्ट १
· इस युद्धमें अभिमन्युका रक्षक भीम इससे दूर फेंका गया । अभिमन्युको अकेला देख कर दुःशासनने इसपर हमला किया । दुःशासनको युद्ध-भूमिसे भगाकर यह कौरव-सेनाका संहार करते करते इतना दूर निकल गया कि यद्यपि इसने भीमके लिये रास्ता खुला रखा था भीम इसके पास नहीं आ सका । अभिमन्युको अकेला देखकर दुर्योधनका पुत्र लक्ष्मणने इस पर आक्रमण किया किंतु यह अभिमन्युसे मारा गया । कर्ण पुत्र आक्रमण करके भाग गया । साथ साथ अन्य अनेक वीरोंको इसने स्वर्गकी राह दिखाई । यह देखकर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, बृहद्रथ, बृहद्वल ये सात महारथी एक साथ इससे लड़ने लगे । यह अकेला ही इन सबका निवारण करने लगा । सबने मिलकर अत्यंत कठिनाईसे इसको विरथ किया । तब अभिमन्यु ढाल और तलवार लेकर लड़ने लगा । द्रोणने वह भी तोड़ दिया । तब इसने गदा हाथमें उठाई । दुःशासनके पुत्रसे इसने गदायुद्ध प्रारंभ किया । यह अत्यंत थका हुवा था । भीम इससे दूर था । वहां जयद्रथने भीमको रोक रखा था । अभिमन्यू अकेला सात महारथियोंसे लड़ रहा था । दुःशासन पुत्रके गदा प्रहारसे वह मूर्च्छित हो गया । इस मूर्च्छासे सावध होनेके पहले ही दुःशासनके पुत्रने इस पर और एक गदा प्रहार किया जिससे अभिमन्यु मर गया । विराट कन्या उत्तरा इसकी पत्नी थी । जब अभिमन्युकी मृत्यु हुई तब उत्तरा गर्भवती थी । इसका पुत्र परीक्षित ही कुरु-युद्धमें समाप्त कुरु-कुलका एक मात्र संतान रहा, इसीने कुरु-कुलका प्रतिनिधि बनकर आगे राज्य किया । गीता अ० १. श्लो. ६ द्रौपदेय— (१) युधिष्ठिरसे प्रतिविंध्य, (२) भीमसे सुतसोम, (३) अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, (४) नकुलसे शतानीक (५) सहदेवसे श्रुतसेन । प्रतिविंध्य— भारत युद्धके अंतिम दिन युद्ध समाप्तिके बाद शिबिरमें निद्रित अवस्थामें अश्वत्थामासे मारा गया । सुतसोम— कोई जानकारी नहीं मिली । श्रुतकीर्ति— युद्धमें शल्यसे इसका पराभव हुवा था । इसको भी अश्वत्थामाने नींदमें मारा था । शतानीक— अश्वत्थामासे अंतिम दिन रातको मारा गया । श्रुतसेन— इसने कांबोज राजा सुदक्षिणसे युद्ध किया था । यह भी अश्वत्थामासे नींदमें मारा गया । गीता अ० १. श्लोक० ८ भीष्माचार्य— पिताका नाम शांतनु । माता गंगा । इनका शास्त्र-गुरु वसिष्ठ । बृहस्पति और शुक्रने इन्हे नीतिशास्त्र सिखाया था । परशुरामसे धनुर्वेद, राज-धर्म और अर्थ-शास्त्र सीखे । गंगा-पुत्र होनेसे इन्हे गांगेय भी कहा गया है । आमरण ब्रह्मचर्य और राज्याधिकार त्याग करनेकी घोर प्रतिज्ञा करनेके कारण ये भीष्म या भीष्माचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए किंतु वैसे इनका नाम देवव्रत था । एकके बाद एक तीर छोड़ कर ये गंगा प्रवाह रोक देते थे । जन्मके बाद ये इतना अधिक गुरुकुलमें रहे कि बाप भी इनको भूल गया था !! प्रथमावस्थामें गंगाने ही ज्ञानेश्वरी ३०
