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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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लिये तैयार करना पड़ा । फिर भी पुरोहित धौम्य आदि कुछ उसके साथ गये थे। वनवासमें किर्मीर राक्षस इसका रास्ता रोक कर भीमसे मारा गया। द्रौपदी और भीमने प्रह्लाद और बलीका अनुकरण करके दुर्योधनको मारकर राज्य लेनेकी बात कही थी किंतु युधिष्ठिरने इसका अस्वीकार किया। द्वैतवनमें यह व्याससे प्रति-स्मृति विद्या सीखा। व्यासने इससे वनमें एक ही स्थान पर न रह कर भ्रमण करनेको कहा। व्यासकी आज्ञासे युधिष्ठिर द्वैतवनसे काम्यकवनमें गया। काम्यकवनमें इसको बृहदश्व ऋषिने नलका इतिहास कहा और अक्ष-विद्या सिखाई । फिर युधिष्ठिर तीर्थ-यात्रा करने लगा । इस तीर्थ यात्रामें बृहदश्वऋषि युधिष्ठिरके साथ रहा । ऋषिने इसे अनेक तीर्थोंका इतिहास कहा। पांडव जब काम्यकवनमें थे तब कृष्ण इनसे मिलने आये थे । यहीं युधिष्ठिर मार्कंडेय ऋषिसे मिला। मार्कंडेय ऋषिने युधिष्ठिरको परलोकके विषयमें जानकारी दी। अज्ञातवासमें यह कंक नामसे विराट राजाके घर रहा । यह विराटराजाके साथ जूआ खेलता था । इस समय युधिष्ठिरका गुप्तनाम "जय" था। जब युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ विराटके राज्यमें था तब विराट पर त्रिगर्तके सुशर्माने आक्रमण कर दिया। लड़ाईमें सुशर्मा जीता और विराट हारा। सुशर्माने विराटको बंदी बनाया। तब युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीम सुशर्माको जीत कर बंदी बनाके ले आया । एक बार क्रोधमें आकर विराटने अपने आश्रित कंककी नाक पर पांसा मारा और नाकसे जो खून बहने लगा वह द्रौपदीने पोंछा । इस घटनाके दो ही दिन बाद पांडव प्रकट हुए । उस समय विराट राजाने पुनः पुनः पांडवोंकी क्षमा मांगी ।

पांडवोंके प्रकट होते ही द्रुपदराजाके पुरोहितको संधान के लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा गया । द्रुपद-पुरोहितने पांडवोंकी मांग धृतराष्ट्रके सम्मुख रखी। भीष्म, द्रोण, विदुरने उसका समर्थन किया । धृतराष्ट्रने भी "धृतराष्ट्र पांडवोंका सख्य चाहता है।" ऐसा संदेश देकर पुरोहितको लौटा दिया। इसके बाद कृष्ण संधानके लिये आया। कृष्णका प्रयत्न भी व्यर्थ गया। तब कृष्णने कहा "युधिष्ठिरने कहा है आधे राज्यके स्थान पर (१) अविस्थल (२) वृकस्थल (३) माकंदी (४) वारणावत (५) कोई भी एक ग्राम और दें" किंतु दुर्योधनने "बिना युद्धके सुईके नोकके बराबरकी भी भूमि न दूंगा !" कह कर कृष्णको लोटा दिया। इससे संधान व्यर्थ गया और कुरुक्षेत्रपर हिरण्यवती नदीके किनारे खाइयां खोदकर युद्धकी तैयारियां होने लगीं।

युद्धके समय कौरव सेनाको देख कर इसको बड़ा दुःख हुआ । क्यों कि दोनों सेनामें सभी इसके बंधु-जन थे । अज, अभिमन्यु, अर्जुन, उत्तमौजा, उत्तर, काशिक, काश्य, कुंतिभोज, कैकेय-पांचबंधु-क्षत्रदेव, क्षत्रधर्मन्, घटोत्कच, चंद्रसेन, चित्रायुध, चेकितान, जयंत, अमितौजस, सत्यजित, द्रुपद, द्रौपदीके पांच पुत्र, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, नील, पांचाल, पांड्य, पुरुजित, भोज, मदिराश्व, युधामन्यु, वसुदान, वार्षक्षेमी, विराट, व्याघ्रदत्त, शंख, शिखंडिन्, श्रेणिमत्, सत्यजित्, सात्यकी, सुकुमार, सूर्यवर्च, सेनबिंदु, आदि प्रधान अधीरथी महारथी थे । इसमें विराट और द्रुपद वृद्ध थे । ये दो वृद्ध-द्रुपद और विराट-तथा धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, शिखंडिन्, सहदेव, और सात्यकी ये सात पांडव सेनाके सेनापति थे । इन सेनापतियोंके आधीन एक एक अक्षौहिणी सेना थी।

और कौरवोंमें, अलंबुष, अनुविंद, अकंडुल, अश्वत्थामन्, उग्रायुध, कर्ण, कृतवर्मा, कृप, जयद्रथ, जरासंध, त्रिगर्त, दंडधर, दुर्योधन, दुश्शासन, द्रोण, नील, पौरव, बाह्लीक, बृहद्वल, भगदत्त, भीष्म, भूरिश्रवा, लक्ष्मण, विंद, वृषक, शकुनि, शल्य, सत्यश्रवस, सुदक्षिण, दुर्योधनकी ज्ञानेश्वरी ३४