भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 963

युधिष्ठिरको अर्जुनके विषयमें भयसा लगा और युधिष्ठिरने युयुधानसे अर्जुनकी रक्षाके लिये जानेको कहा तब युयुधानने कहा “मेरे यहांसे जाने पर आपके पास कोई नहीं रहेगा !” किंतु युधिष्ठिरकी आज्ञा पर यह अर्जुनके पास गया । इसने प्रथम राहमें कुशलता पूर्वक द्रोणको टाला, कृतवर्माका पराभव किया, आगे द्रोण और कृतवर्माका एक साथ पराभव किया ! यवनोंका पराभव किया । दुर्योधनको युद्धभूमिसे खदेड़ दिया । दुःशासनका पराभव किया । अलंबुष और जलसंघको मारा किंतु भूरिश्रवासे पराजित हुवा, भूरिश्रवाने इसको भूमि पर पटक कर घसीटा तब अर्जुनने भूरिश्रवाका हाथ तोड डाला ! इसके बाद युयुधानने भूरिश्रवाका वध किया । बचपनसे यह दुर्योधनका भी मित्र रहा है किंतु युद्धमें दुर्योधनसे वैसे ही घोर युद्ध भी किया है। जब धृष्टद्युम्नने असहाय अवस्थामें द्रोणाचार्यका वध किया तब इसने धृष्टद्युम्नकी भर्त्सना की थी । धृष्टद्युम्नसे लडाई होने तक प्रसंग आया था किंतु युधिष्ठिर और कृष्णके कहने पर टल गया । इसने कर्ण पुत्र प्रसेनका वध किया । भारत-युद्धमें बचे हुए कुछ वीरोंमें यह भी एक है । यादवी युद्धमें कृष्णकी निंदा किये हुए कृतवर्माका प्रतिज्ञा पूर्वक वध करके यह इतना क्रुद्ध हो गया कि जो सामने आया उसका वध करता हुवा आगे बढा । कृष्णने इसको शांत करनेका प्रयास किया किंतु अन्य यादव इस पर टूट पडे । इसकी रक्षा करनेमें प्रद्युम्न आगे आया और इसकी रक्षा करते करते वह भी मारा गया । यह भी मारा गया !! यह कृष्णार्जुनका परम प्रिय मित्र था, अनुयायी था । इसको सात्यकी भी कहा गया है । गीता अ० १. श्लो० ४-विराट- मत्स्य-देशका क्षत्रिय राजा । विराट इसकी राजधानी । इसकी दो पत्नियां थीं। प्रथम पत्नी सुरथा, उससे दो पुत्र श्वेत और शंख । दूसरी पत्नी सुदेष्णा । इसके भी दो संतान भूमिंजय अथवा उत्तरकुमार, कन्या उत्तरा । सुदेष्णा इसकी पट्टराणी । इसके ग्यारह भाई थे । ये सभी कुरु-पांडव युद्धमें पांडवोंकी ओरसे लडे हैं। शंख और उत्तर इन दो पुत्रोंके साथ यह द्रौपदी-स्वयंवरमें गया था । पांडवोंने अपना अज्ञातकाल इसीके घर बिताया था । अपने पास “कंक” इस नामसे रहनेवाले युधिष्ठिरको इसने द्यूतके गुट्टीसे मारा था । तब युधिष्ठिरकी नाकसे खून आया किंतु जब इसको मालूम हुवा कि कंक युधिष्ठिर था इसको अत्यंत पश्चात्ताप भी हुवा था । इस वर्ष भरमें पांडवोंने जो उपकार किये थे उससे यह इतना लीन हो गया था कि इसने अपनी पुत्री उत्तराको अभिमन्युको देकर विवाह किया । भारत युद्धमें यह स-परिवार-बंधु-पुत्रोंके साथ-पांडवोंकी ओरसे लडा था। जयद्रथ वधके दिवस रात्रि-युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया । भारत-युद्धमें इसका संपूर्ण वंश नष्ट हुवा । गीता अ० १. श्लो० ४-द्रुपद राजा- पृषत् राजाका पुत्र । पांचाल देशका राजा । इसको यज्ञसेन, पांचाल, और पार्षत भी कहा गया है । द्रोणाचार्यका पिता भारद्वाज इसका शस्त्र और शास्त्र गुरु । इसने अपना अध्ययन पूर्ण करके जब गुरु-दक्षिणा दी तब द्रोणाचार्य-अपने गुरु-बंधुसे-कहा था कि जब मैं राजा बनूंगा तब कभी तुम मेरे पास आओगे मैं तुम्हारी सहायता करूंगा । द्रुपद राजा हुवा । द्रोणाचार्यको आर्थिक सहायताकी आवश्यकता पडी । द्रोणाचार्य द्रुपदके पास गये । द्रुपदने आर्थिक सहायता नहीं दी इतना ही नहीं द्रोणाचार्यका अपमान किया । १० परिशिष्ट १

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 963, कुल 1172 में से · BharatKosha