ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 953, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक संतान होने तक उसके साथ रहनेका वचन दिया था। हिडिंबाने भी इसको मान लिया। इसी समय हिडिंबाको भीमसे घटोत्कच हुवा था। इस घटनाके बाद पांडव कुंतिके साथ एकचक्र नगरमें रहने गये। वहां भीमने बकासुरका वध किया। कुछ दिनमें पांडवोंको पता लगा कि द्रुपदराजाकी कन्या द्रौपदीका स्वयंवर है। पांडव उस स्वयंवरमें गये। अर्जुनने स्वयंवरमें द्रौपदीको जीत लिया। वहां अन्य राजाओंसे भीम और अर्जुनका युद्ध हुवा। फिर वे द्रौपदीके साथ घर आये। भीमने कहा "मां भिक्षा लाये हैं।" और कुंतीने कहा "पांचो बांटकर खावो!" फिर खूब चर्चा होनेके बाद द्रुपदराजाने द्रौपदीका अलग अलग दिन पांडवोंसे अलग अलग विवाह कर दिया। स्वयंवरमें कृष्ण भी था। उसने पांडवोंको पहचान कर बलरामसे कहा था। फिर कृष्ण और बलराम पांडवोंसे मिलने भी गये थे। इस घटनाके बाद पांडव द्रौपदीके साथ हस्तिनापुर आये। भीष्म धृतराष्ट्र आदि वृद्ध जनोंने खूब विचार विनिमय करके पांडवोंको आधा राज्य दिया। इसी समय युधिष्ठिरने राजसूय-यज्ञ किया। राजसूय-यज्ञके प्रारंभमें युधिष्ठिरने भीम और अर्जुनको कृष्णके साथ जरा- संघको मारनेके लिये भेज दिया। वहां ये तीनों ब्राह्मणवेषमें गये थे। वहां कृष्णने युद्ध भिक्षा मांगी। जरासंघने भीमको चुना। दस दिन तक भीम और जरासंघका द्वंद्व युद्ध हुवा। दस दिनके बाद जरासंघ थक गया। तब भीमने जरासंघको चीर कर फेंक दिया। उसके बाद भीमको अन्यान्य राजाओंको जीतनेके लिये पूर्व दिशामें भेज दिया। इस दिग्विजयमें भीमके साथ मद्रक राजा थे। भीमने पूर्वमें पांचाल, विदेह, गंडक, दशार्ण दक्षिणमें पुलिंद, कुमारका श्रेणिमंत, कोसलका बृहद्वल, अयोध्याका दीर्घयज्ञ, गोपालकक्षदेश, मल्ल, हिमालयकी तराईका जलोद्भव, भल्लाट, शुक्तिमान्-पर्वत, काशिराज, सुबाहु, सुपार्श्व, मत्स्यदेश, अभयदेश, आदि २१ राज्योंको जीता। इस यज्ञमें भीम पाकशालाकी व्यवस्था देखता था। जिस स्थान पर यज्ञ हुवा था वह मय-सभागार अत्यंत कुशलतासे बनाया गया था। उसकी कुशल कलास्मिकताके कारण बार बार दुर्योधनकी दुर्गत होती थी तब भीम उसको हंसता था। इसीके परिणाम स्वरूप कपट-द्यूत हुवा। इस द्यूतमें दुर्योधनने पांडवोंका सर्वस्व हरण किया था। युधिष्ठिर द्रौपदी भी हार गया। तब सभामें दुश्शासनने उसके बाल पकड़ें और भीमने प्रतिज्ञा की "यह तेरा हाथ शरीरसे अलग करके फेंक दूंगा और तेरा खून पीऊंगा!" इसी समय दुर्योधनने अपनी जंघा खुली करके दिखाते हुए द्रौपदीसे कहा "तू मेरी मांद पर बैठ जा !" तब भीमने कहा "वहां मेरी गदा बैठेगी।" पांडव वनवासमें गये । चौथे दिन जिस वनमें गये वहां एकचक्र नगरके बकासुरका भाई किर्मीर रहता था। उसकी और युधिष्ठिरकी कुछ बोलचाल हुई। इस बोलचालने युद्धका रूप ले लिया और भीमने उसका वध किया। एक दिन हवामें उड़ता आया हुवा एक सहस्रदल कमल, देखकर भीम द्रौपदीसे "तुझे ऐसे कमल ला दूंगा !" कहता हुवा गंधमादन पर्वत पर गया। वहां उसने रास्ते पर अपनी दुम फैलाकर बैठा हुवा एक वानर देखा। भीमने उस वानरको अपनी दुम हटानेको कहा किंतु वानर नहीं माना ! उसने कहा "तू यह दुम हटा दे फिर आगे जा !" वहां इसका मद उतरा। उसको ज्ञात हुवा कि यह हनुमानजी हैं। फिर हनुमानजीने अपना विराट् रूप दिखाया। भीमको आशीर्वाद दिया। और "अब तू युद्ध-भूमिमें सिंहनाद करेगा परिशिष्ट १