भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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करने लगा । तब दुर्योधनके बाणसे वह बेहोश हुवा और उठते ही उसने सेनापति जरासंध, सुषेपेण, उग्र, वीरबाहू और उसका सारथी, भीमरथ और सुलोचन इन लोगोंका वध किया। युद्धके छठे दिनमें भीमने अत्यंत पराक्रम किया। जैसे किसी हथौडेसे मिट्टीके गोले तोडे जाते हैं वैसे भीमने शत्रु सैन्यको नष्ट किया है। आठवे दिन भीष्म क्रुद्ध हो कर इस पर टूट पडा। तब भीमने भीष्मके सारथीको मारा। भीष्मका रथ अस्ताव्यस्त होकर भाग खडा हुवा। फिर भीमने सुनामा, आदित्य, केतु, बहबासी, कुंढाधार, महोदर, अपराजित, विशालाक्ष इन धृतराष्ट्र पुत्रोंको मारा। इसी दिन मध्यान्हमें भीमने अनाधृष्टि, कुंडली, कांडमेदी, विराज, दीप्तलोचन, दीर्घबाहू, सुबाहु, मकरध्वज आदि कौरवोंका वध किया। नवमें दिन भगदत्त और श्रुतायुके गजदलका भीमने नाश किया। दसवे दिन भीम, भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा, अवंत्य, बंधु, जयद्रथ, विकर्ण, दुर्मर्षण, इन दस लोगोंसे लड कर भी पराजित नहीं हुवा। जब अर्जुन शिखंडीको आगे करके भीष्म पर आक्रमण करने जा रहा था तब भीमने इन सबको राहसे हटा दिया। ग्यारहवे दिन अभिमन्युने शल्यके सारथीको मारा और शल्यने जब अभिमन्युको गदायुद्धके लिये ललकारा तब अभिमन्युको हटा कर भीम शल्यसे गदायुद्ध करने लगा। इस युद्धमें शल्य मूच्छित हो गया। चौदहवे दिन जयद्रथ वध हुवा। अर्जुन उस युद्धमें उलझ गया था तब युधिष्ठिरने भीमको भी वहां जानेको कहा। युधिष्ठिरकी आज्ञासे जब भीम उस ओर जा रहा था तब दुःशल, चित्रसेन, कुंडभेदी, विविंशति, दुर्मुख, दुःसह, विकर्ण, शल, विंद, अनुविंद, सुमुख, दीर्घबाहु, सुदर्शन, वृंदारक, सुहस्त, सुषेण, दीर्घलोचन, अभय, रौद्रकर्म, सुवर्मन्, तथा दुविमोचन इतने लोगोंने एक साथ भीमपर आक्रमण कर दिया, किंतु भीमने इन सबको हटाकर इनके घेरेका अतिक्रमण कर दिया। स्वयं द्रोणाचार्य आगे आये। मानापमानका प्रश्न लेकर इन दोनोंमें कुछ बातचीत हुई। भीम भडक उठा। उसने द्रोणके रथको तोडकर फेंक दिया। द्रोण पादचारी बने। भीमने दुश्शासनको मार भगाया। द्रोण दूसरे रथमें आये। पादचारी भीमने वह रथ भी तोड कर फेंक दिया । उस दिन भीमने द्रोणके एकके बाद एक ऐसे आठ रथ तोड कर फेंक दिये । साथ ही साथ कुंडभेदी, शैद्रकर्मन्, अभय इन धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया और अंतमें अर्जुनके पास पहुंच ही गया तब अर्जुनसे मिलनेका संकेत मानकर अपना प्रचंड शंखनाद किया। कर्ण तब भीम पर चढायी कर आया और भीमने कर्णके घोडे मार दिये। कर्ण वृषसेनके रथपर चढ़ कर आगे बढ़ आया तब भीमने कर्णको मूच्छित किया और सारथी रथको लेकर भाग गया। होश संभाल कर कर्ण पुनः भीम पर चढाई कर आया। इस बीचमें भीमने दुःशलका वध किया। दुर्मुखका वध किया और कर्णको पुनः रथ-हीन करके भगा दिया। कर्णकी यह पराजय देखकर दुर्मर्षण, दुर्मद, दुर्धरने, भीमपर आक्रमण किया और भीमके प्रहारोंसे मर भी गये। इसके बाद भी कर्ण भीम पर पुनः चढ़ाई कर आया। भीम कर्ण युद्ध हुवा। इस युद्धमें भी कर्णकी पराजय होती है यह देख कर, दुर्योधनने अपने बंधु शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र, चित्रायुध, दुष्ट, चित्रसेन, और विकर्णको भीम पर चढाई करनेको कहा और भीमने उन सबको वहीं मसल दिया। इनके साथ ही साथ चित्राक्ष, चित्रवर्मा तथा शरासनको भी मार गिराया। किंतु विकर्ण भीमका प्रियपात्र था इसलिये उसकी मृत्युपर भीमको शोक हुवा। इसके बाद भी भीम-कर्ण युद्ध हुवा। थोडी ही देरमें कर्णने इसके साथ लडना छोड दिया। इस दिन रातको ९ परिशिष्ट १. (३)