ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयु भी खूब हो चुकी थी। उसने तब धनुष्यकी उठाकर लाठीकी भाँति उसीसे शत्रुओंको मारना शुरू किया और जो कुछ बचा वह लेकर हस्तिनापुर आया। यदुवंशके जो कुछ अंकुर बचे थे उनकी कुछ व्यवस्था की। कृतवर्माके पुत्रको (?) मृत्तिकावतकी गद्दीपर बिठाया गया। अश्वपतिको खांडववनका राज्य दिया। अनिरुद्ध-पुत्र वज्रको इंद्रप्रस्थ दे दिया। इस भांति कुछ व्यवस्था करके अर्जुन उद्विग्न मनःस्थितिमें व्यासाश्रममें गया। व्याससे सारी बातें कहकर वहांसे हस्तिनापुर आया। इसके बाद यह युधिष्ठिरके साथ हिमालयकी ओर गया। हिमालय चढ़ते चढ़ते वह बीचमें ही गिरकर मर गया। तब भीमने युधिष्ठिरसे पूछा इसका पतन क्यों हुवा ? "मैं अकेला सभी शत्रुओंका नाश करूंगा ऐसे मामता था। किंतु यह ऐसे नहीं कर सका। वैसेही यह अन्य धनुर्धारि- योंका अपमान करता था। इसलिये इसका पतन हुवा।" द्रौपदीसे इसका एक पुत्र था श्रुतकीर्ति वह भारत युद्धमें मारा गया। सुभद्रासे एक पुत्र था अभिमन्यु, यह चक्रव्यूहमें मारा गया। चित्रांगदासे जो पुत्र था बभ्रुवाहन वह मणिपूरका राजा बना। उलूपि पुत्र इरावान् युद्धमें मारा गया। इरावान्ने भी भारत युद्धमें खूब पराक्रम किया है। इसने शकुनीके छ भाई मारे। अर्जुनका पौत्र अभिमान्युका पुत्र परीक्षित, हस्तिनापुराका राजा हुवा। मृत्युके समय अर्जुनकी आयु १०६ वर्ष थी। इसका धनुष्य गांडीव । ध्वज कपिध्वज । शंख देवदत्त । तुणीर अक्षय तुणीर । शक्ति पाशुपतास्त्र । गीता अ० १. श्लोक० ४- युयुधान- सोमवंशी वृष्णिकुलके सत्यकका लड़का। धनुर्विद्यामें अर्जुनका शिष्य। द्रौपदी स्वयंवरमें यह भी था। पांडवोंका कट्टा अभिमानी। जब पांडव वनवासमें थे तब इसने कृष्ण और बलभद्रसे कहा था "पांडवोंको वनवास पूरा करने दो। हम कौरवोंका वध करके अभिमन्युको सिंहासन पर बिठायें।" किंतु "दूसरोंका जीता हुवा राज्य पांडव स्वीकार नहीं करेंगे !" कहते हुए कृष्णने इसका अस्वीकार कर दिया। पांडव जब वनवाससे लौट आये, शिष्टाईका विचार होने लगा तब बलरामके इस विचार पर कि शिष्टाईमें जानेवाला "नम्र झुककर चलनेवाला हो।" युयुधानने उनका विरोध किया। पांडवोंकी न्याय मांगका समर्थन किया और सभामें यह भी सिद्ध कर दिया कि पांडव पक्ष ही न्यायका पक्ष है। द्रौपदीने इनके इस व्याख्यानका खूब स्वागत किया था। यह सदैव पांडवोंकी ओरसे कौरवोंसे युद्ध करनेमें उत्सुक रहता था। कृष्ण जब शिष्टाई करने चला तब यही कृष्णका सारथी था। संभवतः यह अतिरथी था। पांडव-पक्षके सात उपसेनापतियोंमें यह एक था। एकबार युद्धमें गांधारोंने इसका रथ टुकड़े टुकड़े कर दिया था। तब इसने अभिमन्युके रथ पर चढकर शकुनीकी सेनाको तहस नहस कर दिया। एकबार यह भीमके संरक्षणमें भीष्माचार्य पर भी टूट पड़ा था। भूरिश्रवाने इसके सभी पुत्र मारे थे। द्रोणाचार्यपर भी इसने एक बार आक्रमण किया था। एक बार द्रोणाचार्यके हाथसे धृष्टद्युम्नकी रक्षा की थी। लगातार इसने १०१ बार द्रोणाचार्यका धनुष्य तोडा था। तब द्रोणाचार्यने इसके युद्ध कौशलकी भूरि भूरि प्रशंसा की थी। जयद्रथ वधका दिवस था। उसी दिन युद्धभूमिमें अर्जुनको अपनी दृष्टिथमें न पाकर ज्ञानेश्वरी १९