ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर उसका समाधान किया। अंतमें अश्वत्थामासे लडकर उसका मणि ले आया इस प्रकार भारत युद्धका अंत हुवा। महाभारतके बाद सिंहासनारोहणके समय युधिष्ठिरने भीमको युवराजाभिषेक किया। युद्धके बाद सभी पांडव धृतराष्ट्र और गांधारीसे प्रेमसे रहे किंतु भीम ही अकेला उनको जली कटी सुनाता रहा। अंतमें इसकी बातोंसे तंग आकर धृतराष्ट्र गांधारीके साथ वनमें गया। आगे अनेक वर्ष राज्य करनेके बाद पांडव शस्त्र-संन्यास करके उत्तर दिशामें स्वर्गारोहण करने गये। तब राहमें जब भीमका पतन हुवा भीमने युधिष्ठिरसे पूछा "मैं क्यों गिरा ?" युधिष्ठिरने कहा अपनेको बलवान मानता था। शक्तिका अभिमान करता था तथा तू बडा पेटू था इसलिये तेरा पतन हुवा। इस समय भीमकी एक सौ सात सालकी आयु थी। इसकी तीन पत्नियां थी। हिडिंबा, द्रौपदी, तीसरी काशीराजाकी कन्या जलंधरा। इनके हिडिंबासे घटोत्कच, द्रौपदीसे श्रुतसोम और जलंधरासे सर्वत्रात ऐसे तीन पुत्र थे। धृतराष्ट्रके सभी सौ पुत्रोंको इसीने मारा था। इसका शंख पौंड्र था। गीता अ० १. श्लो० ४-अर्जुन— कुंती पुत्र। तृतीय पांडव। यह फाल्गुन मासमें उत्तराफाल्गुनी सह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें पैदा हुवा था इसलिये इसको फाल्गुन भी कहते हैं। इसका जन्म हिमालयके शतशृंग पर्वत पर हुवा था। यह द्रोणाचार्यका पट्टशिष्य था। यह अत्यंत दक्ष था। एक दिन रातको जब यह भोजन करने बैठा था तब दीप बुझ गया। अंधारमें यह खाता रहा। अंधारमें जरा भी चूक होनेके पहले भोजन होनेसे यह सोचने लगा कि अभ्यासके बलसे जैसे अंधारमें भी न चूकते भोजन हुवा ऐसे अन्य बातें भी हो सकती हैं और इसने अंधारमें ही लक्ष्यवेधी अभ्यास किया। धनुर्विद्यामें यह अत्यंत कुशल था। एक बार द्रोणाचार्यने सबकी परीक्षा लेनेके लिये एक कृत्रिम पक्षी एक पेड पर बिठा कर पूछा "वहां क्या दीखता हे !" केवल अर्जुनने ही कहा था "केवल पक्षीकी गर्दन दीखती है!" इतना यह एकाग्र रहता था। एक बार अर्जुनने पांच बाण मार करके मगरके मुखसे द्रोणको मुक्त किया था। इसकी धनुर्विद्या कुशलता पर द्रोणने "ब्रह्मशिर" नामका उत्तम अस्त्र दिया था। एक बार परीक्षा समारोहमें अर्जुनने एकसा दीखने वाले पांच बाण छोडकर, हिलते सींगमें बीस बाण भर कर, अपना चातुर्य दिखाया था और सबसे प्रशस्ति पायी थी। शस्त्र-विद्या समाप्त होने पर गुरु दक्षिणाके रूपमें गुरु द्रोणने द्रुपदराजाको सजीव पकड लानेको कहा तब केवल अर्जुन ही यह काम कर सका, और किसीसे यह नहीं हुवा। अपनी छोटीसी आयुमें ही अर्जुनने सौवीराधिपति दत्तमित्रको जीत लिया था जिसे पांडु भी नहीं जीत सका था। विपुलको भी इसने जीता। पांडवोंका कीर्ति-सौरभ सर्वत्र फैलनेमें अर्जुनके पराक्रमका खूब ही हाथ रहा है। लाक्षागृहसे पार होनेके बाद राहमें अंगारपर्ण गंधर्व अपनी स्त्रियों सह जल-क्रीडा कर रहा था। उसने पांडवों को रोका इसी बात पर अर्जुन और अंगारपर्णका युद्ध हुवा। उसमें अर्जुन जीत गया। अल्पायुमें ही अर्जुनकी शस्त्र-कुशलता देख कर उसने अर्जुनको सूक्ष्मपदार्थ दर्शक चाक्षुषीविद्या सिखायी। साथ साथ अर्जुनसे अग्निशस्त्र-विद्या सीखली। इसीके कहनेसे पांडवोंने धौम्य ऋषिको पुरोहित बना लिया था। इस घटनाके बाद, अर्जुन द्रौपदी स्वयंवरमें द्रुपदराजाके घर गया। वहां पर द्रौपदी-स्वयंवरका प्रण जीत कर इसने द्रौपदीको जीत लिया। द्रौपदी स्वयंवरमें ११ परिशिष्ट १-