इनका पालन किया था। जब ये हस्तिनापुर आये और इनको युवराज्याभिषेक हुवा तब ये ३६ वर्षके थे। जब देवव्रत राज्य कार्य कर रहे थे तब शांतनु सत्यवती नामकी एक शूद्र कन्यासे मोहित हो गया। शांतनुने सत्यवतीके पितासे मंगनी की किंतु "सत्यवतीके पुत्रोंको राज्य नहीं मिलेगा" इस कारणसे उसने शांतनुकी मांग अस्वीकार कर दी। देवव्रतको जब यह ज्ञात हुवा तब इन्होंने पिताके सुखके लिये राज्याधिकार त्यागने तथा सत्यवतीके पुत्रोंके वंशमें ही राज्य रहे इसलिये आभरण ब्रह्मचर्यसे रहनेकी भी भीषण प्रतिज्ञा की। तबसे देवव्रत भीष्म इस नामसे प्रसिद्ध हुए। देवव्रतकी इस प्रतिज्ञासे सत्यवतीका शांतनुसे विवाह होकर उससे चित्रांगद और विचि- त्रवीर्य ऐसे दो पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगदको गद्दी पर बिठाकर भीष्म राज्य करने लगे। शांतनुकी मृत्युके बाद तुरंत उग्रायुधने भीष्मको संदेशा भेजकर विमाता सत्यवतीकी मंगनी की। भीष्मने इससे क्रुद्ध होकर तुरंत सेना सिद्ध करनेकी आज्ञा दी। किंतु पिताकी मृत्यु-दिनोंमें युद्ध प्रारंभ नहीं कर सकते, उग्रायुध अपनी मांग नहीं छोड़ता तब भीष्मने तीन दिन तक अथक युद्ध करके उसका वध किया। इसके बाद चित्रांगद किसी गंधर्वसे लड़ते समय मारा गया। भीष्मने विचित्रवीर्यको गद्दी पर बिठाया। विचित्रवीर्य भीष्मके नेतृत्वमें राज्य-कार्य चलाता था। कुछ काल बाद काशीराजाने अपनी तीन कन्याओंके स्वयंवरकी घोषणा की। भीष्म उस स्वयंवरमें गये और वहां जो राजा उपस्थित थे उन सबको आह्वान देकर तीनों राजकुमारियोंको उठाकर ले आये। हस्तिनापुरमें आकर भीष्मने इन तीनों लड़कियोंका विचित्रवीर्यसे विवाह करनेका निश्चय किया, तब जेष्ठ कन्या अंबाने कहा "मनसे मैंने शाल्वका वरण किया है।" यह सुनकर भीष्मने उसकी इच्छानुसार सब व्यवस्था कर दी किंतु शाल्वने उसका अस्वीकार कर दिया। इस पर वह तप करने लगी और भीष्मने अंबाकी अन्य दो बहने अंबिका और अंबालिकाका विचित्रवीर्यसे विवाह कर दिया। अंबा जहां तपस्या कर रही थी वहां उसको अपने वृद्ध नानाका दर्शन हुवा। नानाने नाती- की राम कहानी सुनकर परशुरामको शरण जानेको कहा और अंबा परशुरामको शरण जाकर भीष्म वधकी प्रार्थना करने लगी। परशुरामने केवल ब्राह्मण-कार्यार्थ ही शस्त्र लेनेका निर्णय करनेके कारण अन्य उपायसे अंबाका कार्य करनेका निश्चय करके गुरुके नाते भीष्मसे अंबाका स्वीकार करनेको कहा किंतु भीष्मने जिसने मनसे दूसरेका