ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 952, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रु पर वार किया" कह कर इसकी भर्त्सना की। परिणाम स्वरूप दोनोंमें युद्ध होनेकी स्थिति निर्माण हो गयी तब कृष्णने बीच बचाव करके दोनोंको शांत किया। युद्ध समाप्ति के बादकी रातको शिविरमें निद्रस्त धृष्टद्युम्नकी अश्वत्थामाने हत्या की। धृष्टद्युम्नके पाँच पुत्र थे। क्षत्रंजय, क्षत्रवर्मन्, क्षत्रधर्मन्, क्षत्रदेव, धृष्टकेतु, सबके सब भारत-युद्धमें द्रोणाचार्यसे मारे गये। इस प्रकार भारत-युद्धमें संपूर्ण पांचाल-वंश ही नष्ट हो गया। गीता अ० १, श्लो० ४-भीम पांडुराजा और कुंति पुत्र। द्वितीय पांडव। जब यह पैदा हुआ तब आकाशवाणी हुई कि "यह महाबली है।" बचपनमें ही यह इतना बली था कि एक बार माताके हाथसे छूट कर पत्थर पर गिर पड़ा तो पत्थरके टुकड़े टुकड़े हो गये ! पहले इसने अपने अन्य भाइयोंके साथ ही शर्यातीके शुक नामके पुत्रसे शस्त्र विद्या सीखी। सब पांडव तब अपने पिताके साथ हेमवत पर्वतके शतशृंग नामक अरण्यमें थे। जब पांडुकी मृत्यू हुई तब वहाँके ऋषियोंने कुंति माद्रीके साथ पांडवोंको हस्तिनापुर पहुंचाया। तबसे पांडव और कौरव साथ साथ पढ़ते बढते और खेलते रहते। भीम खेलमें सबको तंग करता था। इसके सामने कौरवोंकी एक भी नहीं चलती थी। हर बातमें अपनी हेठी होती देख कर ईर्ष्यासे दुर्योधनने कई बार इसको मार डालनेका षडयंत्र किया। एक बार जलक्रीडाके समय जहर देकर जल केलीमें थक कर सोये हुए-विषबाधासे बेसुध-भीमको हाथ पैर बांधकर नदीमें फेंक दिया। जहां इसको फेंका था वहां पानी अत्यंत गहरा था। नीचे अमृत कुंड थे। वासुकीकी सहायतासे पेट भर अमृत पीकर, भीम युद्धमें कभी न थकनेकी शक्तिके साथ वहांसे ऊपर आया। यह गदायुद्धमें निपुण था। अपनी शिक्षा दीक्षाकी परीक्षा देते देते एक बार भीम और दुर्योधन युद्ध-प्रवृत्त हुए तब द्रोणने उनको रोका। इससे धृतराष्ट्रने कौरव और पांडवोंको दूर रखनेका निश्चय किया। उस समय "वारणावतमें बड़ा मेला होगा !" ऐसी अफवा उठाकर, पांडवोंको वहां जानेको प्रवृत्त किया और दुर्योधनने वहां पांडवोंको कुंती माताके साथ लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेकी योजना बनाई। किंतु विदुरसे पहले ही इसकी और इस गृहसे बाहर जानेके गुप्त मार्गकी जानकारी मिलनेसे इस समय भी पांडव बच गये। स्वयं भीम ही घरमें आग लगा कर माता तथा भाइयोंको साथ लेकर गुप्त मार्गसे बाहर निकल आया। वहांसे जब ये गंगातीर पर आये वहां विदुरके लोगोंने इन्हे गंगा पार उतार दिया। वहां भीम अपनी माता तथा भाइयोंको उठा कर वनमें चला गया। तब कुंति और युधिष्ठिरको प्यासा देखकर उन्हे वहीं छोड़ कर यह पानी लाने गया। पानी ले आया तब सभी नींदमें सो गये थे। यह वहीं उनका रक्षण करने बैठ गया। पास ही हिडिंब नामका राक्षस रहता था। उसको मनुष्यकी गंध आने लगी। उसने अपना शिकार देखनेके लिये बहन हिडिंबाको भेज दिया। हिडिंबा भीमको देख कर मोहित हो गयी। वह अपना स्वीकार करके भाग जानेको कहने लगी। भीमने उसकी बात नहीं मानी। गयी हुई बहन इतनी देर होने पर भी क्यों नहीं आयी यह देखनेके लिये हिडिंब वहां आया। भीमसे उसकी बातचीत हुई, तू तू मैं मैं होकर, लडाई प्रारंभ हो गयी। इस द्वंद्व युद्धसे पांडव सब जग गये। भीमने हिडिंबका वध किया। हिडिंबाने कुंतीसे सारी बातें कहीं। वह अपनी माता और भाइयोंको साथ लेकर जाने लगा तो हिडिंबा भी उनके पीछे पीछे आने लगी। भीमने उसको भी मारनेकी बात कही, किंतु कुंति और युधिष्ठिरके कहनेसे उसका पाणिग्रहण किया। तब भीमने केवल ज्ञानेश्वरी ६