ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँच दिन तक ये सेनापति रहे और पांडव सेनाके बड़े बड़े महारथी इसी कालमें मारे गये । उनमें अभिमन्यु और घटोत्कच मुख्य हैं । इन्होंने प्रतिज्ञापूर्वक अभिमन्यु वध किया । अभिमन्यु वधसे संतप्त अर्जुनने जयद्रथ-वधकी प्रतिज्ञा की और वह पूर्ण की । द्रोणाचार्यने जयद्रथकी रक्षाके लिये विशिष्ट व्यूह रचना की थी फिर भी अर्जुनने जयद्रथका वध किया इससे संतप्त होकर द्रोणाचार्यने रात्रीके समय भी युद्ध चालू रखा । वह युद्धका पंद्रहवा दिन था। दिन भर लडकर थके हुए वीरोंने बड़े आवेशसे रातको भी लडाई की । इसी युद्धमें घटोत्कच और भीमने त्राही मचा दी । रात दिन लडकर थके हुए वीरों पर जब निद्रा देवीने अपना जाल बिछाया भीमने इसका पूरा लाभ लिया । उसने इंद्र वर्माका अश्वत्थामा नामका हाथी मारा ! सारी पांडवी सेना "अश्वत्थामा मारा गया !" कह कर चीखने चिल्लाने लगी । यह सुन कर द्रोणाचार्य दुःखी हुए । आचार्यने निर्णयके लिये युधिष्ठिरसे पूछा । कृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरने "अश्वत्थामा मारा गया !" कहते हुए भी धीरेसे "हाथी !" कहा जो द्रोणाचार्य नहीं सुन सके । उन्होंने पुत्रशोकमें शस्त्रसंन्यास लिया । इसी समय भरद्वाज आदि पितरोंने " तू ब्राह्मण होकर भी युद्धमें शस्त्र उठानेका पाप किया !" कहते हुए शस्त्र छोड कर योगमार्गका आसरा लेनेको कहा और धृष्टद्युम्नने "यही ठीक समय !" जान कर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । ये मार्गशीर्ष वद्य द्वादशीको दोपहर मारे गये । मृत्यूके समय इनकी आयू ९५ वर्षके आस पास थी । कृष्णाजिन और कमंडलु इनका ध्वज चिन्ह था । इन्होंने द्रुपदराजा, विराट, द्रुपदपुत्र शंख, और वसुदानका वध किया है । गीता अ० १. श्लो. ३-द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्रुपदराजाका पुत्र ! अयोनिंसभव ! द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे द्रुपदराजाको बंदी बना कर उसका आधा राज्य छीनकर छोड़ दिया था । परिणामस्वरूप द्रुपदराजा दुम पर पैर देकर छोडे हुए सांपकी भांति द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये पागल हो गया । द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये द्रुपदराजाने जो यज्ञ किया उस यज्ञसे धृष्टद्युम्न पैदा हुवा और द्रौपदी भी । द्रोणाचार्य ही इसके अस्त्र-गुरु थे । यह युद्धमें अत्यंत पराक्रमी था । वैसे ही चतुर भी । जब द्रौपदी स्वयंवरमें ब्राह्मणकी वेष-भूषामें आये पांडवोंने द्रौपदीको जीता तब सारी राज-सभा उद्विग्न हो गयी । "ब्राह्मणोंने क्षत्रिय-कन्या कैसे जीती ?" यह उद्विग्नता इतनी तीव्र थी कि उसी समय महा-युद्ध होनेकी नौबत आयी किंतु धृष्टद्युम्नने अत्यंत योग्यता पूर्वक पांडवोंका परिचय देकर प्रसंग निभा लिया । भारत युद्धमें आदिसे अंत तक यही सेनापति रहा । और अत्यंत कुशलतासे सेना-संचालन करता रहा । युद्धके अंतमें बचे हुए कुछ सेनानियोंमें यह भी एक था । युद्धके पंद्रहवे दिन दोपहरको भीमने अश्वत्थामा नामका एक हाथी मारा । और सारी पांडव सेनामें भीमने अश्वत्थामाको मारा "कोलाहल मच गया ।" द्रोणाचार्यने सोचा "मेरा पुत्र अश्वत्थामा मारा गया" और शोक-मग्न द्रोणाचार्यने शस्त्र रख दिया । "यही मौका" जान कर धृष्टद्युम्नने गुरु द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया ! यह देखकर सात्यकीने "असहाय स्थितिमें निःशस्त्र ५ परिशिष्ट १.