वरण किया है, उसके विषयमें भाईसे बात करनेसे अस्वीकार कर दिया। परशुरामने तब भीष्मको युद्धका आवाहन दिया। भीष्मने परशुरामको बहुतेरा समझाया किंतु व्यर्थ। अंतमें भीष्म और परशुरामका द्वंद्व युद्ध हुवा। चार दिन तक यह युद्ध हुवा और अन्तमें परशुराम पराजित हुए। प्रस्वाप अस्त्रके कारण परशुरामका पराजय हुवा। वह अस्त्र भीष्मके अलावा और कोइ नहीं जानता था। फिर अंबा भीष्मके नाशके लिये तप करने लगी। तब महादेवने तेरे ही हाथसे भीष्मका वध होगा ऐसा वर दिया और अंबाने शरीर त्याग दिया। यहां विचित्रवीर्यको क्षय हुवा। सत्यवतीने भीष्मसे विवाहकी प्रार्थना की। भीष्मने प्रतिज्ञा- भंग अस्वीकार कर दिया। तब व्याससे अंबिका अंबालिकामें संतानोंत्पादन कराया गया। उसमें धृतराष्ट्र अंधा था इसलिये पांडुको गद्दीपर बिठाकर भीष्म राज्य देखने लगे। कौरव पांडवोंमें वितुष आकर पांडवोंको बनवास, अज्ञातवास, करना पड़ा। उनके वनवासके बाद द्रुपदराजाने अपने पुरोहितको संधानके लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा। उस समय भीष्मने पांडवोंके अधिकारको स्वीकार ३१ परिशिष्ट १
करके दुर्योधनको पांडवोंसे सख्य करनेको कहा। इसका कोई उपयोग नहीं हुआ। कौरव पांडव युद्ध अनिवार्य हुआ। भीष्मको तब कौरव-सेनाका सेनापति बनना पडा। सेनापतिका पद स्वीकार करते समय भीष्माचार्यने कहा था "मैं पांडवसेनाका नाश करूंगा किंतु पांडवोंमेंसे किसीका वध नहीं करूंगा ! जब मैं सेनापति रहूंगा तब कर्ण युद्धभूमि पर नहीं लडेगा !!" इतने शर्तके साथ भीष्माचार्यने सेनापति पद स्वीकार किया; उसके प्रथम भीष्माचार्यने दुर्योधनको अपनी शक्ति, अशक्ति तथा युद्धनीतिका संपूर्ण परिचय दिया था। इस समय उन्होंने कहा था "एक महीनेमें मैं शत्रुसेनाको छिन्न विछिन्न कर दूंगा !" अठारह दिनके युद्धमें दस दिन तक वे ही लडते रहे। उसके बादके आठ दिनोंमें तीन सेनापति बने । कृष्णने प्रतिज्ञा की थी "युद्धमें मैं हथियार नहीं उठाऊंगा।" भीष्माचार्यने तब कहा "मैं कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य करूंगा !" युद्धके तीसरे ही दिन भीष्माचार्यने कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य किया ! भीष्माचार्यने अर्जुनको हतबल करके मूच्छित किया । यह देख कर क्रुद्ध कृष्ण रथ-चक्र उठाकर जब भीष्माचार्य पर चढ दौडे तब भीष्माचार्य अपने हाथके शस्त्र नीचे रख कर "प्रत्यक्ष परमात्मा ही मेरा वध करेगा !" कहकर हाथ जोड कर स्तवन करने लगे। इसी प्रकार नौवे दिन भी हुआ !! नौवे दिन दुर्योधनके कटु-वाक्योंसे तंग आकर भीष्माचार्यने कहा "कलके युद्धमें मैं या पांडव दोनोंमेंसे एक रहेंगे !" "मैं निष्पांडव