ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 959, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंAn exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
प्राग्ज्योतिष देशको जीत लिया । वहां भगदत्तसे अर्जुनका आठ दिन तक घोर युद्ध हुवा था । भगदत्त भौमासुरका पुत्र था । भगदत्त चीन किरात आदि देशोंका आश्रय-स्थान था । जब भगदत्तने हार मान कर, कर देना स्वीकार किया तब अर्जुनने कुबेरकी आलकावती पर आक्रमण किया । कुबरसे कर लिया । उसके बाद उलूक देशका राजा बृहंत, सेनाबिंदु, मोदापुर, सुदामन, उत्तर-उलुक आदि राजाओंसे करभार लेकर, सेनाबिंदुके देवप्रस्थ नगरमें जा कर वहांसे पौरव विश्वागश्वापर हमला करके उनको जीता । इसके बाद उत्सवसंकेत 'गणों' को जीता । काश्मीरको जीता तथा दस मांडलिकोंके साथ लोहितको जीता । फिर अभिसारी, उरगा नगरी, आदि जीतकर सिंहपूर नगर उध्वस्त किया । सुह्य, चोल आदिको जीतकर इसने बाह्लीक पर आक्रमण करके कांबोजको भी जीत लिया । इन सबमें ऋजिक देशमें भयंकर युद्ध हुवा । अंतमें अनेक देशोंको जीतकर, उन देशोंको मांडलिक बनाकर जब यह मानस-सरोवरकी ओर आगे बढा वहां इसने ऋजिकोंके बनाये हुए नेहर देख लिये । वहांसे यह गंधर्वोपर आक्रमण करके आगे बढा और वहांसे तित्तिरकल्भाष, मंडूक, नामके उत्तम अश्वोंको लेकर हरिवर्षकी ओर आगे बढा । वहाँ इसको ऋषियोंने रोका क्यों कि आगे सभी अदृश्य है । अर्जुन भी आगे न जाकर वहां तक सबसे युधिष्ठिरकी सत्ता मनवाकर इंद्रप्रस्थकी ओर लौट आया । युधिष्ठिरके राजसूयके बाद बढी हुई दुर्योधनकी ईर्ष्याग्निमें जब पांडवोंका सर्वस्व स्वाहा हुवा और कपट द्यूतमें सभी हारकर पांडव बनवास गये तब अर्जुन पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिके लिये इंद्रकीलपर्वत पर जाकर पशुपति नाथकी तपस्या करने लगा । उस समय शंकरने किरात रूपमें आकर अर्जुनकी परीक्षा ली । अर्जुन उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुवा और पशुपति-नाथने इसको विश्व-संहारक पाशुपतास्त्रका " रहस्य-पूर्ण ज्ञान " दिया जो पृथ्वी पर और कोई नहीं जानता था । इसके बाद अर्जुन इंद्रके आमंत्रण पर उसीके भेजे गये विमानसे इंद्रलोक गया । इंद्रने अर्जुनका सन्मान करके उसको अपने अर्धासन पर स्थान दिया । वहां पर भी अर्जुनने अनेक विद्याओंका अध्ययन किया । अर्जुन वहां करीब पांच वर्ष तक रहा । वहां वह वाद्यवादन तथा नृत्यकला सीखा । चित्ररथ गंधर्व जो पहले अंगारपर्ण नामसे विख्यात था यहां अर्जुनके काम आया । उसीने अर्जुनको गांधर्ववेद सिखाया । एक बार उर्वशीने अर्जुनसे प्रेम याचना की और अर्जुनने उसका अस्वीकार किया इस पर उर्वशीने उसको षंढ होनेका शाप दिया । पांडवोंके अज्ञातवासमें अर्जुनको इसका उपयोग हुवा जब वह बृहन्नलाके रूपमें विराट राजाके पास रहा । अर्जुनका यह देवलोक वास समाप्त होते होते अज्ञातवासका काल आया । तब इसीने द्रौपदीको कंधेपर लेकर विराट नगरी जानेका काम किया । अर्जुन अज्ञातवासमें बृहन्नला नामसे षंढ-वेषमें द्रौपदी की "परिचारिका थी" कह कर उत्तराको नृत्यकला सिखानेका काम करता था । आगे विराटादि सभी लोग जब दक्षिण गोग्रहणमें उलझे हुवे थे तब दुर्योधनादिने उत्तर गोग्रहण किया । राजधानीमें तब केवल भूमिंजय-उत्तरकुमार-था । बृहन्नला सारथ्य करेगी यह सुन कर यह युद्ध पर चला ! किंतु शत्रुको देखते ही भूमिंजय रथ परसे कूद कर भागने लगा । बृहन्नलाने उसको समझा बुझा कर स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया । शमी वृक्ष परसे अपने आयुध उतार कर उसको अपना वास्तविक परिचय दिया और कौरवोंसे अकेला—बिना सारथीके-युद्ध करके गायोंको छुडा ले आया । इस युद्धमें कर्ण था । अर्जुनके सामनेसे कर्ण जी लेकर भाग निकला । इसी समय कर्णके सामने उसका भाई मारा गया !! १५ परिशिष्ट १-