ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब मेरी गर्जनसे मैं उसे गूंजाऊंगा!" कह कर आगे छोड़ दिया। वहींसे वह सौगंधिक वनमें गया। वहां सौगंधिक सरोवरमें सहस्रदल कमल थे। इन कमलोंकी रखवालीमें क्रोधवश नामके राक्षस थे। उन्होने भीमको एक भी कमल देनेसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कुबेरकी आज्ञा ले आनेको कहा। इसीमें कहासुनी होकर दोनोंमें द्वंद्वयुद्ध छिड़ गया और उसमें उन राक्षसोंको मार खाकर भाग जाना पड़ा। वे राक्षस कुबेरकी ओरसे रखे गये थे। उन्होंने कुबेरसे सब बात कही और कुबेरने उनको कमल लेनेकी आज्ञा दी। इसी बीच युधिष्ठिर घटोत्कचकी सहायतासे वहां आया। कुबेरने वहां उनका स्वागत किया। वे कुछ दिन वहां रहकर गंधमादन पर्वत पर जा कर अर्जुनकी प्रतीक्षा करने लगे। वहां भीमने जटासुरको मारा। तब द्रौपदीने भीमसे कहा "यहां का यह सुंदर प्रदेश तू निर्भय कर दे!" भीमने तुरंत कई क्रोधवश राक्षस मार दिये। कुबेरका एक मित्र राक्षस मणिमान्को मार दिया। पांडवोंने वहांसे मेरु-पर्वतका दर्शन किया और गंधमादन पर्वत पर आ कर रहने लगे। वहांसे पांडव द्वैतवनमें रहने गये। पांडव जब मृगयामें गये थे तब आकर जयद्रथ द्रौपदी और धौम्यको भगाकर ले गया। यह सुन कर भीम और अर्जुनने जयद्रथके सैन्यको हराकर उसको बांधकर धर्मराजके सम्मुख खड़ा किया। भीमने तब जयद्रथके सिर पर लाथ मारी। धर्मराज युधिष्ठिरने उसको क्षमाकरके छोड़ दिया। वनवासके बाद ये सब अपना वेष बदलकर विराटके घर रहे। तब भीम वहां रसोइया और मल्ल बनकर रहा। वहां इसका प्रसिद्ध नाम बल्लव था। वैसे यह जयेश भी कहलाता था। इसने तब विराटसे कहा था "मैं युधिष्ठिरके पास रसोया था।" विराट नगरमें जब एक दिन शंकरोत्सव हुवा तब वहां कुश्तियां हुईं। उन कुश्तियोंमें जीमूत नामका एक प्रसिद्ध मल्ल आया था। वह अत्यंत शक्तिमान था। कोई भी उसके साथ लड़ने के लिये तैयार नहीं थे। फिर भीमसे कहा गया। भीमको डर था कहीं कोई मुझे पहचानेगा। हां ना करते करते वह उठा। फिर उस कुश्तीमें भीमने जीमूतका वध किया। इन्हीं दिनोंमें विराट राजाका सेनापति और श्यालक कीचक द्रौपदी पर मोहित हुवा। वह द्रौपदीको तंग करने लगा। द्रौपदीने भीमसे कहा। भीमने कहा "प्यारसे बातें करके उसको दूसरी प्रहर रातको नृत्यशालामें भेज दे!" कीचक रातको वहां आया। भीम और कीचकका द्वंद्व-युद्ध हुवा। भीमने कीचकको मार डाला। दूसरे दिन प्रातःकालमें कीचकके बंधुओंने कीचकके साथ द्रौपदीको भी जला देनेकी सजा सुना दी। अब द्रौपदीको जलायेंगे इतनेमें भीम अपने मुख पर बाल बिछाकर हाथमें एक बड़ा वृक्ष उठाकर आ गया। द्रौपदीने अपनेको गंधर्व-पत्नी घोषित कर रखा था। "गंधर्व आया!" कह कर कीचक-बंधु भागने लगे किंतु भीमने उनको पकड़ कर मसल दिया ! युद्धके पहले भीमने एक बार कृष्णसे शांति-संधान करनेको कहा था। सुनकर कृष्णको आश्चर्य हुवा। तब भीमकी बात सुन कृष्ण चकित हो गया था। युद्ध प्रारंभ होते ही भीमने, दूसरे दिनमें भानुमान कलिंग, उसके चक्र रक्षक सत्य और सत्यदेव, भानुमानका पुत्र शक्रदेव केतुमान्, आदिका वध किया। चौथे दिनमें भीम और दुर्योधनका मुकाबला हुवा। भीमने दुर्योधनकी गजसेनाका धुव्वा उड़ाया। दुर्योधनकी आज्ञासे उसका सारा सैन्य भीम पर आक्रमण कर उठा तब भीमने उस सेनाका भी धुव्वा उड़ाया। तब भीष्म बीचमें आये और सात्यकीने भीष्मको रोका। दुर्योधन अपने सभी भाइयोंके साथ खड़ा है यह देखकर भीम उन पर आक्रमण ज्ञानेश्वरी ६