भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 956, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 956

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भी युद्ध चलता रहा । रातको भानुमान कलिंगका पुत्र बापका बदला लेनेके लिये भीम पर चढाई कर आया किंतु भीमने उसको मुक्केसे ही मार डाला ! फिर जयत्सनके रथ पर चढ कर उसको उसीके रथमें एक झांपड मार कर ही खतम कर दिया । वैसे ही दुष्कर्णको मसल दिया । फिर बाल्हीकोंसे भीमका युद्ध हुवा । उसमें बाल्हीकके पुत्रको मूर्च्छित किया । किंतु बाल्हीकोंसे यह आहत भी हुवा और उससे जरा संभालते ही इसने दृढरथ, नागदत्त, विरजा, और सुहस्तका वध किया । तब स्वयं दुर्योधन इस पर आक्रमण करके पराजित होकर हठ गया । फिर कर्णसे युद्ध हुवा । इस युद्धमें दोनों पादचारी हुए । भीम तब नकुलके रथ पर चढा । युद्धका पंद्रहवा दिन । द्रोणाचार्य कहर बरपा रहे थे । तब कृष्णने भीमको कुछ संदेसा दिया । भीम इंद्रवर्माका हाथी अश्वत्थामाको गदासे मारकर द्रोणके आस पास जा कर "अश्वत्थामा मर गया !"-अश्वत्थामा मर गया !' ऐसे चीखते चिल्लाने उछलते लगा । यह सुनकर द्रोणने शस्त्र नीचे रखे और धृष्टद्युम्नने "यही समय" मानकर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । द्रोणाचार्यकी मृत्युसे अर्जुनको बडा दुःख हुवा । वह आत्महत्याका विचार भी करने लगा । भीमने तब उसको डांट फटकारकर परावृत्त किया । सोलवे दिन इसने क्षेमधूर्ति और उसके हाथीको मारा । फिर अश्वत्थामा और भीमका युद्ध हुवा । उसमें दोनों आहत हो गये और साथियोनें रथ पीछे हटाया । सत्रहवे दिन कौरव सेनाका भुर्ता बन गया । अपनी सेना तहस नहस होते देखकर दुर्योधन सेनाको प्रोत्साहित करते हुए स्वयं भीम पर चढाई कर गया किंतु पराजित हुवा । भीमने इसकी गजसेनाका विध्वंस कर डाला । फिर कर्ण इसपर चढाई कर आया । कर्ण भी पराजित हो कर रणभूमि छोडना चाहता था कि दुर्योधनने अपने भाइयोंको भीमपर चढाई करनेको ललकारा । एक साथ श्रुतश्रवा, दुर्धर, क्रोध, विवित्सु, विकट, सम, निसंगी, कवची, पाशी, नंद, उपनंद, दुष्प्र, धर्ष, सुबाहु, वातवेग, सुवर्चस, धनुर्ग्रह, शाल, और सह भीमपर चढाई कर आये । भीमने विवित्सु, विकट, सह, क्रोध, नंद, उपनंदका वध किया । इतनेमें कर्ण पुनः तैयार हो कर आया । तब भीमने एक बाणसे कर्णको आर पार छेद दिया और उसका रथ चूर चूर कर फेक दिया । फिर इसने दुर्योधनकी सेनाका संहार करना प्रारंभ कर दिया । तब शकुनी भीम पर चढाई कर आया । भीमने शकुनीको रथसे भूमि पर पटककर घसीट दिया और दुर्योधन उसको अपने रथ पर डाल कर ले गया । युद्ध चलही रहा था । भीमकी भीषणता क्षण क्षण बढती जा रही थी तब दुःशासन उस पर चढाई कर आया । भीमने उसके घोडे मारे, सारथी मारा, रथ तोड दिया, फिर उसको पकड कर भूमिपर पटक दिया । उसका दाहिना हाथ जिससे उसने द्रौपदीके बाल खींचे थे शरीरसे उखाड कर फेंक दिया । उसका हृदय फाड कर उसका खून पिया और खूनसे सने हाथोंको उछालता हुवा द्रौपदीकी वेणी बांधने चला गया । इसी समय भीमने अलंखु, कवचिन, खड्गिन्, दंडधार, धनुर्धर, निसंगी, वातवेगू, सुवार्चा आदि धृतराष्ट्र पुत्रोंका वध किया । अठारहवे दिन इसने कृतवर्मा और शल्यसे युद्ध किया । शल्यने इसको गदायुद्धमें मूर्च्छित किया । इस मूर्च्छांसे सचेत होते ही भीमने पुनः कौरव-सेनाका संहार-कार्य प्रारंभ कर दिया । इस युद्धमें भीमने कौरवोंकी गजसेनाके साथ ही साथ दुर्मर्षण, श्रुतांत, जैत्र, भूरिबल, रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विषह, दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष, तथा श्रुत- श्रवाका वध किया । इसके बाद सुदर्शनका वध किया । फिर प्रत्यक्ष दुर्योधन और भीमका अंतिम गदायुद्ध हुवा उसमें कृष्णकी सूचनासे भीमने दुर्योधनकी जांघ पर गदा-प्रहार करके उसका वध किया । इस पर बलरामने इसको अधर्म-युद्ध कहा और कृष्णने भीमकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिला ज्ञानेश्वरी १०

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