ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमृत्युके समय कृष्णकी आयु १०१ (?) वर्षकी थी। यह अर्जुनसे तीन महीने बड़े थे। अर्जुनसे पहले इनकी मृत्यु हुई। यादव युद्धके बाद कृष्ण एक पीपलके पेड़के नीचे अपने दाहिने घुटनों पर बायां पैर रख कर जब चिंतन मग्न हो पड़े थे तब जरा नामके व्याधने-एकलव्य-पुत्र ? पक्षी मानकर इसी पैरमें बाण मारा। इसी बाणसे कृष्णकी इह लीला समाप्त हुई। इनके इस महा निर्वाणके बाद द्वारका डूब गयी। गीता अ० १. श्लो० १६-युधिष्ठिर— पांडुराजका ज्येष्ठ पुत्र। माताका नाम कुंती। मृगयामें हुई एक घटनासे दुःखी हो कर पांडुराजा वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करके कुंती और माद्रीके साथ वनमें रहने लगा। इसी अवस्थामें युधिष्ठिरका जन्म हुआ। इसका जन्मस्थान शतशृंग पर्वतका वन था। इसका पहला शस्त्र गृह शस्त्र शर्याती पुत्र शुक्र। प्रथम उसीके पास यह शस्त्र और शास्त्र सीखा। हस्तिनापुरमें आनेके बाद कृप और द्रोण इसके आचार्य बने। यह तोमर-विद्यामें प्रवीण था। हस्तिनापुर आनेके बाद धृतराष्ट्रने इसको युवराज्याभिषेक कराया। इससे दुर्योधन युधिष्ठिरसे जलने लगा। दुर्योधनने पांडवोंके विरुद्ध षड्यंत्र रचनाप्रारंभ कर दिया। सर्व प्रथम दुर्योधनने पांडव और कुंतीको लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेका प्रयास किया। विदुरकी सहायतासे यह वहांसे मां और भाइयोंके साथ बचकर निकला। लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद ब्राह्मण-वेषमें यह अपने भाइयोंके साथ द्रौपदी स्वयंवरमें प्रकट हुआ। द्रौपदी स्वयंवरके बाद द्रुपद राजाने बड़े वैभवके साथ इसे हस्तिनापुर पहुंचाया। वहांकी प्रजाने भी इसका हार्दिक स्वागत किया। यह सब देखकर धृतराष्ट्रने आधा राज देकर इसको अलग कर दिया। युधिष्ठिरने भी इंद्रप्रस्थको राजधानी बनाकर राज्य करना प्रारंभ किया। नारदने इसको राजनीति शास्त्र सिखाया। इंद्र, वरुण, यम, कुबेर आदिकी राज्यव्यवस्था समझायी। तथा राजसूय- यज्ञ करनेको कहा। इसके राजसूय यज्ञमें स्वयं वेदव्यास ब्रह्मा थे। सुसामन् सामग था। याज्ञवल्क्य अध्वर्यु था। इस यज्ञके ऋत्विजोंमें पौम्य, धौम्य, आदि ऋषियोंकी लंबी सूची मिलती है। इसी यज्ञमें भीष्मपितामहकी आज्ञासे युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको अग्रपूजाका मान दिया था। यह देखकर कौरवोंने युधिष्ठिरका विरोध किया। दूसरी बात, युधिष्ठिरके इस यज्ञमें दुर्योधन कोषाध्यक्ष था। यज्ञमें दुर्योधनकी ओरसे अनापशनाप खर्च करने पर भी, जब राजकोश रीता नहीं हुआ तब दुर्योधन पांडवोंको दारिद्र्यमें लोटानेका उपाय ढूंढने लगा। एक बार शकुनी मामा ने इससे कहा "पांडवोंको दरिद्री बनानेके दोही साधन हैं। एक युद्ध और दूसरा द्यूत।" इसीसे द्यूतक्रीड़ाकी योजना बनी। धृतराष्ट्रने विदुरके द्वारा युधिष्ठिरको द्यूतके लिये निमंत्रण भेजा। दुर्योधनकी ओरसे शकुनी युधिष्ठिरसे जूआ खेला। युधिष्ठिर हारता गया। अंतमें सर्वस्व खोनेके बाद इसने दुर्योधनकी प्रेरणासे द्रौपदीको दांवपर लगाया और उसमें भी हार गया। इसके साथ ही पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भोगना था। इस अज्ञातवासमें पकड़े जानेपर "पुनः बारह वर्ष वनवास" ऐसी भी शर्त थी। युधिष्ठिर जब अपने भाइयोंके साथ वनवासके लिये निकला तब इसकी प्रजा भी शोकाकुल हो कर वनवास जानेके लिये तैयार हो गयी थी। बहुत ही समझा बुझा कर उसको राज्यमें रहनेके ३३ परिशिष्ट १.