पृथ्वी करूंगा !" यह प्रतिज्ञा सुनकर पांडव घबरा उठे; वे कृष्णको साथ लेकर भीष्माचार्यके वधका उपाय पूछनेके लिये भीष्माचार्यके पास गये । युधिष्ठिरने भीष्मकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिलाकर उनके वधका उपाय पूछा । भीष्माचार्यने भी अत्यंत प्रेमसे पांडवोंका अदरातिथ्य करके कहा "मैं उससे नहीं लडूंगा जिसका रथ-कलश रथ-ध्वज अमंगल होगा, मैं किसी हीन व्यक्तिसे नहीं लडूंगा, अथवा मैं स्त्रीसे नहीं लडूंगा। तुम्हारी सेनामें द्रुपद्-पुत्र जो शिखंडी है, वह जन्मतः स्त्री था, आगे चलकर पुरुष बना ! इसलिये शिखंडीका ढालसा उपयोग करके अर्जुन मुझे मार सकता है ! तब मैं असहाय बनूंगा। तुम मेरा वध करके विजयी बनोगे !" दूसरे दिन, अर्थात् युद्धके दसवे दिन अर्जुनने शिखंडीको आगे रख कर भीष्मसे लडना प्रारंभ किया । भीष्माचार्यका शरीर बाणोंसे छिदसा गया। यह मार्गशीर्ष वद्य सप्तमीका दिन था । उस दिन फाल्गुनी नक्षत्र था । संध्याका समय था, अर्जुनके बाणोंसे भिदकर भीष्माचार्यका शरीर रथसे बाहर जा पड़ा ! वह रथके नीचे शर शैया पर पडा। उनका सिर लटकने लगा । सिरके पास तीन बाण मार करके अर्जुनने सिर उन बाणों पर टिका दिया। तब भीष्मने कहा मुझे बडी प्यास लगी है और अर्जुनने अपने बाणसे पृथ्वी भेद कर गंगा प्रवाह उनके मुखमें पडे ऐसा किया । भीष्माचार्य इससे अत्यंत संतुष्ट हुए । उन्होंने कहा "भीष्म-वधसे कौरव पांडवोंका वैर शांत हो !" किंतु दुर्योधन नहीं माना । उसके बाद, वहां दूसरा कोई नहीं था तब कर्ण भीष्माचार्यका दर्शन करने आया । तब दोनों मुक्त हृदयसे मिले। भीष्माचार्यने कर्णसे कहा "कौरव-पांडवोंका सख्य हो ऐसा कर ! अथवा पांडवोंकी ओरसे लड़ !!" किंतु उसका अस्वीकार करके कर्णने लड़नेकी आज्ञा मांगी ! भीष्मने कर्णको वैसी आज्ञा दी। युद्ध समाप्तिके बाद युधिष्ठिर कुलक्षय देख कर जब अत्यंत दुःखित हो गया था तब भीष्माचार्यका शरीर अत्यंत निःसत्व हुआ था। फिर भी, युधि- ष्ठिरका मन स्वस्थ हो इसलिये भीष्माचार्यने उसको धर्मोपदेश दिया। उसके बाद माघ शुद्ध ज्ञानेश्वरी २२
अष्टमीके दिन उत्तरायणमें भीष्मने शरीर-त्याग किया। भीष्माचार्य इच्छा-मरणी थे। तभी वे अपना शरीर ऐसे टिका सके। भीष्मके ध्वज पर तालवृक्षका चिह्न रहता था। मृत्युके समय भीष्मकी आयु १८६ वर्षकी थी। गीता अ० १. श्लो० ८-कर्ण- कुंतिभोज राजाने जब पृथाको गोद लिया उसको अतिथि सत्कारका काम सौंप दिया था। पृथाने अर्थात् कुंतीने यह काम अत्यंत दक्षतासे किया। एक बार दुर्वासा ऋषि जब कुंतिभोजका अतिथि बने तब कुंतीकी सेवा शुश्रूषासे अत्यंत संतुष्ट होकर कालांतरसे कुंती पर आनेवाले संकटका विचार