ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 960, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंविराटने तब पांडवोंका सम्मान किया। अर्जुनने उत्तराको अभिमन्युके लिये स्वीकार किया। भारत युद्धकी तैयारी होने लगी। कृष्णकी सहायता मांगनेके लिये दोनों ओरसे दुर्योधन और अर्जुन कृष्णके पास गये । कृष्ण तब सोये हुए थे। दुर्योधन उनके सिरहाने बैठा और अर्जुन पैरोंके पास । जब कृष्ण उठे तब कृष्णने दोनोंको देखा। अर्जुन दुर्योधनसे छोटा था इसलिये मांगनेका उसका अधिकार पहला था। कृष्णने यादवोंकी नारायणी सेना और स्वयं निःशस्त्र कृष्ण, ऐसे दो भागोंमें विभाजित करके पूछा किसको कौन चाहिए। अर्जुनने निःशस्त्र कृष्णकी मांग की और दुर्योधन तीन अक्षोहिणीकी विशाल नारायणी सेना प्राप्त करनेके उत्साहसे घर गया। भारत युद्धके प्रथम, अर्जुनको युद्धके अनिष्ट परिणामकी कल्पनासे विषाद हुआ। इस मोहमय विषादसे जब अर्जुन कर्तव्य विमुख होने लगा तब कृष्णने जो उपदेश दिया उसीको आज भगवद्गीता कहते हैं। भीष्मार्जुन युद्धसे ही महाभारत युद्धका श्रीगणेश हुआ। युद्धके तीसरे दिन ऐसा लगा कि भीष्म पांडवी सेनाका नामोनिशानही मिटा देंगे। तब कृष्णने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके हाथमें चक्र उठा लिया। उस समय अर्जुनने भी अपने युद्ध कौशल्यसे सबको चमत्कृत किया। इसी तीसरे दिनके अंतिम प्रहरमें अर्जुनने कौरवी सेनाकी धज्जियां उड़ा दीं। नौवे दिनमें सबसे प्रथम अर्जुन और द्रोणका युद्ध हुआ। भीष्मसे भी गहरी झड़प हो गयी। संध्या समय युद्ध शांत हुआ। भीष्म पितामहके सम्मुख किसीकी कुछ भी नहीं चलती थी। वे इच्छा मृत्युके स्वामी थे। तब कृष्णकी सलाहसे भीष्मसे ही उनकी मृत्युकी चर्चा की गयी। भीष्मने स्वयं अपनी पराजय अथवा मृत्युकी व्यवस्था कही और दसवे दिन शिखंडीको आगे करके अर्जुन भीष्मकी ओर बढा। शिखंडीका अभ्रद्र ध्वज, उसका वह स्त्री-सुलभ हावभावका पौरुष ! यह सब देखकर भीष्मने उस पर शस्त्र न उठानेके अपने नियमका पालन किया और अर्जुनने शिखंडीकी ढाल सामने करके कौरव-सैन्यकी धज्जियां उड़ायीं। उस दिन कौरव वीरोंने अर्जुनको रोकनेकी पराकाष्ठा की। अर्जुनने भीष्म पर शर-संधान करके उन पर हजारों तीर छोड़ कर, उनको गिरा दिया। हजारों बाणोंका शरीरमें घुस जानेसे भीष्म वीरोचित शरशैया पर पडे। तब उनका सिर लटकने लगा। भीष्मने सिरहाना मांगा। दुर्योधनादिने नरम नरम सिरहाने ला दिये किंतु अर्जुनने भूमिमें तीन बाण मारकर उस पर भीष्मका सिर टिका दिया। तब भीष्मने पानी मांगा। दुर्योधनादिक पीनेके लिये स्वर्ण-कलशमें शीतल सुगंध जल ले आये। भीष्मने वह अस्वीकार करके अर्जुनकी ओर देखा और अर्जुनने पृथ्वीमें बाण मारकर पृथ्वीके अंदर जो दिव्य जल था उसका झरना बहा दिया; भीष्म उस पानीसे तृप्त हुए। इसके बाद अर्जुनने 'मारेंगे या मरेंगे' इस प्रतिज्ञासे लड़ने आये हुए त्रिगर्तोंके सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु, तथा सत्यकर्माको युद्ध-भूमिमें परलोक दिखाया। वैसे ही प्रस्थलाधिपति सुशर्माको मारा। मयलोक, मद्रदेश आदिके सबीरोंको मारा। हाथी पर बैठकर लडनेवाले महा-पराक्रमी भगदत्तको मारा। मरते समय अभिमन्यूको जयद्रथने लाथ मारी थी, अभिमन्युको इसकी वेदना थी। इसलिये अर्जुनने सूर्यास्तके अंदर जयद्रथका सिर उड़ानेकी प्रतिज्ञा करके प्रतिज्ञाके अनुसार जयद्रथका सिर उड़ाया। भारत-युद्धमें दुर्योधन दुःशासन कर्ण आदि कई बार अर्जुनके सामनेसे भाग गये हैं। इसने अंबष्ट, श्रुतायुस् तथा अश्रुतायुस्का वध किया। अंतमें कर्णार्जुन युद्धका समय आया ही। अर्जुनने कर्णको मूर्च्छित किया। कर्णका सर्पास्त्र, बीचमें ही तोड डाला। जब युद्ध जोरों पर था, दोनों ओरसे घमासान चल रहा था तब कर्णका रथ-चक्र भूमिमें धंस गया। वह ऊपर उठाही नहीं। कर्ण जब उसे उठानेके लिये नीचे उतरा तब अर्जुनने ज्ञानेश्वरी १४