ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 961, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसका शिरच्छेद किया। दुर्योधनकी मृत्यु- बाद जब सब अपने शिबिरमें आये, अर्जुन रथसे नीचे उतरा, उसके बाद जैसे कृष्ण रथसे उतरे रथ जलकर भस्म हो गया। उसी दिन रातको अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके सबको जलाने लगा। तब अर्जुनने भी उसको रोकनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया किंतु इससे विश्वका अहित होता हुवा देखकर दोनोंने वह संवारण कर लिया। भारत महा-युद्धके बाद युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञमें अर्जुन ही अश्व-रक्षक था। अश्व-रक्षणमें उत्तरमें इसने छोटी मोटी अनेक लडाइयां लडी हैं। त्रिगर्तोंके राजा सूर्यवर्मा तथा उनका भाई केतुवर्माको इसने पराजित किया। भगदत्तके पुत्र यज्ञदत्तको पराजित किया। वहांसे सिंधुदेशमें गया। सिंधुदेश जयद्रथका देश, अर्जुनने महाभारतमें जयद्रथको मारा था। वहां अर्जुन पर गहरा प्रहार किया गया। तब अर्जुनके हाथसे गांडीव गिर पडा। उसको उठाकर अर्जुनने फिरसे युद्ध किया। अर्जुन आगे बढ़ रहा है यह सुनकर ही जयद्रथका लड़का सुरथ मर गया। तब दुर्योधनकी बहन-अर्जुनकी भी चचेरी बहनने-शरण आ कर अर्जुनको युद्ध-परावृत्त किया। वहांसे यह मणिपुरमें गया। वहां बभ्रुवाहन राज्य करता था। वह अनेक लोगोंको साथ लेकर इसका स्वागत करने आया। किंतु क्षत्रियोचित बर्ताव न करनेके कारण उसको अर्जुनने अपमानित किया। उलूपीने सवतके लड़केको युद्धके लिये भडकाया। बभ्रुवाहनने अर्जुनसे युद्ध किया। पितापुत्रमें घमसान मचा। बभ्रुवाहन अर्जुनको मूर्च्छित कर स्वयं मूर्च्छित हो गया। चित्रांगदाने युद्ध भूमी पर आ कर पति व पुत्रके लिये विलाप किया। सबने उलूपीको भला बुरा कहा। अंतमें उलूपीके प्रयाससे संजीवनी ला कर दोनोंको बचा लिया गया। अर्जुन वहांसे मगध आया। मगधमें जरासंधके पौत्र मेघसंधको जीतकर अर्जुन चेदी देशमें गया। शिशुपालके पुत्रने वहां अर्जुनका सत्कार किया। एकलव्यका लडका निषादराज शरभसे युद्ध करके उसको जीतकर दक्षिणमें आंध्र, रौद्र, महिषक आदि देशोंको जीतकर गोकर्ण, प्रभास, द्वारका, आदि होता हुवा गांधार गया। वहां शकुनि पुत्रसे घनघोर युद्ध हुवा। शकुनिकी पत्नीने-अपने पुत्रकी भी पतिकी-सी दुर्गत होगी इस विचारसे-आगे बढ़कर अपने पुत्रको युद्धसे परावृत्त किया। घोडा गांधारसे माघ पौर्णिमाके लगभग हस्तिनापुरकी ओर लौट पड़ा। चैत्र पूर्णिमाको अश्वमेध यज्ञ होनेवाला था। भारतवर्षके अनेक राजाओंको जीतकर अर्जुनने उनको यज्ञमें निमंत्रण दिया था। अर्जुनका यह दूसरा दिग्विजय है! अर्जुनने सभी अतिथि राजाओंका सम्मान किया। विशेष करके उसने बभ्रुवाहनका विशेष सम्मान किया। आश्वमेध यज्ञके कुछ ही काल बाद कृष्णका सारथि दारुकने हस्तिनापुर आकर सभी यादवोंका संहार होनेकी बात कही। यह सुनकर अर्जुनको सच नहीं लगा। फिर भी वह द्वारका गया। वहां जाकर देखा तो उसका हृदय विदीर्ण हुवा। कृष्णकी स्त्रियोंका वह हृदयभेदी विलाप। वसुदेवका क्रंदन, अर्जुन वसुदेव पैर पकडाकरके रोने लगा। वसुदेव भी “राम-कृष्ण गये और यह देख- नेक लिये मैं रहा” कहकर खूब रोये। वसुदेवने अब कृष्णकी द्वारका जल्दी समुद्रमें डूब जायगी तू इन सबको लेकर हस्तिनापुर जा” कहकर देह-त्याग किया। अर्जुनने वसुदेव, बलराम तथा कृष्णकी देहको अग्नि-संस्कार किया और स्त्री, रत्न-भूषणादि लेकर हस्तिनापुरके लिये चला। अकेला अर्जुन इतनी सब स्त्रियां तथा रत्नादि ले जाता है यह देखकर रास्तेपर पंचनद राज्यमें आभीने उस पर हमला किया। उस समय अर्जुन इतना खिन्न था कि उसको अस्त्रोंके मंत्र भी स्मरण नहीं होते थे। १५ परिशिष्ट १-