ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 958, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनेक क्षत्रिय राजा आये थे किंतु मत्स्य भेदकी बाजी जीतनेका साहस करनेवाला कोई विरला ही था। इस घटनाके बाद धृतराष्ट्रने विदुरको भेजकर पांडवोंको हस्तिनापुर बुल लिया। एक बार वहां एक ब्राह्मणकी यज्ञीय सामग्री चोरी गयी। वह अर्जुनके पास आकर रोने लगा। अर्जुन उस ब्राह्मणको आश्वस्त करके शस्त्र लानेके लिये शस्त्रागारमें गया। वहां युधिष्ठिर और द्रौपदी एकांतमें थे। इसलिये नियमानुसार अर्जुनको एक वर्ष तीर्थयात्राके लिये जाना पडा। तब युधिष्ठिरने कहा था "तू मुझसे छोटा है। छोटोंका बडोंके एकांतमें जाना दोष नहीं है। और तू स्वधर्म पालनके लिये गया था।" किंतु अर्जुनने युधिष्ठिरको समझा बुझाकर तीर्थयात्राके लिये उसकी आज्ञा ली। इस तीर्थाटनमें उसने कौरव नामक नागकी उलूपी नामक कन्यासे गांधर्व- विवाह किया। फिर वह उत्तरमें हिमालयकी और गया। वहांसे बिंदुतीर्थ, पूर्वकी ओर मुडकर उत्पालिनी नदी, अपरनंदा, महानदी, गया आदि तीर्थ-स्थानोंको देखकर अंग वंग कलिंगका भ्रमण कर मणिपुर गया। मणिपुरका राजा चित्रवाहन था। उसकी लडकी थी चित्रांगदा। अर्जुनने चित्रांगदाकी मंगनी की। राजाने लडकीका लडका ननिहाल ही रहेगा इस शर्तपर चित्रांगदाका पाणिग्रहण कर दिया। वह मणिपुरमें तीन वर्ष रहा। इस अवधिमें चित्रांगदाको अर्जुनसे एक लडका हुआ। उसका नाम बभ्रुवाहन। यहांसे वह गोकर्ण गया। यहांसे प्रभास क्षेत्रमें जानेके बाद इसने कृष्णकी सहायतासे उसकी बहन सुभद्राको भगा ले जानेका निश्चय किया। इसके लिये युधिष्ठिरकी सम्मति भी ली और रैवतक पर्वत पर जा कर देव-दर्शन करके घर लौटनेवाली सुभद्राको अपने रथमें चढाकर यह हस्तिनापुरकी ओर भागा। कृष्णने अर्जुनका समर्थन करके बलरामका क्रोध शांत किया। बलरामने अर्जुनको द्वारका बुला कर बडे वैभव और समारोहके साथ उससे सुभद्राका विवाह कर दिया। कभी श्वेतकी राजाने शतसंवत्सरादि यागमें सतत हवि डालनेसे अग्नीको मांद्य आया। वह ब्रह्माके पास गया। ब्रह्माने उसको खांडववन खानेको कहा। किंतु जब जब अग्नि खांडववन खाने जाता तब तब इन्द्र प्रचंड वर्षा करके अग्निको परास्त कर देता। अग्नि तब अर्जुनके पास जा कर खांडवनका दान मांगने लगा। अर्जुनने कहा "हममें युद्ध सामाग्रिकी न्यूनता है वह हमें दीजिये, मैं आपको खांडववन देता हूं"। अग्निने कपिध्वजयुक्त दिव्य रथ, जिसे चार श्वेत अश्व जुडे हुए थे, गांडीव धनुष्य, तथा अक्ष्यथ तूणीरके साथ युद्ध सामग्री दी और अर्जुनने खांडववन । अग्निने खांडववनका ग्रास लिया। इन्द्रने पर्जन्य वर्षा की। कृष्णार्जुनने इन्द्रकी एक भी नहीं चलने दी पंद्रह दिन तक अग्नि खांडववन चाटता रहा। तब उसका मांद्य गया। उसमेंसे केवल तक्षक पुत्र अश्वसेन, मायासुर, महर्षी मंदपालके चार पुत्र जरितारि, सारिसृक्त, द्रोण तथा स्तंभ मित्र और सांगंक पक्षी इतने बचकर निकले। अग्नीने ठीक तीन सप्ताह इस वनका आहार किया। दनुपुत्र मय खांडववनसे बाहर निकला और कृष्ण उसका संहार करेगा इतनेमें वह अर्जुनको शरण गया। अर्जुनने उसकी रक्षा की। तब अर्जुनसे कृतज्ञ मयासुरने राजसूय यज्ञमें मय-सभा बांध दी। इस मय-सभाके लिये आवश्यक सामान वृषपर्वाके भांडारमें था। मयने वहींसे इसको पाया। साथ ही साथ इसने उसी कोषागारसे गदा लाकर भीमको दी थी। अर्जुनको वरुणका देवदत्त नामका शंख इसीने इसी कोषागारसे दिया था। युधिष्ठिरने जब राजसूय यज्ञ किया था तब अर्जुनने अपने दिग्विजयमें प्रथम कुलिंद, आनर्त, कालकूट, तथा सुमंडल जीतकर सुमंडल राजाको साथ लेकर शाकलद्वीप, प्रतिविंध्य इन पर आक्रमण करके इन्हें जीत लिया। तब शाकलद्वीपके सभी राजाओंको इसने जीता था। इनके साथ अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १२