भारतकोश
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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

उसका शिरच्छेद किया। दुर्योधनकी मृत्यु- बाद जब सब अपने शिबिरमें आये, अर्जुन रथसे नीचे उतरा, उसके बाद जैसे कृष्ण रथसे उतरे रथ जलकर भस्म हो गया। उसी दिन रातको अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके सबको जलाने लगा। तब अर्जुनने भी उसको रोकनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया किंतु इससे विश्वका अहित होता हुवा देखकर दोनोंने वह संवारण कर लिया। भारत महा-युद्धके बाद युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञमें अर्जुन ही अश्व-रक्षक था। अश्व-रक्षणमें उत्तरमें इसने छोटी मोटी अनेक लडाइयां लडी हैं। त्रिगर्तोंके राजा सूर्यवर्मा तथा उनका भाई केतुवर्माको इसने पराजित किया। भगदत्तके पुत्र यज्ञदत्तको पराजित किया। वहांसे सिंधुदेशमें गया। सिंधुदेश जयद्रथका देश, अर्जुनने महाभारतमें जयद्रथको मारा था। वहां अर्जुन पर गहरा प्रहार किया गया। तब अर्जुनके हाथसे गांडीव गिर पडा। उसको उठाकर अर्जुनने फिरसे युद्ध किया। अर्जुन आगे बढ़ रहा है यह सुनकर ही जयद्रथका लड़का सुरथ मर गया। तब दुर्योधनकी बहन-अर्जुनकी भी चचेरी बहनने-शरण आ कर अर्जुनको युद्ध-परावृत्त किया। वहांसे यह मणिपुरमें गया। वहां बभ्रुवाहन राज्य करता था। वह अनेक लोगोंको साथ लेकर इसका स्वागत करने आया। किंतु क्षत्रियोचित बर्ताव न करनेके कारण उसको अर्जुनने अपमानित किया। उलूपीने सवतके लड़केको युद्धके लिये भडकाया। बभ्रुवाहनने अर्जुनसे युद्ध किया। पितापुत्रमें घमसान मचा। बभ्रुवाहन अर्जुनको मूर्च्छित कर स्वयं मूर्च्छित हो गया। चित्रांगदाने युद्ध भूमी पर आ कर पति व पुत्रके लिये विलाप किया। सबने उलूपीको भला बुरा कहा। अंतमें उलूपीके प्रयाससे संजीवनी ला कर दोनोंको बचा लिया गया। अर्जुन वहांसे मगध आया। मगधमें जरासंधके पौत्र मेघसंधको जीतकर अर्जुन चेदी देशमें गया। शिशुपालके पुत्रने वहां अर्जुनका सत्कार किया। एकलव्यका लडका निषादराज शरभसे युद्ध करके उसको जीतकर दक्षिणमें आंध्र, रौद्र, महिषक आदि देशोंको जीतकर गोकर्ण, प्रभास, द्वारका, आदि होता हुवा गांधार गया। वहां शकुनि पुत्रसे घनघोर युद्ध हुवा। शकुनिकी पत्नीने-अपने पुत्रकी भी पतिकी-सी दुर्गत होगी इस विचारसे-आगे बढ़कर अपने पुत्रको युद्धसे परावृत्त किया। घोडा गांधारसे माघ पौर्णिमाके लगभग हस्तिनापुरकी ओर लौट पड़ा। चैत्र पूर्णिमाको अश्वमेध यज्ञ होनेवाला था। भारतवर्षके अनेक राजाओंको जीतकर अर्जुनने उनको यज्ञमें निमंत्रण दिया था। अर्जुनका यह दूसरा दिग्विजय है! अर्जुनने सभी अतिथि राजाओंका सम्मान किया। विशेष करके उसने बभ्रुवाहनका विशेष सम्मान किया। आश्वमेध यज्ञके कुछ ही काल बाद कृष्णका सारथि दारुकने हस्तिनापुर आकर सभी यादवोंका संहार होनेकी बात कही। यह सुनकर अर्जुनको सच नहीं लगा। फिर भी वह द्वारका गया। वहां जाकर देखा तो उसका हृदय विदीर्ण हुवा। कृष्णकी स्त्रियोंका वह हृदयभेदी विलाप। वसुदेवका क्रंदन, अर्जुन वसुदेव पैर पकडाकरके रोने लगा। वसुदेव भी “राम-कृष्ण गये और यह देख- नेक लिये मैं रहा” कहकर खूब रोये। वसुदेवने अब कृष्णकी द्वारका जल्दी समुद्रमें डूब जायगी तू इन सबको लेकर हस्तिनापुर जा” कहकर देह-त्याग किया। अर्जुनने वसुदेव, बलराम तथा कृष्णकी देहको अग्नि-संस्कार किया और स्त्री, रत्न-भूषणादि लेकर हस्तिनापुरके लिये चला। अकेला अर्जुन इतनी सब स्त्रियां तथा रत्नादि ले जाता है यह देखकर रास्तेपर पंचनद राज्यमें आभीने उस पर हमला किया। उस समय अर्जुन इतना खिन्न था कि उसको अस्त्रोंके मंत्र भी स्मरण नहीं होते थे। १५ परिशिष्ट १-

आयु भी खूब हो चुकी थी। उसने तब धनुष्यकी उठाकर लाठीकी भाँति उसीसे शत्रुओंको मारना शुरू किया और जो कुछ बचा वह लेकर हस्तिनापुर आया। यदुवंशके जो कुछ अंकुर बचे थे उनकी कुछ व्यवस्था की। कृतवर्माके पुत्रको (?) मृत्तिकावतकी गद्दीपर बिठाया गया। अश्वपतिको खांडववनका राज्य दिया। अनिरुद्ध-पुत्र वज्रको इंद्रप्रस्थ दे दिया। इस भांति कुछ व्यवस्था करके अर्जुन उद्विग्न मनःस्थितिमें व्यासाश्रममें गया। व्याससे सारी बातें कहकर वहांसे हस्तिनापुर आया। इसके बाद यह युधिष्ठिरके साथ हिमालयकी ओर गया। हिमालय चढ़ते चढ़ते वह बीचमें ही गिरकर मर गया। तब भीमने युधिष्ठिरसे पूछा इसका पतन क्यों हुवा ? "मैं अकेला सभी शत्रुओंका नाश करूंगा ऐसे मामता था। किंतु यह ऐसे नहीं कर सका। वैसेही यह अन्य धनुर्धारि- योंका अपमान करता था। इसलिये इसका पतन हुवा।" द्रौपदीसे इसका एक पुत्र था श्रुतकीर्ति वह भारत युद्धमें मारा गया। सुभद्रासे एक पुत्र था अभिमन्यु, यह चक्रव्यूहमें मारा गया। चित्रांगदासे जो पुत्र था बभ्रुवाहन वह मणिपूरका राजा बना। उलूपि पुत्र इरावान् युद्धमें मारा गया। इरावान्ने भी भारत युद्धमें खूब पराक्रम किया है। इसने शकुनीके छ भाई मारे। अर्जुनका पौत्र अभिमान्युका पुत्र परीक्षित, हस्तिनापुराका राजा हुवा। मृत्युके समय अर्जुनकी आयु १०६ वर्ष थी। इसका धनुष्य गांडीव । ध्वज कपिध्वज । शंख देवदत्त । तुणीर अक्षय तुणीर । शक्ति पाशुपतास्त्र । गीता अ० १. श्लोक० ४- युयुधान- सोमवंशी वृष्णिकुलके सत्यकका लड़का। धनुर्विद्यामें अर्जुनका शिष्य। द्रौपदी स्वयंवरमें यह भी था। पांडवोंका कट्टा अभिमानी। जब पांडव वनवासमें थे तब इसने कृष्ण और बलभद्रसे कहा था "पांडवोंको वनवास पूरा करने दो। हम कौरवोंका वध करके अभिमन्युको सिंहासन पर बिठायें।" किंतु "दूसरोंका जीता हुवा राज्य पांडव स्वीकार नहीं करेंगे !" कहते हुए कृष्णने इसका अस्वीकार कर दिया। पांडव जब वनवाससे लौट आये, शिष्टाईका विचार होने लगा तब बलरामके इस विचार पर कि शिष्टाईमें जानेवाला "नम्र झुककर चलनेवाला हो।" युयुधानने उनका विरोध किया। पांडवोंकी न्याय मांगका समर्थन किया और सभामें यह भी सिद्ध कर दिया कि पांडव पक्ष ही न्यायका पक्ष है। द्रौपदीने इनके इस व्याख्यानका खूब स्वागत किया था। यह सदैव पांडवोंकी ओरसे कौरवोंसे युद्ध करनेमें उत्सुक रहता था। कृष्ण जब शिष्टाई करने चला तब यही कृष्णका सारथी था। संभवतः यह अतिरथी था। पांडव-पक्षके सात उपसेनापतियोंमें यह एक था। एकबार युद्धमें गांधारोंने इसका रथ टुकड़े टुकड़े कर दिया था। तब इसने अभिमन्युके रथ पर चढकर शकुनीकी सेनाको तहस नहस कर दिया। एकबार यह भीमके संरक्षणमें भीष्माचार्य पर भी टूट पड़ा था। भूरिश्रवाने इसके सभी पुत्र मारे थे। द्रोणाचार्यपर भी इसने एक बार आक्रमण किया था। एक बार द्रोणाचार्यके हाथसे धृष्टद्युम्नकी रक्षा की थी। लगातार इसने १०१ बार द्रोणाचार्यका धनुष्य तोडा था। तब द्रोणाचार्यने इसके युद्ध कौशलकी भूरि भूरि प्रशंसा की थी। जयद्रथ वधका दिवस था। उसी दिन युद्धभूमिमें अर्जुनको अपनी दृष्टिथमें न पाकर ज्ञानेश्वरी १९

युधिष्ठिरको अर्जुनके विषयमें भयसा लगा और युधिष्ठिरने युयुधानसे अर्जुनकी रक्षाके लिये जानेको कहा तब युयुधानने कहा “मेरे यहांसे जाने पर आपके पास कोई नहीं रहेगा !” किंतु युधिष्ठिरकी आज्ञा पर यह अर्जुनके पास गया । इसने प्रथम राहमें कुशलता पूर्वक द्रोणको टाला, कृतवर्माका पराभव किया, आगे द्रोण और कृतवर्माका एक साथ पराभव किया ! यवनोंका पराभव किया । दुर्योधनको युद्धभूमिसे खदेड़ दिया । दुःशासनका पराभव किया । अलंबुष और जलसंघको मारा किंतु भूरिश्रवासे पराजित हुवा, भूरिश्रवाने इसको भूमि पर पटक कर घसीटा तब अर्जुनने भूरिश्रवाका हाथ तोड डाला ! इसके बाद युयुधानने भूरिश्रवाका वध किया । बचपनसे यह दुर्योधनका भी मित्र रहा है किंतु युद्धमें दुर्योधनसे वैसे ही घोर युद्ध भी किया है। जब धृष्टद्युम्नने असहाय अवस्थामें द्रोणाचार्यका वध किया तब इसने धृष्टद्युम्नकी भर्त्सना की थी । धृष्टद्युम्नसे लडाई होने तक प्रसंग आया था किंतु युधिष्ठिर और कृष्णके कहने पर टल गया । इसने कर्ण पुत्र प्रसेनका वध किया । भारत-युद्धमें बचे हुए कुछ वीरोंमें यह भी एक है । यादवी युद्धमें कृष्णकी निंदा किये हुए कृतवर्माका प्रतिज्ञा पूर्वक वध करके यह इतना क्रुद्ध हो गया कि जो सामने आया उसका वध करता हुवा आगे बढा । कृष्णने इसको शांत करनेका प्रयास किया किंतु अन्य यादव इस पर टूट पडे । इसकी रक्षा करनेमें प्रद्युम्न आगे आया और इसकी रक्षा करते करते वह भी मारा गया । यह भी मारा गया !! यह कृष्णार्जुनका परम प्रिय मित्र था, अनुयायी था । इसको सात्यकी भी कहा गया है । गीता अ० १. श्लो० ४-विराट- मत्स्य-देशका क्षत्रिय राजा । विराट इसकी राजधानी । इसकी दो पत्नियां थीं। प्रथम पत्नी सुरथा, उससे दो पुत्र श्वेत और शंख । दूसरी पत्नी सुदेष्णा । इसके भी दो संतान भूमिंजय अथवा उत्तरकुमार, कन्या उत्तरा । सुदेष्णा इसकी पट्टराणी । इसके ग्यारह भाई थे । ये सभी कुरु-पांडव युद्धमें पांडवोंकी ओरसे लडे हैं। शंख और उत्तर इन दो पुत्रोंके साथ यह द्रौपदी-स्वयंवरमें गया था । पांडवोंने अपना अज्ञातकाल इसीके घर बिताया था । अपने पास “कंक” इस नामसे रहनेवाले युधिष्ठिरको इसने द्यूतके गुट्टीसे मारा था । तब युधिष्ठिरकी नाकसे खून आया किंतु जब इसको मालूम हुवा कि कंक युधिष्ठिर था इसको अत्यंत पश्चात्ताप भी हुवा था । इस वर्ष भरमें पांडवोंने जो उपकार किये थे उससे यह इतना लीन हो गया था कि इसने अपनी पुत्री उत्तराको अभिमन्युको देकर विवाह किया । भारत युद्धमें यह स-परिवार-बंधु-पुत्रोंके साथ-पांडवोंकी ओरसे लडा था। जयद्रथ वधके दिवस रात्रि-युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया । भारत-युद्धमें इसका संपूर्ण वंश नष्ट हुवा । गीता अ० १. श्लो० ४-द्रुपद राजा- पृषत् राजाका पुत्र । पांचाल देशका राजा । इसको यज्ञसेन, पांचाल, और पार्षत भी कहा गया है । द्रोणाचार्यका पिता भारद्वाज इसका शस्त्र और शास्त्र गुरु । इसने अपना अध्ययन पूर्ण करके जब गुरु-दक्षिणा दी तब द्रोणाचार्य-अपने गुरु-बंधुसे-कहा था कि जब मैं राजा बनूंगा तब कभी तुम मेरे पास आओगे मैं तुम्हारी सहायता करूंगा । द्रुपद राजा हुवा । द्रोणाचार्यको आर्थिक सहायताकी आवश्यकता पडी । द्रोणाचार्य द्रुपदके पास गये । द्रुपदने आर्थिक सहायता नहीं दी इतना ही नहीं द्रोणाचार्यका अपमान किया । १० परिशिष्ट १

परिणाम स्वरूप द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे इसका बदला लिया। इनका आधा राज छीन लिया गया। इससे क्रुद्ध होकर द्रुपद द्रोणके नाशका विचार करने लगा। इसी विचारसे वह पागलसा घूमने लगा। तब अभिचार विद्या-संपन्न, लोभी, अपयाज ब्राह्मणके ऋत्विजत्वमें "द्रोण-शत्रु" पुत्र प्राप्तिके लिये यज्ञ किया। इसी यज्ञके परिणाम स्वरूप धृष्टद्युम्न और द्रौपदीका जन्म हुआ। द्रौपदी जब विवाह-योग्य बनी उसका स्वयंवर किया गया। इस स्वयंवरमें जो जो क्षत्रिय राजा आये थे उनको पांडवोंकी वेषभूषा देख कर ऐसा भ्रम हुवा कि द्रुपदराजने हम सबको अपमानित करके द्रौपदीको ब्राह्मण-कुमारको दे कर विवाहित किया है। इससे युद्धका प्रसंग भी आया। इस समय पांडवोंने अपने शौर्यसे सबका निवारण किया। आगे जब अपने पुरोहितसे पांडव क्षत्रिय होनेका ज्ञात हुवा, इसने बडे ही उत्साह और आनंदसे पांडवोंसे द्रौपदीका विवाह कर दिया। पांडवोंका वनवास और अज्ञातवास समाप्त होनेके बाद द्रुपदराजाने शिष्टाईके लिये अपने पुरोहितको धृतराष्ट्रके पास भेजा था। किंतु संधानका सभी प्रयास विफल होकर जब युद्ध अनिवार्य हुवा तब यह पांडवोंकी ओरसे लडनेके लिये आ गया। यह भी, अपने पुत्र और बंधुजनके साथ युद्धमें आया था। युद्धमें भी इसने खूब ही पराक्रम किया। यह भी जयद्रथ-वधके दिनके रातके युद्धमें, मार्गशीर्ष बद्य एकादशीको, अंतिम प्रहरमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया। द्रुपदको द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नके साथ शिखंडी, सुमित्र, प्रियदर्शन, चित्रकेतु, सुकेतु, ध्वजकेतु, धीरकेतु, सुरथ और शत्रुंजय ऐसे पुत्र थे। ये सब युद्धमें मारे गये। और यह वंश संपूर्ण रूपसे नष्ट हो गया। गीता अ० १. श्लो० ५-धृष्टकेतु- चेदिराजा, शिशुपालका लड़का। यह अत्यंत पराक्रमी था। इसके लड़के भी बडे शूर थे। बहुत ही कम लोग युद्ध भूमिमें इससे लड़नेका साहस कर सकते थे। भारत युद्धमें इसने अत्यंत योग्यताके साथ अर्जुनके चक्र-रक्षकका काम किया। यह अपने रथमें कांबोज-देशके घोडे बांधता था। एक बार जब यह द्रोण पर आक्रमण करके आगे बढ़ रहा था वीरधन्वाने इसे रोककर इसका धनुष्य तोड डाला, तब इसने अपना शक्रायुध इतने जोरसे वीरधन्वापर फेंक दिया कि उसके आघातसे वीरधन्वाका रथ चूर चूर हो गया और वीरधन्वा युद्ध-भूमिपर पटक दिया गया। इसके बाद यह अत्यंत वेगके साथ द्रोण पर आक्रमण करके आगे बढ़ा और द्रोणने इसको तत्काल मार गिराया। इसकी एक कन्या रेणुमति नकुलकी पत्नी थी। वीतिहोत्र इसका पुत्र था। गीता अ० १. श्लो० ५-चेकितान- वृष्णिवंशका क्षत्रिय राजा । दुर्योधनने इसका वध किया था। द्रौपदी स्वयंवरमें यह भी गया था। गीता अ० १. श्लो० ५-पुरुजित- कुंतिभोज राजाका पुत्र । कुंतीका भाई । पांडवोंका मामा। इसके रथके घोडे इंद्रधनुष्यके रंगके होते थे। युद्धमें द्रोणाचार्यसे यह मारा गया था। ज्ञानेश्वरी १८

गीता अ० १. श्लो० ५-कुंतिभोज— प्रथम यह निपुत्रिक था । इसलिये वसुदेवके पिता शूरसेनने अपनी कन्या पृथा-जो कुंती नामसे प्रसिद्ध है-इसको दत्तक दी। यह शूरसेनकी बूभाका लडका था। आगे इसका पुरुजित् नामका पुत्र हुआ। इस पुरुजितके अलावा इसके और दस पुत्र भी हुए थे। ये भी सब कुरु-युद्धमें लडने आये थे और इन सबको अश्वत्थामाने मारा। इसका द्रोणाचार्यसे जो युद्ध हुआ उस युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया। और यह वंश भी कुरु-युद्धमें समाप्त हुआ।

गीता अ० १. श्लो० ६-युधामन्यु— पांचाल । महारथी । महाधनुर्धर । धनुर्विद्या और गदायुद्धमें प्रवीण । कुरु-युद्धमें इसने द्रोण, दुर्योधन आदिसे युद्ध किया है। कुरु-युद्धमें लडकर जो कुछ थोडेसे वीर अंत तक बचे रहे इसमें यह भी एक था। युद्धके अंतिम दिन रातको नींदमें अश्वत्थामाके द्वेषाग्निमें जो आहुति हुए उनमें यह भी एक है। इस समय भी इसने अश्वत्थामा पर सोये सोये ही गदा-प्रहार किया किंतु इसके उठनेके पहले ही अश्वत्थामाने इसका वध किया। कुरुयुद्धमें यह अत्यंत वीरतासे लडा था।

गीता अ० १. श्लो० ६-उत्तमौजा— पांचाल देशीय राजपुत्र । यह भी कुरु युद्धके अंतिम दिनको रातके हत्याकांडमें अश्वत्थामासे मारा गया।

गीता अ० १. श्लो० ६-सौभद्र— अभिमन्यु । अर्जुनका पुत्र । माताका नाम सुभद्रा। जन्मके समय ही यह अत्यंत निर्भय और क्रोधी-सा लगता था । इसीलिये इसे अभिमन्यु कहा गया । यह अर्जुनके नेतृत्वमें धनुर्विद्या सीखा। इसकी शस्त्र-रचना और अस्त्र-कौशल्यसे प्रसन्न होकर बलरामने इसको रौद्र नामका धनुष्य दिया था। अपने पराक्रमके बलपर यह अत्यंत अल्पायुमें ही महारथी कहलाया। कुरु-युद्धमें द्रोणाचार्यने अत्यंत कुशलतासे अर्जुनको दूसरे युद्धमें उलझा कर मुख्य-युद्धमें चक्र- व्यूहकी रचना की । पांडवसेनामें अर्जुनके बिना चक्रव्यूहका भेदन करनेवाला महारथी दूसरा कोई नहीं था। तब अभिमन्युने भीमकी सहायतासे चक्रव्यूहका भेदन करनेका निश्चय किया। इसको चक्रव्यूहमें कैसे घुसना चाहिये इसकी जानकारी थी किंतु व्यूह भेदन करके कैसे बाहर आना चाहिये इसकी जानकारी नहीं थी। यह धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञा और आशीर्वाद लेकर युद्ध-भूमिमें उतरा। द्रोणाचार्य स्वयं व्यूहकी रक्षा कर रहे थे। फिर भी अभिमन्यु व्यूह तोड कर अंदर घुस गया। व्यूहमें घुसते ही इसने अपने शौर्यसे बडे बडे महारथियोंको भी मैदान छोड़नेके लिये बाध्य किया। सारी सेना पीछे हटने लगी। यह देखकर स्वयं द्रोणाचार्य इस पर चढ आये । अभिमन्युने कुशलता-पूर्वक उनको टालकर अश्मक राजाका वध किया । शल्यके भाईको मारा । इस पर चढ़ाई करके आये हुए कर्णको जर्जर करके युद्ध भूमि छोड़नेके लिये बाध्य किया ।

१५ परिशिष्ट १

· इस युद्धमें अभिमन्युका रक्षक भीम इससे दूर फेंका गया । अभिमन्युको अकेला देख कर दुःशासनने इसपर हमला किया । दुःशासनको युद्ध-भूमिसे भगाकर यह कौरव-सेनाका संहार करते करते इतना दूर निकल गया कि यद्यपि इसने भीमके लिये रास्ता खुला रखा था भीम इसके पास नहीं आ सका । अभिमन्युको अकेला देखकर दुर्योधनका पुत्र लक्ष्मणने इस पर आक्रमण किया किंतु यह अभिमन्युसे मारा गया । कर्ण पुत्र आक्रमण करके भाग गया । साथ साथ अन्य अनेक वीरोंको इसने स्वर्गकी राह दिखाई । यह देखकर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, बृहद्रथ, बृहद्वल ये सात महारथी एक साथ इससे लड़ने लगे । यह अकेला ही इन सबका निवारण करने लगा । सबने मिलकर अत्यंत कठिनाईसे इसको विरथ किया । तब अभिमन्यु ढाल और तलवार लेकर लड़ने लगा । द्रोणने वह भी तोड़ दिया । तब इसने गदा हाथमें उठाई । दुःशासनके पुत्रसे इसने गदायुद्ध प्रारंभ किया । यह अत्यंत थका हुवा था । भीम इससे दूर था । वहां जयद्रथने भीमको रोक रखा था । अभिमन्यू अकेला सात महारथियोंसे लड़ रहा था । दुःशासन पुत्रके गदा प्रहारसे वह मूर्च्छित हो गया । इस मूर्च्छासे सावध होनेके पहले ही दुःशासनके पुत्रने इस पर और एक गदा प्रहार किया जिससे अभिमन्यु मर गया । विराट कन्या उत्तरा इसकी पत्नी थी । जब अभिमन्युकी मृत्यु हुई तब उत्तरा गर्भवती थी । इसका पुत्र परीक्षित ही कुरु-युद्धमें समाप्त कुरु-कुलका एक मात्र संतान रहा, इसीने कुरु-कुलका प्रतिनिधि बनकर आगे राज्य किया । गीता अ० १. श्लो. ६ द्रौपदेय— (१) युधिष्ठिरसे प्रतिविंध्य, (२) भीमसे सुतसोम, (३) अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, (४) नकुलसे शतानीक (५) सहदेवसे श्रुतसेन । प्रतिविंध्य— भारत युद्धके अंतिम दिन युद्ध समाप्तिके बाद शिबिरमें निद्रित अवस्थामें अश्वत्थामासे मारा गया । सुतसोम— कोई जानकारी नहीं मिली । श्रुतकीर्ति— युद्धमें शल्यसे इसका पराभव हुवा था । इसको भी अश्वत्थामाने नींदमें मारा था । शतानीक— अश्वत्थामासे अंतिम दिन रातको मारा गया । श्रुतसेन— इसने कांबोज राजा सुदक्षिणसे युद्ध किया था । यह भी अश्वत्थामासे नींदमें मारा गया । गीता अ० १. श्लोक० ८ भीष्माचार्य— पिताका नाम शांतनु । माता गंगा । इनका शास्त्र-गुरु वसिष्ठ । बृहस्पति और शुक्रने इन्हे नीतिशास्त्र सिखाया था । परशुरामसे धनुर्वेद, राज-धर्म और अर्थ-शास्त्र सीखे । गंगा-पुत्र होनेसे इन्हे गांगेय भी कहा गया है । आमरण ब्रह्मचर्य और राज्याधिकार त्याग करनेकी घोर प्रतिज्ञा करनेके कारण ये भीष्म या भीष्माचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए किंतु वैसे इनका नाम देवव्रत था । एकके बाद एक तीर छोड़ कर ये गंगा प्रवाह रोक देते थे । जन्मके बाद ये इतना अधिक गुरुकुलमें रहे कि बाप भी इनको भूल गया था !! प्रथमावस्थामें गंगाने ही ज्ञानेश्वरी ३०

इनका पालन किया था। जब ये हस्तिनापुर आये और इनको युवराज्याभिषेक हुवा तब ये ३६ वर्षके थे। जब देवव्रत राज्य कार्य कर रहे थे तब शांतनु सत्यवती नामकी एक शूद्र कन्यासे मोहित हो गया। शांतनुने सत्यवतीके पितासे मंगनी की किंतु "सत्यवतीके पुत्रोंको राज्य नहीं मिलेगा" इस कारणसे उसने शांतनुकी मांग अस्वीकार कर दी। देवव्रतको जब यह ज्ञात हुवा तब इन्होंने पिताके सुखके लिये राज्याधिकार त्यागने तथा सत्यवतीके पुत्रोंके वंशमें ही राज्य रहे इसलिये आभरण ब्रह्मचर्यसे रहनेकी भी भीषण प्रतिज्ञा की। तबसे देवव्रत भीष्म इस नामसे प्रसिद्ध हुए। देवव्रतकी इस प्रतिज्ञासे सत्यवतीका शांतनुसे विवाह होकर उससे चित्रांगद और विचि- त्रवीर्य ऐसे दो पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगदको गद्दी पर बिठाकर भीष्म राज्य करने लगे। शांतनुकी मृत्युके बाद तुरंत उग्रायुधने भीष्मको संदेशा भेजकर विमाता सत्यवतीकी मंगनी की। भीष्मने इससे क्रुद्ध होकर तुरंत सेना सिद्ध करनेकी आज्ञा दी। किंतु पिताकी मृत्यु-दिनोंमें युद्ध प्रारंभ नहीं कर सकते, उग्रायुध अपनी मांग नहीं छोड़ता तब भीष्मने तीन दिन तक अथक युद्ध करके उसका वध किया। इसके बाद चित्रांगद किसी गंधर्वसे लड़ते समय मारा गया। भीष्मने विचित्रवीर्यको गद्दी पर बिठाया। विचित्रवीर्य भीष्मके नेतृत्वमें राज्य-कार्य चलाता था। कुछ काल बाद काशीराजाने अपनी तीन कन्याओंके स्वयंवरकी घोषणा की। भीष्म उस स्वयंवरमें गये और वहां जो राजा उपस्थित थे उन सबको आह्वान देकर तीनों राजकुमारियोंको उठाकर ले आये। हस्तिनापुरमें आकर भीष्मने इन तीनों लड़कियोंका विचित्रवीर्यसे विवाह करनेका निश्चय किया, तब जेष्ठ कन्या अंबाने कहा "मनसे मैंने शाल्वका वरण किया है।" यह सुनकर भीष्मने उसकी इच्छानुसार सब व्यवस्था कर दी किंतु शाल्वने उसका अस्वीकार कर दिया। इस पर वह तप करने लगी और भीष्मने अंबाकी अन्य दो बहने अंबिका और अंबालिकाका विचित्रवीर्यसे विवाह कर दिया। अंबा जहां तपस्या कर रही थी वहां उसको अपने वृद्ध नानाका दर्शन हुवा। नानाने नाती- की राम कहानी सुनकर परशुरामको शरण जानेको कहा और अंबा परशुरामको शरण जाकर भीष्म वधकी प्रार्थना करने लगी। परशुरामने केवल ब्राह्मण-कार्यार्थ ही शस्त्र लेनेका निर्णय करनेके कारण अन्य उपायसे अंबाका कार्य करनेका निश्चय करके गुरुके नाते भीष्मसे अंबाका स्वीकार करनेको कहा किंतु भीष्मने जिसने मनसे दूसरेका वरण किया है, उसके विषयमें भाईसे बात करनेसे अस्वीकार कर दिया। परशुरामने तब भीष्मको युद्धका आवाहन दिया। भीष्मने परशुरामको बहुतेरा समझाया किंतु व्यर्थ। अंतमें भीष्म और परशुरामका द्वंद्व युद्ध हुवा। चार दिन तक यह युद्ध हुवा और अन्तमें परशुराम पराजित हुए। प्रस्वाप अस्त्रके कारण परशुरामका पराजय हुवा। वह अस्त्र भीष्मके अलावा और कोइ नहीं जानता था। फिर अंबा भीष्मके नाशके लिये तप करने लगी। तब महादेवने तेरे ही हाथसे भीष्मका वध होगा ऐसा वर दिया और अंबाने शरीर त्याग दिया। यहां विचित्रवीर्यको क्षय हुवा। सत्यवतीने भीष्मसे विवाहकी प्रार्थना की। भीष्मने प्रतिज्ञा- भंग अस्वीकार कर दिया। तब व्याससे अंबिका अंबालिकामें संतानोंत्पादन कराया गया। उसमें धृतराष्ट्र अंधा था इसलिये पांडुको गद्दीपर बिठाकर भीष्म राज्य देखने लगे। कौरव पांडवोंमें वितुष आकर पांडवोंको बनवास, अज्ञातवास, करना पड़ा। उनके वनवासके बाद द्रुपदराजाने अपने पुरोहितको संधानके लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा। उस समय भीष्मने पांडवोंके अधिकारको स्वीकार ३१ परिशिष्ट १

करके दुर्योधनको पांडवोंसे सख्य करनेको कहा। इसका कोई उपयोग नहीं हुआ। कौरव पांडव युद्ध अनिवार्य हुआ। भीष्मको तब कौरव-सेनाका सेनापति बनना पडा। सेनापतिका पद स्वीकार करते समय भीष्माचार्यने कहा था "मैं पांडवसेनाका नाश करूंगा किंतु पांडवोंमेंसे किसीका वध नहीं करूंगा ! जब मैं सेनापति रहूंगा तब कर्ण युद्धभूमि पर नहीं लडेगा !!" इतने शर्तके साथ भीष्माचार्यने सेनापति पद स्वीकार किया; उसके प्रथम भीष्माचार्यने दुर्योधनको अपनी शक्ति, अशक्ति तथा युद्धनीतिका संपूर्ण परिचय दिया था। इस समय उन्होंने कहा था "एक महीनेमें मैं शत्रुसेनाको छिन्न विछिन्न कर दूंगा !" अठारह दिनके युद्धमें दस दिन तक वे ही लडते रहे। उसके बादके आठ दिनोंमें तीन सेनापति बने । कृष्णने प्रतिज्ञा की थी "युद्धमें मैं हथियार नहीं उठाऊंगा।" भीष्माचार्यने तब कहा "मैं कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य करूंगा !" युद्धके तीसरे ही दिन भीष्माचार्यने कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य किया ! भीष्माचार्यने अर्जुनको हतबल करके मूच्छित किया । यह देख कर क्रुद्ध कृष्ण रथ-चक्र उठाकर जब भीष्माचार्य पर चढ दौडे तब भीष्माचार्य अपने हाथके शस्त्र नीचे रख कर "प्रत्यक्ष परमात्मा ही मेरा वध करेगा !" कहकर हाथ जोड कर स्तवन करने लगे। इसी प्रकार नौवे दिन भी हुआ !! नौवे दिन दुर्योधनके कटु-वाक्योंसे तंग आकर भीष्माचार्यने कहा "कलके युद्धमें मैं या पांडव दोनोंमेंसे एक रहेंगे !" "मैं निष्पांडव पृथ्वी करूंगा !" यह प्रतिज्ञा सुनकर पांडव घबरा उठे; वे कृष्णको साथ लेकर भीष्माचार्यके वधका उपाय पूछनेके लिये भीष्माचार्यके पास गये । युधिष्ठिरने भीष्मकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिलाकर उनके वधका उपाय पूछा । भीष्माचार्यने भी अत्यंत प्रेमसे पांडवोंका अदरातिथ्य करके कहा "मैं उससे नहीं लडूंगा जिसका रथ-कलश रथ-ध्वज अमंगल होगा, मैं किसी हीन व्यक्तिसे नहीं लडूंगा, अथवा मैं स्त्रीसे नहीं लडूंगा। तुम्हारी सेनामें द्रुपद्-पुत्र जो शिखंडी है, वह जन्मतः स्त्री था, आगे चलकर पुरुष बना ! इसलिये शिखंडीका ढालसा उपयोग करके अर्जुन मुझे मार सकता है ! तब मैं असहाय बनूंगा। तुम मेरा वध करके विजयी बनोगे !" दूसरे दिन, अर्थात् युद्धके दसवे दिन अर्जुनने शिखंडीको आगे रख कर भीष्मसे लडना प्रारंभ किया । भीष्माचार्यका शरीर बाणोंसे छिदसा गया। यह मार्गशीर्ष वद्य सप्तमीका दिन था । उस दिन फाल्गुनी नक्षत्र था । संध्याका समय था, अर्जुनके बाणोंसे भिदकर भीष्माचार्यका शरीर रथसे बाहर जा पड़ा ! वह रथके नीचे शर शैया पर पडा। उनका सिर लटकने लगा । सिरके पास तीन बाण मार करके अर्जुनने सिर उन बाणों पर टिका दिया। तब भीष्मने कहा मुझे बडी प्यास लगी है और अर्जुनने अपने बाणसे पृथ्वी भेद कर गंगा प्रवाह उनके मुखमें पडे ऐसा किया । भीष्माचार्य इससे अत्यंत संतुष्ट हुए । उन्होंने कहा "भीष्म-वधसे कौरव पांडवोंका वैर शांत हो !" किंतु दुर्योधन नहीं माना । उसके बाद, वहां दूसरा कोई नहीं था तब कर्ण भीष्माचार्यका दर्शन करने आया । तब दोनों मुक्त हृदयसे मिले। भीष्माचार्यने कर्णसे कहा "कौरव-पांडवोंका सख्य हो ऐसा कर ! अथवा पांडवोंकी ओरसे लड़ !!" किंतु उसका अस्वीकार करके कर्णने लड़नेकी आज्ञा मांगी ! भीष्मने कर्णको वैसी आज्ञा दी। युद्ध समाप्तिके बाद युधिष्ठिर कुलक्षय देख कर जब अत्यंत दुःखित हो गया था तब भीष्माचार्यका शरीर अत्यंत निःसत्व हुआ था। फिर भी, युधि- ष्ठिरका मन स्वस्थ हो इसलिये भीष्माचार्यने उसको धर्मोपदेश दिया। उसके बाद माघ शुद्ध ज्ञानेश्वरी २२

अष्टमीके दिन उत्तरायणमें भीष्मने शरीर-त्याग किया। भीष्माचार्य इच्छा-मरणी थे। तभी वे अपना शरीर ऐसे टिका सके। भीष्मके ध्वज पर तालवृक्षका चिह्न रहता था। मृत्युके समय भीष्मकी आयु १८६ वर्षकी थी। गीता अ० १. श्लो० ८-कर्ण- कुंतिभोज राजाने जब पृथाको गोद लिया उसको अतिथि सत्कारका काम सौंप दिया था। पृथाने अर्थात् कुंतीने यह काम अत्यंत दक्षतासे किया। एक बार दुर्वासा ऋषि जब कुंतिभोजका अतिथि बने तब कुंतीकी सेवा शुश्रूषासे अत्यंत संतुष्ट होकर कालांतरसे कुंती पर आनेवाले संकटका विचार कर उसे दुर्वासा-ऋषिने एक वशीकरण मंत्र दिया और कहा "इस मंत्रसे तू जिसे बुलायेगी वह देवता आकर तुझे पुत्र देगा !" दुर्वासा ऋषी गये । आगे कुंतीको मंत्र शक्तिकी प्रतीति देखनेकी जिज्ञासा हुई। उसने विधिवत् मंत्रका जाप करके सूर्यको बुलाया और प्रत्यक्ष सूर्यको सम्मुख पाकर चकित हो गयी। सूर्यसे कुंतीको कवच-कुंडलयुक्त पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वही कर्ण है। कुंतीने लोक-लज्जाके भयसे कर्णको एक पेटीमें डाल करके अश्व-नदीमें छोडा दिया। यह पेटि बहते बहते यमुना नदीमें आयी और धृतराष्ट्रका सारथी अधिरथने देखी। वह पेटिका लेकर अधिरथ घर आया और उसने वह अपनी पत्नी राधाको दी। यह बालक देखते ही राधाका वात्सल्य फूट पडा। उसके स्तन आर्द्र हो गये। उसने कर्णको छातीसे लगा लिया। इस प्रकार कर्ण राधाकी गोदमें बढकर राधेय कहलाया। किंतु इसकी तेजस्विता देखकर स्वयं राधाने इसको वसुषेण कहा था। द्रोणाचार्य इसका शस्त्र-गुरु है। कृष्णने इसको वेद शास्त्रज्ञ कहा है। जब कर्ण और दुर्योधनका परिचय हुवा तब कौरव-पांडव विरोधका बीज पड चुका था। दुर्योधनने " यह अर्जुनको भी भारी जायेगा !" ऐसा मानकर इससे मैत्री की। यद्यपि कर्णने द्रोणसे शस्त्राभ्यास किया द्रोणने इसको ब्रह्मास्त्र नहीं सिखाया। इसी एक कारणसे अर्जुन इससे श्रेष्ठ था। स्वभावसे यह उद्धत और अपनी बडाई कहनेवाला था। कई बार इसने द्रोणसे ब्रह्मास्त्र सिखानेको कहा किंतु द्रोणाचार्यने टाल दिया। मन ही मन यह अर्जुनसे द्वेष करता था, अर्जुनसे बढ कर वीर होनेकी अभिलाषा करता था इसलिये यह ब्रह्मास्त्र प्राप्तिके लिये परशुरामके पास गया। परशुराम क्षत्रियोंको विद्या-दान नहीं करते थे केवल ब्राह्मणोंको ही धनुर्विद्या सिखाते थे । इसलिये कर्णने परशुरामसे असत्य कहा। गुरु-वंचनासे ही इसकी ब्रह्मास्त्र-साधना प्रारंभ हुई। परशुरामने इसको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। कर्ण परशुरामके पास रहने लगा। परशुरामने इसे सप्रयोग ब्रह्मास्त्र सिखाया। एक दिन व्रतोपवाससे श्रांत परशुराम कर्णकी गोदमें सिर रख कर सो गया। उसी समय किसी कृमिने कर्णकी जांघ काट खाई। "गुरुदेव जग जायेंगे !" इस विचारसे कर्ण सारी वेदनाको सहते हुए स्थिर आसनसे बैठे रहे किंतु कर्णके बहनेवाले रक्तसे परशुराम जग गये। इस घटनासे परशुरामको कर्णके ब्राह्मण होनेमें संदेह हुवा। परशुरामने कर्णसे प्रश्न किया और कर्णने सभी सच्ची बात कह सुनाई। परशुराम इससे संतुष्ट तो हुए किंतु गुरुसे असत्य कहनेके उपलक्ष्यमें संमान योद्धासे युद्ध करते समय तथा वध होते समय इस अस्त्रकी स्फूर्ति न होनेका शाप मिला। ३३ परिशिष्ट १-

साथ ही साथ परशुरामने कर्णको आश्रम छोड़ कर जानेकी आज्ञा दी और जाते जाते "कोई भी क्षत्रिय तुझ जैसा योद्धा नहीं होगा !" ऐसा आशीर्वाद भी दिया । एक बार इसने मल्ल-युद्धमें जरासंधकी हड्डी-पसली ढीली कर दी थी ! इससे खुश होकर जरासंधने इसे मालिनी नगर देकर इससे स्नेह किया था। साथ साथ इनके हाथसे एक ब्राह्मणकी गायका बछडा मारा जानेसे ब्राह्मणने जीवन मरणके युद्धमें पृथ्वी तेरा रथचक्र निगलेगी !!" ऐसा शाप दिया। एक बार धृतराष्ट्रने कौरव-पांडवोंका शस्त्रास्त्र कौशल्य देखनेके लिये रंगभूमि तैयार की । उस समय कर्णने उद्धततासे केवल द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको ही प्रणाम किया । उस प्रणाममें भी नम्रता नहीं थी। वैसे ही, सभी जब, अर्जुनका अस्त्र-कौशल्य देख प्रसन्न होकर उसका गुणवर्णन करने लगे तब कर्णने "मैं उससे भी अधिक कौशल्य दिखला सकता हूं" कहते हुए अर्जुनको द्वंद्व-युद्धके लिये ललकारा ! तब सब लोग आश्चर्य विमूढ होकर कर्णकी ओर देखने लगे। यह ध्यानमें रखना आवश्यक है कि इस समय अर्जुन ब्रह्मास्त्रकी सप्रयोग-प्रक्रिया जानता था और कर्ण उससे पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ था । किंतु सुदैवसे ( कर्णके ?) कर्णके जन्मके विषयमें तब कोई कुछ नहीं जानते थे । तथा कर्णने अपने पालक पिता अधिरथको देख कर प्रणाम किया था, इसलिये सभी इसको सूतपुत्र तथा राधेय कहने लगे और द्वंद्वयुद्ध टल गया । किंतु कौरव पांडव वैरके साथ बढ़नेवाला कर्ण-पांडव वैर देख कर, कुंती मन ही मन रोती रही ! दुर्योधनने कर्णको अंग-देशका राजा बना दिया था । "इस उपकारके लिये मैं क्या दूं तुम्हे ?" कर्णने पूछा और दुर्योधनने कहा "चिर मैत्री !" जिसे कर्णने अंतिम क्षण तक निभाया । यह अकृत्रिम मित्रता सहज रूपसे बढ़ती ही गयी। कर्णने अनेक सूत-पुत्रियोंसे विवाह किया । द्रौपदी स्वयंवरमें भी यह गया था । जब यह मत्स्यभेदके लिये आगे बढा द्रौपदीके "मैं सूत-पुत्रका वरण नहीं करूंगी" कहनेसे पीछे हठ कर बैठ गया । पांडव-वनवासके दिनोंमें कौरव जिस घोष-यात्रामें गये थे उसमें कर्ण था। इस यात्रामें कौरव और चित्रसेन गंधर्वका युद्ध हुवा । इस युद्धमें कर्णने प्रथम चित्रसेनका पराभव किया था किंतु चित्रसेनकी सेना अकेले कर्ण पर टूट पडी ! कर्णका रथ तोड दिया। तब इसे विकर्णके रथ पर बैठ कर भाग जाना पडा और चित्रसेनने दुर्योधनको बंदी बना लिया। अर्जुनने जब दुर्योधनको चित्रसेनसे छुडाया तब लज्जित दुर्योधन प्रायोपवेशन करके मरनेकी बात करने लगा । ऐसी स्थितिमें कर्णने कहा था "द्यूतमें तुमने अर्जुनको जीता है। अर्जुन तुम्हारा दास है। अपने स्वामीके लिये लडना सेवकका स्वाभाविक धर्म है। तुम्हारे लिये इसमें दुःखकी क्या बात है ?" वैसे ही अज्ञातवासके उत्तर गोग्रहणमें भी कर्ण दुर्योधनके साथ था । दुर्योधनके साथ तब कर्ण, संसप्तक, सुशर्मा आदि थे इस युद्धमें भी कर्ण अर्जुनसे पराजित होकर भाग गया था । इस युद्धमें कर्णके सामने अर्जुनने उसका प्रिय बंधु शत्रुंतपका वध किया था। जब कभी कर्ण और अर्जुन आमने सामने आये हैं कर्ण पर अर्जुनकी विजय हुई है। कभी कर्ण अर्जुनका पराभव नहीं कर पाया । यद्यपि वह अपनेको अर्जुनसे श्रेष्ठ धनुर्धारी कहता रहा है । इसी बातको एक बार भीष्माचार्यने कहा था । अर्जुनने चित्ररथ गंधर्वसे दुर्योधनकी रक्षा की तब भीष्माचार्यने दुर्योधनको इसका महत्त्व समझाकर पांडवोंसे सख्य करनेको कहा था। तब दुर्योधन हंसा और कर्ण अपना पराक्रम दिखानेके लिये दिग्विजय करनेके लिये निकला । अंगराज ज्ञानेश्वरी ३४

कर्ण तब एक प्रसिद्ध धनुर्धारी था। महारथी था। उसने सर्व प्रथम पांचाल पर आक्रमण करके द्रुपदराज और उनके अन्य अनुयायियोंसे कर ले लिया। फिर वह उत्तरकी ओर मुडा। उसने भगदत्तको जीता, हिम-पर्वतके राज्योंको जीता, फिर पूर्वकी ओर मुडा। नेपाल, वंग, कलिङ्ग, शुंडिक, मिथिला, मागध, कर्कखंड, भावद्गीर, अहिक्षत्र, वरसभूमि, मृत्तिकावती, मोहननगरी, कोसलनगरी, आदि जीतकर उन राजाओंसे कर ले लिया और दक्षिणकी ओर मुडा। दक्षिणमें कुंडिनपुरके रुक्मीको जीता, रुक्मी इसका मित्र बनकर दिग्विजयमें इसका साथी बन गया। इसके बाद, पांड्य, शैल, केरल, नील प्रदेशके राजाओंको जीता, इसके बाद चेदिराजाको जीता, पार्थ और अवंती राजाको जीता और पश्चिमकी ओर मुडा। पश्चिममें इसने यवन और बर्बर लोगोंको जीता। म्लेंच्छ, अरण्यवासी मद्र, रोहितक, आग्नेय, मालव आदि लोगोंका पराजय करके इसने अपना दिग्विजय पूर्ण किया। इससे, दुर्योधन आदि कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि कर्ण पांडवोंको जीत सकेगा। कलिंगाधिपति चित्रांगदने जब अपनी कन्याका स्वयंवर रचा और दुर्योधन उस कन्याको उठा ले आया तब कर्णने ही दुर्योधनको चित्रांगदसे बचाया था। दुर्योधनकी कृपासे कर्ण अंगराज बना। अंगराज्य उस समयके भारतके १८ विभागोंमें एक विभाग था। अंगराज कर्ण, अत्यंत उदार प्रवृत्तिका राजा था। कोई भी ब्राह्मण कर्णके पास आकर रिक्तहस्त नहीं लौट सकता था। वह इच्छा दानी था। सदैव अपना सर्वस्व देनेको तैयार राहाता था। कर्णकी इसी उदारताका लाभ लेकर इंद्रने उसके स्वाभाविक कवच कुंडल शरीरसे तराश लिये। यह कवच कुंडल अमृतसे बने थे। स्वाभाविक रूपसे शरीरसे चिपके हुए थे। इसी कवचके कारण कर्ण आजेय्य था। इसी लिये अर्जुनके हितमें इंद्रने ब्राह्मण रूपसे कर्णके कवच कुंडल दानमें मांग लिये और कर्णने भी “यह कवच कुंडल शरीरसे छीलकर निकालने होगे। ऐसे करनेसे मेरा शरीर विद्रूप न हो” यह वर लेकर वे छोल दिये। सूर्यने ऐसे न करनेको कहा था किंतु कर्णने “आयुष्यसे कीर्ति महान् है !” कहते हुए सूर्यकी बातको अस्वीकार कर दिया। स्वयं कर्ण जब शांत भावसे अपना कवच-कुंडल छीलने लगा तब यह देख कर इंद्र चकित रह गया। इंद्रने कर्णके कवच कुंडल लेकर इसके उपलक्षमें उसको वासवी शक्ति दी जिस पर यह फेंकी जाय उसका वध हो सके। कर्णने ये कवच कुंडल अपना शरीर छील कर दिये इसलिये कर्णको वैकर्तन भी कहते हैं। कृष्ण जब शिष्टाईके लिये दुर्योधनके पास गया था तब कृष्णने कर्णको उसका जन्म रहस्य कह कर “पांडव-पक्ष ग्रहण करनेसे तू सम्राट बनेगा और पांडव तेरी सेवा करेंगे!” ऐसे कहा था। “इससे होनेवाला कुल-क्षय भी रुकेगा!” यह भी कहा था किंतु कर्णने कृष्णसे “तू कहता है यह मुझे मान्य है। मैं तेरी बात पर विश्वास करता हूं। कुंती मेरी मां है, पांडव भाई हैं किंतु राधाने मुझे अकृत्रिम स्नेह दिया है। अधिरथने उदार आश्रय दिया है। अनेक सूत-कन्याओंने मुझसे विवाह करके प्रेम दिया है। दुर्योधनको मैंने आजीवन मैत्रीका आश्वासन दिया है! यह सब छोड़कर मैं नहीं आ सकता !” यह कहते हुए उसे लौटा दिया। ये ही बातें उसने कुंतीसे कही थीं। कुंतीको इसने “अर्जुनके अलावा मैं और किसी पांडवका वध नहीं करूंगा” ऐसे वचन भी दिया था। भारत युद्धमें कर्णने यह वचन निभाया। भारत-युद्धमें भीष्म और द्रोणाचार्यके बाद कर्ण सेनापति हुवा। जब यह सेनापति बनाया गया तो सर्व प्रथम भीष्माचार्यके पास गया जो शर-शय्या पर पडे थे। भीष्मको प्रणाम करके इसने (३) २५ परिशिष्ट १.

सेनापतिके रूपमें लड़नेकी आज्ञा मांगी। तब भीष्मने भी इसे उसका जन्म-वृत्त कह कर युद्ध रोकनेकी सलाह दी थी। किंतु कर्णने इसके प्रथम जब जब भीष्माचार्यकी अवहेलना की थी उन सबके लिये क्षमायाचना करते हुए भी यह बात माननेसे अस्वीकार कर दिया और कर्ण युद्ध-भूमि पर आया। कर्ण जैसे अद्वितीय धनुर्धरको वैसे ही सारथीकी आवश्यकता थी। उन दिनोंमें कृष्ण और शल्य ये दो ही महान सारथी थे। उसमें कृष्ण तो अर्जुनका सारथी था। शल्य मद्र देशका राजा था। क्षत्रिय था। महारथी था। वह कर्णका सारथ्य क्यों करें ? और कर्णका जन्म भी संदिग्ध था तब !! किंतु दुर्योधनने शल्यसे प्रार्थना की। शल्यने इसको अपना अपमान मान कर भी मित्र प्रेमके लिये "मैं जो उचित समझूंगा उससे कहूंगा !" इस शर्त पर सारथ्य किया और सारथ्य करते समय अर्जुनके शौर्यकी बखान करके कर्णका तेजोवध करने लगा। कर्णने इसको भी सहन करके उसको यथायोग्य उत्तर दे कर चुप किया। फिर शल्य भी कर्णको प्रोत्साहित करने लगा। इस युद्धमें अर्जुनने इसके पुत्र वृषसेनको मारा। तब इसे बडा दुःख हुआ। और वह अत्यंत आवेशमें आकर लड़ने लगा। उसको परशुरामका शाप स्मरण हो आया। अस्त्रोंकी विस्मृति होने लगी। ब्रह्मास्त्र का प्रयोग ही भूल गया। और इंद्रकी दी हुई वासवी शक्ति ! कर्णने वह अर्जुनके लिये संभालकर रखी थी किंतु जब द्रोणाचार्य सेनापति थे, जयद्रथ वध हुवा और रात्रीके समय भी युद्ध होने लगा, उस युद्धमें घटोत्कचने त्राहि मचा दिया। कौरव सेनाको उसने घासकी भांति काटा। वीरोंको वह पिस्सू खटमलोंकी भांति मसलने लगा। दुर्योधनको लगा भारत युद्ध सूर्यो- दयके पहले ही समाप्त हो जायेगा। कर्णके पास जा कर दुर्योधनने कहा "घटोत्कचपर वासवी शक्तिका प्रयोग करो !" कर्णने कहा "वह अर्जुनके लिये है !" दुर्योधन नहीं माना। अंतमें वह शक्ति उसको अपनी इच्छाके विरुद्ध घटोत्कच पर छोड़नी पडी !! अब बार बार प्रयत्न करने पर भी ब्रह्मास्त्र-प्रयोगका स्मरण ही नहीं होता और अरे ! उसका रथचक्र पृथ्वीने निगला ! वह रथपरसे उतरा। रथचक्र उठानेके लिये उसने "कुछ क्षण युद्ध रोकनेको" कहा किंतु कृष्णने उसके सारे कुकर्म उसको सुना कर पूछा "तब तुम्हारी धर्म-बुद्धि कहां गयी थी ?" और अर्जुनको कर्णपर आक्रमण करनेको कहा। ऐसी हालतमें कर्ण मारा गया। इस युद्धमें कर्णके ङ पुत्र मारे गये। इनमें से वृषसेन और सुदामाको अर्जुनने मारा। सत्यसेन, चित्रसेन, और सुशर्माको नकुलने मारा और सुषेणको भीमने। वैसे ही कर्णके छ भाई भी मारे गये। इनमेंसे शत्रुंजय, शत्रुंतप, तथा द्विपाटको अर्जुनने मारा। एकको अभिमन्यूने मारा। द्रुम और शूकरथको भीमने मारा। गीता अ० १. श्लो० ८-कृपाचार्य— उत्तर पांचालके राजकुलके गौतम नामक मुनिका पोता। गौतमको शरद्वान नामक एक लड़का था। वह महान् तपस्वी था। उसका तपो-भंग करनेके लिये इंद्रने एक अप्सरा भेज दी; उस समय इनको एक पुत्र और पुत्री हुई। ये दोनों संतान वनमें बढे। आगे उसी वनमें शिकार खेलनेके लिये जब शांतनु आया तब शांतनुने इन बालकोंको देख कर इन्हें घर ले गया। शांतनुकी कृपासे इनका पालन पोषण हुआ। इसलिये इन्हें कृप और कृपी कहा गया। यह कृपी आगे द्रोणाचार्यकी पत्नी हुई। ज्ञानेश्वरी ३६

जब शांतनु इन बालकोंको अपने पास ले गया तब गौतमको इसकी जानकारी हुई। शांतनुको गौतमने कृप-कृपीका जन्म-वृत्तांत सुनाया और उन्हें योग्य शिक्षा दी। कृपाचार्य चार प्रकारके धनुर्वेद तथा अन्य शास्त्रमें पारंगत-आचार्य हो गये। धृतराष्ट्रने अपने सभी लडकोंको विद्याध्ययनके लिये कृपाचार्यके पास ही रखा था। सभी कौरव द्रोणाचार्यके पहले कृपाचार्यके विद्यार्थी थे। भारतीय युद्धमें यह कौरवोंकी ओरसे लडे थे। सदैव ये पांडवोंकी स्तुति और कर्णकी निंदा करते थे। ऐसे ही एक बार कर्णने इन्हें कहा था "हे दुर्मते! फिर यदि तू ऐसा भाषण करेगा तो तेरी जीभ ही काटकर फेंक दूंगा!" कृपाचार्यने भारतीय युद्धमें महान पराक्रम किया है। पांडव पक्षके कई वीर इनके हाथसे मारे गये हैं। किंतु जयद्रथके वधके बाद जब ये अश्वत्थामाके साथ अर्जुन पर चढ दौडे तब अर्जुनके बाणोंसे जर्जर हो गये। इन्होंने धृष्टद्युम्नको अपने बाणोंसे जर्जर किया था। दुर्योधनका पतन हो कर जब भारतीय युद्ध समाप्त हुवा तब अश्वत्थामा अत्यंत अस्वस्थ हो गया था। अश्वत्थामाने निश्शस्त्र पांडव और पांडव-पुत्रोंके वधकी अपनी योजना कृपाचार्यको सुनायी तब कृपाचार्यने कहा था "उद्योग क्षीण होनेके बाद दैव कुछ नहीं कर सकता। किसी भी मनुष्यको अपना उद्योग प्रारंभ करते समय अपने बुजुर्गोंसे सलाह करनी चाहिये। इसलिये हम यह कार्य करनेसे पहले धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर आदिकी राय लें!" इन्होंने विवाह नहीं किया। कौरवोंकी मृत्युके बाद इन्होंने धृतराष्ट्र और गांधारीको सांत्वन दिया था। फिर ये घोडेपर बैठ कर अज्ञात स्थान चले गये। गीता अ० १. श्लो० ८-अश्वत्थामा- पिताका नाम द्रोणाचार्य, माताका नाम गौतमी कृपी। इनका यह इकलौता पुत्र। जन्मके साथ यह उच्चैःश्रवा घोडेकी भांति हिनहिनाया इसलिये इसे अश्वत्थामा कहा गया। यह अत्यंत तेजस्वी तथा क्रोधी था। अश्वत्थामाने कौरव-पांडवोंके साथ द्रोणाचार्यसे अस्त्र-विद्या सीखी। भारत-युद्धके अंतमें जब सभी सेनापति पडे, भीम-दुर्योधनके युद्धमें दुर्योधन पड़ा तब मृत्यु समयमें दुर्योधनने अश्वत्थामाको सेनापति बनाया। तब अश्वत्थामाने पांडवोंका नाश करनेकी प्रतिज्ञा की। इसी एकने पांडवोंकी एक अक्षोहिणी सेना मारी है! अनेक बार यह भीमार्जुनसे लड़कर पराजित हुवा है। पांडवोंको अश्वत्थामा प्रिय था और अश्वत्थामाको पांडव! इतना होने पर भी, भारत- युद्धमें दुर्योधनकी कटूक्तियोंसे तंग आकर इसने द्रोण-पुत्रको शोभा दे ऐसा पराक्रम किया। भारत युद्धमें द्रोणाचार्यका वध हुवा। कौरव सेनामें तहलका मच गया। सारी सेना अस्त- व्यस्त हो कर भागने लगी। तब अश्वत्थामाने दुर्योधनसे पूछा "किसके वधसे यह सेना ऐसी भाग रही है?" धृष्टद्युम्नसे अपने पिताका वध हुवा यह सुनते ही अश्वत्थामाने धृष्टद्युम्नके वधकी प्रतिज्ञा की। पितृवधसे संतप्त अश्वत्थामाने, सात्यकी, धृष्टद्युम्न, तथा भीमसे लड़कर उनको भगा दिया। तब इसने पांडव सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। इससे पांडव सेनामें हाहाकार मच गया। तब कृष्णने सबको निःशस्त्र होनेको कहा। सबके निःशस्त्र होने पर वह नारायणास्त्र शांत हुवा। सभी कौरव मारे गये। हताश और क्षत-विक्षत दुर्योधन अश्वत्थामाको सेनापति बनाकर रणभूमिपर तड़पता पड़ा रहा। रातका समय। कौरव सेनाके तीन थके हुए सेनानी, कृपाचार्य, ३७ परिशिष्ट १.

अश्वत्थामा और कृतवर्मा, विचार मग्न हो एक वृक्षके नीचे आये थे। तब एक उल्लू वहीं एक घोंसलेके अनेक कौवोंको मार गिरा रहा था। यह देखकर अश्वत्थामाके मस्तिष्कमें एक नई बात आयी। रातको पांडवोंकी छावनी पर हमला करके ऐसे ही निद्रस्थ सेनाका सफाया किया जा सकता है! इसने अपना यह विचार कृपाचार्य और कृतवर्मासे कहा। उन्होंने इसका अस्वीकार करके अश्वत्थामाको इस विचारसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया परंतु अश्वत्थामाने नहीं माना। वह अकेला हमला करनेके लिये चल पड़ा और अभिचार पूर्ण यज्ञमें अपने मांसकी आहुति देकर रुद्र खङ्ग प्राप्त करके इसने निद्रस्थ सेनानियोंका संहार करना प्रारंभ किया। इस हत्याकांडमें द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, पांचालकुल, सूत, सोम, शिखंडी, आदि अनेक वीर मारे गये। इतना सब करके, यह खबर देनेके लिये कृपाचार्य और कृतवर्माको साथ लेकर युद्ध भूमिपर क्षत-विक्षत हो पडे हुए दुर्योधनके पास गया। दुर्योधन मृत्यु-पीडासे तडप रहा था। वहां जाकर अश्वत्थामाने कहा "दोनो सेनामें अब बस कृष्ण, पांच पांडव और हम तीन ही रहे हैं! और सब मारे गये।" वह सुनकर दुर्योधनके प्राण पखेरू उड़ गये। किंतु इससे द्रौपदीको अत्यंत दुःख हुवा। द्रौपदीने "अश्वत्थमाके सिर पर जो मणि है वह युधिष्ठिरके सिर पर देख कर ही जीवित रहूंगी" ऐसी प्रतिज्ञा की और इस प्रतिज्ञाकी पूर्तिका लिये भीम गदा लेकर चल पडा। किंतु अश्वत्थामाके अस्त्र प्रभावके आगे भीमका कुछ भी नहीं चलेगा यह जान कर कृष्णार्जुन भी उसके साथ चले। अश्वत्थामाने पांडवोंके विनाशके लिये ब्रह्मा- सिरस् नामके अस्त्रका प्रयोग किया और इसका प्रतिकार करनेके लिये अर्जुनने भी उसी अस्त्रका प्रयोग किया, परिणाम स्वरूप पृथ्वी कांप उठी। अश्वत्थामाके अविचारके लिये व्यास्रादने उसकी भर्त्सना की और सिरका दिव्य मणि देकर अर्जुन को शरण जानेको कहा। अश्वत्थामाने वह मणि तो दिया किंतु यह अस्त्र पांडव वंशका नाश करके शांत होगा ऐसा कहा। यह सुन कर, कृष्णने अश्वत्थामाको महा-रोगसे पीडित होकर मूक भावमें लंबी आयु भोगनेका शाप दिया और इस अस्त्रसे उत्तराके गर्भमें जो पांडव-वंश बढ़ रहा था उसकी रक्षा की। इसे चीरजीवी कहा गया है। गीता अ० १. श्लो० ८-विकर्ण- धृतराष्ट्र-पुत्र । द्रौपदी स्वयंवरमें गया था। यह महारथी था। न्यायवान था। जब द्रौपदीको सभामें लाया जा रहा था तब इसने कहा था "यह अन्याय है!" युद्धमें यह नकुलसे पराजित हुवा और भीमसे मारा गया। गीता अ० १. श्लो० ८-सौमदत्ति- यह सोमदत्तका पुत्र। इसका वास्तविक नाम भूरिश्रवा। यह अत्यंत पराक्रमी था। महाभारत युद्धमें इसने सात्यकीको पराजित किया था। अर्जुनने सात्यकीको इसके हाथसे बचानेके लिये भूरिश्रवाके हाथ तोडे। तब भूरिश्रवाका कहना था अर्जुनने उनके साथ अन्याय किया। अन्यायके प्रतिकार के लिये इसने टूटा हुवा हाथ अर्जुनकी ओर फेंक दिया और सात्यकीने इसका सिर उडाया। यह अग्निहोत्री था। इसने सात्यकीके दस पुत्र मारे थे संभवतः इसीलिये सात्यकीको इस पर इतना क्रोध था। ज्ञानेश्वरी २६

गीता अ० १. श्लो० १४-माधव-

कृष्ण । वृष्णि कुलका यादव । बापका नाम वसुदेव । माताका देवकी । माता पिता अब कंसके बंदिगृहमें थे तब इसका जन्म हुवा । कृष्णका पिता वसुदेव उग्रसेनका प्रधान मंत्री था । अत्यंत राजकारण पटु । मुत्सैद् ! इसलिये इस पर कंसकी नज़र थी । बापको बंदी बनाकर कंसने राज्य- पद पाते ही इसको भी बंदी बना दिया । कंसके भयसे कृष्ण जन्म होते ही इसे गोकुलमें भेज दिया तथा नंदके घर जनमी हुई लड़की यहां लायी गयी । कंस इस बच्चीको मारने गया किंतु वह उस बच्चीको नहीं मार सका । कंसने बाल्यावस्थामें ही कृष्णको मार डालनेके लिये अनेक प्रयास किये जो व्यर्थ गये । नंद कृष्ण-जन्मसे अत्यंत प्रसन्न था । नंद, कंसका आधीन राजा था । कृष्णने गोकुलके बालकोंमें नया प्राण फूंक दिया । बचपनसे ही या स्वभावसे ही वे चतुर संघटक थे । खेलकूदमें बच्चोंके नेता बनकर उनको प्रोत्साहन और प्रेरणा देते रहते थे । वे अतुल बलशाली और धैर्यशाली थे । हर संकटके समय आगे बढ़कर संकटोंसे जूझते थे । संकटोंपर विजय पाते थे । इसलिये सारे गोप गोपियां इनके आधीन रहे । जब कृष्ण और बलराम-कृष्णके बड़े भाई-कौमार्यावस्थासे तारुण्यमें पदार्पण करने लगे तब कंसने धनुर्यागमें उनको निमंत्रित किया और उन्हे लानेके लिये अक्रूरको भेजा । नंद कंसके आधीन होनेसे ना नहीं कह सकते थे । अक्रूरके साथ कृष्ण बलराम मथुरा आये । मथुरामें सबने इन युवकोंका स्वागत किया । इससे कंस संतप्त हुवा । कृष्णने शस्त्रागारके एक भव्य धनुष्यको झुकानेके प्रयासमें तोड दिया । उत्सवमें कंसने कृष्ण बलरामसे चाणूर-मुष्टिकको कुश्ती खेलनेको कहा । कृष्ण बलराम जब मल्लशालाकी ओर बढ़ने लगे तब एक मस्त हाथी भड़काकर उन पर डाला गया । उस हाथीका नाम था कुवलयापीड़ । मल्लशालाके दरवाजे पर आते आते हाथी सामने आया और कृष्णने उसका प्रतिकार करके उसको मार डाला । कृष्ण बलरामने चाणूर मुष्टिकको कुश्तीमें ऐसे दबोचा कि बेचारे उठ भी नहीं पाये । इसके बाद, तोषलक कृष्णसे लड़ने आया और एक ही झटकेमें समाप्त हो गया । यह देख कर दूसरे मल्ल भाग गये और कृष्ण कंसकी ओर बढे । कृष्णने कंसके दरबारमें, उसीको सिंहासनपरसे नीचे खींच कर केवल मुष्टि-प्रहारसे ही मार डाला । इस भरे दरबारमें "सुनाभ" नामक कंसके एक अंग रक्षकके अलावा और कोई भी उसको बचाने आगे नहीं आया और कृष्णने सुनामको भी कंसके साथ परलोक दिखाया । इसके बाद बलराम-कृष्णका उपनयन संस्कार हुवा और ये दोनों विद्याध्ययनके लिये अवंतीकाके पास सांदीपनी आश्रममें भेज दिये गये । वहां वे शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखे । ये इतने बुद्धि-शाली थे कि जो बात इनके सामने आती तुरंत सीख लेते थे । ये गुरुकुलमें केवल ६४ दिन रहे । और, यहां कंसवधके बाद कंसकी पत्नियोंसे यह बात जरासंध तक गयी । कंस जरासंधका जामात था । जरासंधने कंसकी शक्ति देख कर अपनी दो पुत्रियां अस्ति और प्राप्ति कंसको देकर विवाह कर दिया था । अपने श्वशुरकी प्रेरणासे ही वह राजा बन बैठा था । जरासंध अत्यंत शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी राजा था । अपनी पुत्रियोंसे अपने पतिके वधकी बात सुनते ही अपनी प्रचंड सेनाके साथ मथुरा पर चढ़ आया । उनके साथ उनके आधीन राजा भी थे । मथुराके चारों दरवाजों पर जरासंधकी सेनाएं जम गयीं । दक्षिणमें दरद, चेदिराज और वह स्वयं

११ परिशिष्ट १.

अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

रहा, उत्तरमें पुरुत्कुलोत्पन्न वेणुदारी, विदर्भाधिपति सोमराज, भोजेश्वर रुक्मि, सूर्णाक्ष, अवंतिकाके विंद अनुविंद, दंतवक्त्र, क्षात्रलि, पुरमित्र, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण, और पंचनदकी व्यवस्था की, पूर्वकी ओर उलूक केतव, अंशुमान्‌का पुत्र बृहत्क्षत्र, बृहधर्मन् जयद्रथ, उत्तमो जस काश्य, कैकेय, वैदिश, सितीदेशका राजा सांकृतिकी व्यवस्था की और पश्चिममें मद्राजा, कहलिंगेश, चेकितान, बाह्विक, काश्मीर नरेश गोनर्द, करूषेश, द्रुमराज दर्पतीय अनामयको खड़ा किया। इस युद्धमें जरासंध २० अक्षौहिणी सेना लाया था। इसके विरुद्ध यादवोंकी सेना छोटी थी। फिर भी यादवोंने इन्हे हराया। बलरामने जरासंधको हराया। जरासंधने कई बार ऐसा आक्रमण किया। कृष्णने सत्रह बार जरासंधका पराभव किया और यह अकारण वैर करता है, बार बार आक्रमण करता है इस लिये इससे बचनेके लिये कृष्णने सौराष्ट्रके पास द्वारका बसाई। सत्रह बार हारनेके बाद भी यह शांत नहीं रहा। इसने यवनराजा कालयवनकी सहायतासे अठारवी बार हमला किया। कालयवन यादवोंके पुरोहित आर्यका पुत्र ! किसी यादवसे अपमानित होकर आर्यने यादवोंका पराजय कर सकनेवाले पुत्रके लिये तपस्या की और शंकरसे ऐसा वर भी पा लिया। इस भांति यह आर्य-पुत्र यवनोंके घर पर पला और यवनोंका राजा भी बन गया। जरासंधने इससे संधि की और इसने उसी रोज मथुरा पर आक्रमण कर दिया। इसकी सेना भी बडी विशाल थी; जरासंधकी थी ही। इसी समय कृष्णने राजधानी बदली। सबको द्वारका पहुंचा कर कृष्ण मथुरा आये । और निःशस्त्र कृष्णको देख कर कालयवनने उनका पीछा किया। कृष्ण आगे, आगे आगे कृष्ण और पीछे पीछे कालयवन। जाते जाते कृष्ण एक गुफाके अंदर जा कर छिप गये। उस गुफामें महा पराक्रमी मुचकुंद राजा सोया था। कालयवनने उसको लाथ मार कर पूछा कृष्ण कहां ? देवोंका भी सेनापति बननेवाला मुचुकुंद ! मुचुकुंदने कालयवनको वहीं राख बना दिया। इन्हीं दिनों रुक्मिणी स्वयंवरमें कृष्णने शिशुपालका पराभव करके रुक्मिणीसे विवाह किया। स्यमंतक मणिकी चोरीके आरोपसे मुक्ति पानेके प्रयासमें सत्यभामा और जांबवतीसे विवाह हुआ। उसी स्यमंतक मणिके कारण कृष्णको शतधन्वाका वध करना पडा। इस घटनाके कुछ काल बाद पांडव और कृष्णका संबंध आया। द्रौपदी स्वयंवरके समय कृष्ण वहां थे। कृष्णने द्रौपदीके विवाहके समय पांडवोंको वस्त्राभरण भूषण भेजा था। जिसका पांडवोंने स्वीकार किया। यहींसे पांडव व कृष्णका संबंध प्रारंभ होता है। पांडवोंके साथ कृष्ण हस्तिनापुर भी गये थे। इंद्रप्रस्थ नगर बसानेके बाद वे और बलराम द्वारका आये। सुभद्रा विवाहके बाद भी कृष्ण कुछ काल पांडवोंके साथ रहे थे। आगे खांडवन दहनके बाद ये द्वारका गये। द्वारकामें एक नई समस्या कृष्णकी राह देख रही थी। जरासंधने २० हजार राज-पुत्रोंको बंदी बना रखा था। गुप्त रूपसे उन राज-पुत्रोंने मुक्तिकी याचना करनेके लिये कृष्णके पास अपना दूत भेजा था। उस दूतने कहा "यदि आप शीघ्रता करेंगे तो हमारे प्राण बचेंगे नहीं तो यज्ञमें हमारी आहुति पडेगी !" इस विषयमें कृष्ण अपने यादव साथियोंसे विचार विनिमय कर ही रहे थे युधिष्ठिरका दूत आया "युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहता है। आपको बुलाया है !!" कृष्ण सोचमें पडे अब किस ओर जाना चाहिए। -ज्ञानेश्वरी १०

उद्धवने कहा "अपने विचारसे प्रथम युधिष्ठिरके पास जाना उचित होगा" और कृष्ण उन दूतोंको साथ लेकर ही इंद्रप्रस्थ गये । कृष्णने इंद्रप्रस्थसे ही उन राजाओंको संदेश भेज दिया । "जरासंधका वध करके तुम्हारी मुक्ति की जायेगी !" कृष्णको इंद्रप्रस्थमें देख कर पांडवोंको आनंद हुवा । राजसूय यज्ञ करनेके लिये पांडवोंको भी जरासंधको मारना आवश्यक था। इसलिये कृष्ण, अर्जुन और भीमको साथ लेकर मगध गये । भीमसे जरासंधका वध कराया और जरासंधके पुत्रका राज्याभिषेक करके २० हजार राजपुत्रोंको मुक्त किया । चेद देशमें पौंड्रक वासुदेव जो जरासंधका मित्र था अपनेको पुरुषोत्तम मान कर सत्ताधीश बना था। उसने अपनेको परमात्म रूप घोषित करके कृष्णको शरण आनेका संदेशा भेजा। प्रत्युत्तरमें कृष्ण चेदि देश पर चढ़ाई कर युद्धके लिये चल पडे । वह अपने मित्र काशीराजाके साथ कृष्णका ही स्वांग भरकर युद्ध करने आगे आया और कृष्णसे मारा गया । युधिष्ठिरने राजसूययज्ञमें भीष्माचार्यकी आज्ञासे कृष्णकी प्रथम पाद्यपूजा की। इससे शिशुपाल संतप्त हुवा । शिशुपाल चेदि प्रदेशका राजा था । इसकी माता श्रुतश्रवा, कृष्णकी बूआ । शिशुपाल अत्यंत शक्तिशाली था । यह जरासंधका सेनापति भी था। भाई होने पर भी सदैव कृष्णका द्वेष करता था और कृष्ण इसे सहन करता था । राजसूयज्ञकी राज-सभा में इसने भीष्मको भला बुरा कहा । युधिष्ठिरको धमकियां दीं । "रुक्मिणीने मेरा स्वीकार किया है और यह उसे अपनी पत्नी कहकर भगा कर ले गया है" कहता हुवा राज सभाके दरवाजेसे बाहर पडते समय इसे कृष्णने वहीं वध किया । कृष्णके चक्रसे यह राजसूयके राजदरबारमें ही मारा गया । युधिष्ठिरके यज्ञ-समाप्तिके बाद कृष्ण द्वारका गये । किंतु जब कृष्ण राजसूय यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये थे तब कृष्णकी अनुपस्थितिमें शाल्वने द्वारका पर आक्रमण कर दिया था। शाल्व दैत्य कुलका राजा था । जरासंधका सखा था। इसीने जरासंध और कालयवनमें संधि करायी थी। रुक्मिणीके विवाहके समय वह कृष्णसे पराजित हुवा था। इसने "निर्यादव पृथ्वी" करनेकी प्रतिज्ञा भी की थी । इसके लिये मायासुरसे सौभ नामक अभेद्य विमान भी बनवा लिया था और जब इसको ज्ञात हुवा कि कृष्ण यज्ञमें इंद्रप्रस्थ गये हैं इसने द्वारका पर आक्रमण किया। वहां प्रद्युम्न और शाल्वका २७ दिन तक भयंकर युद्ध हुवा और शाल्व अपना विमान लेकर सौभ देशको लौट गया किंतु कृष्णने इसका पीछा किया । इसने अनेक प्रकारकी चालें चलीं किंतु कृष्णने अपने चक्रसे इसका विमान तोड फोडकर फेंक दिया और इसका वध किया । इसके बाद शिशुपाल-शाल्वादिक मित्रोंके वधसे संतप्त विदूरथने मित्र-वधका बदला लेनेके लिये कृष्ण पर आक्रमण किया । कृष्णने इसका भी वध किया । कृष्णने शोणितपुरका राजा बाणासुरको जीतकर अपने पोते अनिरुद्धसे उसकी लडकी उषाका विवाह किया। वैसे ही प्राग्ज्योतिषपुरके नरकासुरको मार कर उसके बंदीगृहसे १६ हजार राजकन्याओंको मुक्त किया । विश्वकी प्रत्येक अच्छी वस्तु अपने पास होनी चाहिए, ऐसी नरकासुरकी इच्छा दीखती है । किंतु यह उन वस्तुओंका भोग नहीं करता था । नरकासुरने विश्वके विविध देशोंसे अनेक प्रकारके रत्न, वस्त्र, आभूषण आदिसे अपना कोश भर लिया था किंतु किसीका भोग नहीं किया । वैसे ही १६ हजार सुंदर कन्याओंको लाकर अपने राज्यमें रखा, पर उनका भी भोग ३१ परिशिष्ट १-

नहीं किया। इसने इंद्रकी अमरावती भी लूटी थी। नरकासुरके वधके लिये इंद्रने कृष्णसे प्रार्थना की थी। इंद्रको साथ लेकर ही कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर गया। प्रथम इन्होंने गरुड पर बैठ कर प्राग्ज्योतिषपुरका अवलोकन किया तब कृष्णने युद्धार्थ शंखनाद किया। शंखध्वनि सुनकर नरकासुर संतप्त हुवा। वह अपने विशाल भव्य रथमें बैठकर युद्धके लिये आ गया। कई घोडे इनका रथ खींचते थे। इसके साथ कृष्णका बडा ही घमासान युद्ध हुआ। अंतमें कृष्णने अपने सुदर्शनसे इसका शिरच्छेद किया। नरकासुरकी माताने तब इसके कवच कुंडल और राज्य कृष्णार्पण किया। इस युद्धसे कृष्णको अपार संपत्ति मिली। कृष्णने नरकासुरका पुत्र भगदत्तको सिंहासन पर बिठाकर उसे प्राग्ज्योतिष्यपुरका राजा बनाया। जैसे शिशुपाल कृष्णकी बुआका लड़का था वैसे पांडव भी कृष्णकी बुआके लडके। द्रौपदी स्वयंवरमें सर्व प्रथम कृष्ण और पांडवोंकी भेंट हुई। तब कृष्णने वस्त्राभरण भूषणोंसे पांडवोंका सत्कार किया था और पांडवोंने भी अत्यंत प्रेमसे उसका स्वीकार किया था। तबसे लेकर पांडवोंसे कृष्णका संबंध बढ़ता गया। विशेषतः राजसूय-यज्ञमें युधिष्ठिरके बुलाते ही कृष्णका आना इस संबंधका मधुर प्रारंभ है। इसके बाद जरासंघ वध, राजसूय-यज्ञमें कृष्णकी अग्र-पूजा, खांडववन दहन आदिसे वह बढ़ने लगा। पांडव-वनवासमें कृष्ण कई बार उनसे मिलने गये। कभी कभी सपत्नीक भी गये। अभिमन्युके विवाहमें जो राजा महाराजा आये थे उनसे कृष्णनेही पांडवोंके वास्तविक अधिकारकी बात कही थी। कृष्णने ही सामोपचारसे सब मिटानेके लिये धृतराष्ट्रसे शिष्टाई की। किंतु इसका कुछ भी उपयोग नहीं हुवा। कृष्ण शिष्टाईसे प्रथम जब दुर्योधन और अर्जुन युद्धमें कृष्णकी सहायता मांगने आये तब कृष्णने दुर्योधनको अपनी तीन अक्षौहिणी नारायणी सेना दी ओर स्वयं पांडवोंकी ओर गये। भारतीय युद्धमें कृष्णने ही धृष्टद्युम्न और सात्यकीकी सहायतासे पांडवोंके मूल शिबिरकी स्थापना की थी। भारत-युद्धके प्रारंभमें ही दोनों ओर युद्धके लिये खडे स्वजनोंको देख कर सं-भ्रममें पडे अर्जुनको अत्यंत मार्मिक उपदेश दे कर उसे युद्ध सन्नद्ध किया। इसीको आज भगद्गीता कहते हैं। महाभारत के युद्धमें अर्जुनका सारथ्य करके घोडोंकी भी सेवा की। युद्धमें भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा की। द्रोणवध के लिये कृष्णने ही युधिष्ठिरको असत्य बोलनेकी प्रेरणा दी। जयद्रथ वधमें इसीने अर्जुन की सहायता की। कर्णके सर्प मुख बाणसे कृष्णने ही अर्जुनकी रक्षा की। कृष्णने ही शल्यवधके लिये युधिष्ठिरको उकसाया। भीमको दुर्योधनके जांघपर गदा मारनेको कृष्णने ही कहा। भारत-युद्धका सूक्ष्म अवलोकन किया जाय तो वहां कृष्णकी मंत्रणा-शक्तिका सुंदर परिचय मिलता है। इस प्रकार कुरुकुलके महायुद्धमें पांडवोंको विजय दिलाकर कृष्ण द्वारका गये। कृष्णने केवल अर्जुनको ही गीतोपदेश दिया ऐसा नहीं, पुत्रोंकी मृत्युसे दुःखतप्त गांधारी, धृतराष्ट्र आदिका सांत्वन कृष्णने ही किया। अभिमन्युकी मृत्युके बाद सुभद्राका सांत्वन भी कृष्णने ही किया था। धर्मराजके अश्वमेध यज्ञमें भी कृष्ण आया था। किंतु ऐसा लगता है कि महाभारत युद्धके बाद कृष्ण राजनीतिसे अधिक धर्मनीतीकी ओर झुके। अंतमें राज-सत्तासे मत्त यादव जब आपसमें ही लड पडे तब प्रद्युम्नके वधका दृश्य देख कर कृष्ण इतने क्रोधाविष्ट हो गये कि बचे हुए सभी यादवोंको कृष्णने खतम कर दिया। कृष्णका यह प्रचंड क्रोध देखकर दारुक-कृष्णका सारथी और अक्रूरने कृष्णको प्रणाम करके कहा “ भगवन् ! आपने सभी यादवोंका संहार कर दिया अब बकरासको ढूंढें कर्यों ? ! ” तब कृष्ण शांत हुए। ज्ञानेश्वरी ३५

मृत्युके समय कृष्णकी आयु १०१ (?) वर्षकी थी। यह अर्जुनसे तीन महीने बड़े थे। अर्जुनसे पहले इनकी मृत्यु हुई। यादव युद्धके बाद कृष्ण एक पीपलके पेड़के नीचे अपने दाहिने घुटनों पर बायां पैर रख कर जब चिंतन मग्न हो पड़े थे तब जरा नामके व्याधने-एकलव्य-पुत्र ? पक्षी मानकर इसी पैरमें बाण मारा। इसी बाणसे कृष्णकी इह लीला समाप्त हुई। इनके इस महा निर्वाणके बाद द्वारका डूब गयी। गीता अ० १. श्लो० १६-युधिष्ठिर— पांडुराजका ज्येष्ठ पुत्र। माताका नाम कुंती। मृगयामें हुई एक घटनासे दुःखी हो कर पांडुराजा वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करके कुंती और माद्रीके साथ वनमें रहने लगा। इसी अवस्थामें युधिष्ठिरका जन्म हुआ। इसका जन्मस्थान शतशृंग पर्वतका वन था। इसका पहला शस्त्र गृह शस्त्र शर्याती पुत्र शुक्र। प्रथम उसीके पास यह शस्त्र और शास्त्र सीखा। हस्तिनापुरमें आनेके बाद कृप और द्रोण इसके आचार्य बने। यह तोमर-विद्यामें प्रवीण था। हस्तिनापुर आनेके बाद धृतराष्ट्रने इसको युवराज्याभिषेक कराया। इससे दुर्योधन युधिष्ठिरसे जलने लगा। दुर्योधनने पांडवोंके विरुद्ध षड्यंत्र रचनाप्रारंभ कर दिया। सर्व प्रथम दुर्योधनने पांडव और कुंतीको लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेका प्रयास किया। विदुरकी सहायतासे यह वहांसे मां और भाइयोंके साथ बचकर निकला। लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद ब्राह्मण-वेषमें यह अपने भाइयोंके साथ द्रौपदी स्वयंवरमें प्रकट हुआ। द्रौपदी स्वयंवरके बाद द्रुपद राजाने बड़े वैभवके साथ इसे हस्तिनापुर पहुंचाया। वहांकी प्रजाने भी इसका हार्दिक स्वागत किया। यह सब देखकर धृतराष्ट्रने आधा राज देकर इसको अलग कर दिया। युधिष्ठिरने भी इंद्रप्रस्थको राजधानी बनाकर राज्य करना प्रारंभ किया। नारदने इसको राजनीति शास्त्र सिखाया। इंद्र, वरुण, यम, कुबेर आदिकी राज्यव्यवस्था समझायी। तथा राजसूय- यज्ञ करनेको कहा। इसके राजसूय यज्ञमें स्वयं वेदव्यास ब्रह्मा थे। सुसामन् सामग था। याज्ञवल्क्य अध्वर्यु था। इस यज्ञके ऋत्विजोंमें पौम्य, धौम्य, आदि ऋषियोंकी लंबी सूची मिलती है। इसी यज्ञमें भीष्मपितामहकी आज्ञासे युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको अग्रपूजाका मान दिया था। यह देखकर कौरवोंने युधिष्ठिरका विरोध किया। दूसरी बात, युधिष्ठिरके इस यज्ञमें दुर्योधन कोषाध्यक्ष था। यज्ञमें दुर्योधनकी ओरसे अनापशनाप खर्च करने पर भी, जब राजकोश रीता नहीं हुआ तब दुर्योधन पांडवोंको दारिद्र्यमें लोटानेका उपाय ढूंढने लगा। एक बार शकुनी मामा ने इससे कहा "पांडवोंको दरिद्री बनानेके दोही साधन हैं। एक युद्ध और दूसरा द्यूत।" इसीसे द्यूतक्रीड़ाकी योजना बनी। धृतराष्ट्रने विदुरके द्वारा युधिष्ठिरको द्यूतके लिये निमंत्रण भेजा। दुर्योधनकी ओरसे शकुनी युधिष्ठिरसे जूआ खेला। युधिष्ठिर हारता गया। अंतमें सर्वस्व खोनेके बाद इसने दुर्योधनकी प्रेरणासे द्रौपदीको दांवपर लगाया और उसमें भी हार गया। इसके साथ ही पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भोगना था। इस अज्ञातवासमें पकड़े जानेपर "पुनः बारह वर्ष वनवास" ऐसी भी शर्त थी। युधिष्ठिर जब अपने भाइयोंके साथ वनवासके लिये निकला तब इसकी प्रजा भी शोकाकुल हो कर वनवास जानेके लिये तैयार हो गयी थी। बहुत ही समझा बुझा कर उसको राज्यमें रहनेके ३३ परिशिष्ट १.

लिये तैयार करना पड़ा । फिर भी पुरोहित धौम्य आदि कुछ उसके साथ गये थे। वनवासमें किर्मीर राक्षस इसका रास्ता रोक कर भीमसे मारा गया। द्रौपदी और भीमने प्रह्लाद और बलीका अनुकरण करके दुर्योधनको मारकर राज्य लेनेकी बात कही थी किंतु युधिष्ठिरने इसका अस्वीकार किया। द्वैतवनमें यह व्याससे प्रति-स्मृति विद्या सीखा। व्यासने इससे वनमें एक ही स्थान पर न रह कर भ्रमण करनेको कहा। व्यासकी आज्ञासे युधिष्ठिर द्वैतवनसे काम्यकवनमें गया। काम्यकवनमें इसको बृहदश्व ऋषिने नलका इतिहास कहा और अक्ष-विद्या सिखाई । फिर युधिष्ठिर तीर्थ-यात्रा करने लगा । इस तीर्थ यात्रामें बृहदश्वऋषि युधिष्ठिरके साथ रहा । ऋषिने इसे अनेक तीर्थोंका इतिहास कहा। पांडव जब काम्यकवनमें थे तब कृष्ण इनसे मिलने आये थे । यहीं युधिष्ठिर मार्कंडेय ऋषिसे मिला। मार्कंडेय ऋषिने युधिष्ठिरको परलोकके विषयमें जानकारी दी। अज्ञातवासमें यह कंक नामसे विराट राजाके घर रहा । यह विराटराजाके साथ जूआ खेलता था । इस समय युधिष्ठिरका गुप्तनाम "जय" था। जब युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ विराटके राज्यमें था तब विराट पर त्रिगर्तके सुशर्माने आक्रमण कर दिया। लड़ाईमें सुशर्मा जीता और विराट हारा। सुशर्माने विराटको बंदी बनाया। तब युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीम सुशर्माको जीत कर बंदी बनाके ले आया । एक बार क्रोधमें आकर विराटने अपने आश्रित कंककी नाक पर पांसा मारा और नाकसे जो खून बहने लगा वह द्रौपदीने पोंछा । इस घटनाके दो ही दिन बाद पांडव प्रकट हुए । उस समय विराट राजाने पुनः पुनः पांडवोंकी क्षमा मांगी ।

पांडवोंके प्रकट होते ही द्रुपदराजाके पुरोहितको संधान के लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा गया । द्रुपद-पुरोहितने पांडवोंकी मांग धृतराष्ट्रके सम्मुख रखी। भीष्म, द्रोण, विदुरने उसका समर्थन किया । धृतराष्ट्रने भी "धृतराष्ट्र पांडवोंका सख्य चाहता है।" ऐसा संदेश देकर पुरोहितको लौटा दिया। इसके बाद कृष्ण संधानके लिये आया। कृष्णका प्रयत्न भी व्यर्थ गया। तब कृष्णने कहा "युधिष्ठिरने कहा है आधे राज्यके स्थान पर (१) अविस्थल (२) वृकस्थल (३) माकंदी (४) वारणावत (५) कोई भी एक ग्राम और दें" किंतु दुर्योधनने "बिना युद्धके सुईके नोकके बराबरकी भी भूमि न दूंगा !" कह कर कृष्णको लोटा दिया। इससे संधान व्यर्थ गया और कुरुक्षेत्रपर हिरण्यवती नदीके किनारे खाइयां खोदकर युद्धकी तैयारियां होने लगीं।

युद्धके समय कौरव सेनाको देख कर इसको बड़ा दुःख हुआ । क्यों कि दोनों सेनामें सभी इसके बंधु-जन थे । अज, अभिमन्यु, अर्जुन, उत्तमौजा, उत्तर, काशिक, काश्य, कुंतिभोज, कैकेय-पांचबंधु-क्षत्रदेव, क्षत्रधर्मन्, घटोत्कच, चंद्रसेन, चित्रायुध, चेकितान, जयंत, अमितौजस, सत्यजित, द्रुपद, द्रौपदीके पांच पुत्र, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, नील, पांचाल, पांड्य, पुरुजित, भोज, मदिराश्व, युधामन्यु, वसुदान, वार्षक्षेमी, विराट, व्याघ्रदत्त, शंख, शिखंडिन्, श्रेणिमत्, सत्यजित्, सात्यकी, सुकुमार, सूर्यवर्च, सेनबिंदु, आदि प्रधान अधीरथी महारथी थे । इसमें विराट और द्रुपद वृद्ध थे । ये दो वृद्ध-द्रुपद और विराट-तथा धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, शिखंडिन्, सहदेव, और सात्यकी ये सात पांडव सेनाके सेनापति थे । इन सेनापतियोंके आधीन एक एक अक्षौहिणी सेना थी।

और कौरवोंमें, अलंबुष, अनुविंद, अकंडुल, अश्वत्थामन्, उग्रायुध, कर्ण, कृतवर्मा, कृप, जयद्रथ, जरासंध, त्रिगर्त, दंडधर, दुर्योधन, दुश्शासन, द्रोण, नील, पौरव, बाह्लीक, बृहद्वल, भगदत्त, भीष्म, भूरिश्रवा, लक्ष्मण, विंद, वृषक, शकुनि, शल्य, सत्यश्रवस, सुदक्षिण, दुर्योधनकी ज्ञानेश्वरी ३४