कर उसे दुर्वासा-ऋषिने एक वशीकरण मंत्र दिया और कहा "इस मंत्रसे तू जिसे बुलायेगी वह देवता आकर तुझे पुत्र देगा !" दुर्वासा ऋषी गये । आगे कुंतीको मंत्र शक्तिकी प्रतीति देखनेकी जिज्ञासा हुई। उसने विधिवत् मंत्रका जाप करके सूर्यको बुलाया और प्रत्यक्ष सूर्यको सम्मुख पाकर चकित हो गयी। सूर्यसे कुंतीको कवच-कुंडलयुक्त पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वही कर्ण है। कुंतीने लोक-लज्जाके भयसे कर्णको एक पेटीमें डाल करके अश्व-नदीमें छोडा दिया। यह पेटि बहते बहते यमुना नदीमें आयी और धृतराष्ट्रका सारथी अधिरथने देखी। वह पेटिका लेकर अधिरथ घर आया और उसने वह अपनी पत्नी राधाको दी। यह बालक देखते ही राधाका वात्सल्य फूट पडा। उसके स्तन आर्द्र हो गये। उसने कर्णको छातीसे लगा लिया। इस प्रकार कर्ण राधाकी गोदमें बढकर राधेय कहलाया। किंतु इसकी तेजस्विता देखकर स्वयं राधाने इसको वसुषेण कहा था। द्रोणाचार्य इसका शस्त्र-गुरु है। कृष्णने इसको वेद शास्त्रज्ञ कहा है। जब कर्ण और दुर्योधनका परिचय हुवा तब कौरव-पांडव विरोधका बीज पड चुका था। दुर्योधनने " यह अर्जुनको भी भारी जायेगा !" ऐसा मानकर इससे मैत्री की। यद्यपि कर्णने द्रोणसे शस्त्राभ्यास किया द्रोणने इसको ब्रह्मास्त्र नहीं सिखाया। इसी एक कारणसे अर्जुन इससे श्रेष्ठ था। स्वभावसे यह उद्धत और अपनी बडाई कहनेवाला था। कई बार इसने द्रोणसे ब्रह्मास्त्र सिखानेको कहा किंतु द्रोणाचार्यने टाल दिया। मन ही मन यह अर्जुनसे द्वेष करता था, अर्जुनसे बढ कर वीर होनेकी अभिलाषा करता था इसलिये यह ब्रह्मास्त्र प्राप्तिके लिये परशुरामके पास गया। परशुराम क्षत्रियोंको विद्या-दान नहीं करते थे केवल ब्राह्मणोंको ही धनुर्विद्या सिखाते थे । इसलिये कर्णने परशुरामसे असत्य कहा। गुरु-वंचनासे ही इसकी ब्रह्मास्त्र-साधना प्रारंभ हुई। परशुरामने इसको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। कर्ण परशुरामके पास रहने लगा। परशुरामने इसे सप्रयोग ब्रह्मास्त्र सिखाया। एक दिन व्रतोपवाससे श्रांत परशुराम कर्णकी गोदमें सिर रख कर सो गया। उसी समय किसी कृमिने कर्णकी जांघ काट खाई। "गुरुदेव जग जायेंगे !" इस विचारसे कर्ण सारी वेदनाको सहते हुए स्थिर आसनसे बैठे रहे किंतु कर्णके बहनेवाले रक्तसे परशुराम जग गये। इस घटनासे परशुरामको कर्णके ब्राह्मण होनेमें संदेह हुवा। परशुरामने कर्णसे प्रश्न किया और कर्णने सभी सच्ची बात कह सुनाई। परशुराम इससे संतुष्ट तो हुए किंतु गुरुसे असत्य कहनेके उपलक्ष्यमें संमान योद्धासे युद्ध करते समय तथा वध होते समय इस अस्त्रकी स्फूर्ति न होनेका शाप मिला। ३३ परिशिष्ट १-