भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 981, कुल 1172 में से

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ओरसे लड़नेवाले अतिथिमहारथी थे। इनमें भीष्म, द्रोण, और कृप ये तीन आचार्य सबसे अधिक वृद्ध थे। इनके अक्षौहिणी पति कृप, द्रोण, शल्य, जयद्रथ, सुदक्षिण, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शकुनि, बाह्लीक, ऐसे ग्यारह थे। युद्धके समय युधिष्ठिरने भीष्म द्रोण आदिसे आशीर्वाद लिये। इस युद्धके कौरवोंके प्रथम सेनापति भीष्म थे, भीष्मके बाद द्रोण, द्रोणके बाद कर्ण, कर्णके बाद शल्य, फिर स्वयं दुर्योधन !! दुर्योधनने द्रोणसे "युधिष्ठिरको सजीव बंदी बना देनेका" वर मांगा। द्रोणने "अर्जुनकी अनुपस्थितिमें" ऐसे करनेका वचन दिया। युधिष्ठिरको पुनः द्यूतका निमंत्रण देकर दुर्योधन पुनः वनवासका शर्त रखना चाहता था। यह सुनते ही अर्जुनने "द्रोणकी यह प्रतिज्ञा निष्फल करूंगा !" ऐसी प्रतिज्ञा की। युद्धमें द्रोणने युधिष्ठिरको विरथ भी किया किंतु युधिष्ठिर द्रोणके हाथ नहीं आया। आगे युधिष्ठिरके "अश्वत्थामा हतः" ऐसे असत्य-वचन कहनेसे द्रोणका वध हुआ। सेनापति बनते ही कर्णने इसको अत्यंत त्रस्त किया। इससे यह बडा उद्विग्न हुआ। किंतु, अर्जुनने कर्ण-वधकी प्रतिज्ञा करने पर यह शांत हुआ। अर्जुनने बिना विलंब कर्ण-वध किया भी। कर्णका प्रेत देखकर गांधारीने कहा है "इसके भयसे युधिष्ठिरको नींद नहीं आती थी !!" युद्धकी समाप्ति के बाद रातको अश्वत्थामाने जो महान् हत्याकांड किया इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ। तथा सभी कौरवोंकी अंतिम-क्रिया करते समय, जब इसको मालूम हुआ कि कर्ण इसका बडा भाई था तब अत्यंत दुःखी हुआ। उसी समय दुःखावेगमें यह अपना राज्यादि सब कुछ छोड़कर चले जानेको तैयार हो गया था किंतु दूसरे भाइयोंके समझा बुझानेपर शांत हुआ। भारत-युद्धमें जो विनाश हुआ इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ था। तब इसको मार्कंडेय ऋषिने प्रयाग-यात्राका उपदेश दिया। कृष्णने इसका राज्याभिषेक किया। भीम युवराज बना। अर्जुन सेनापति बना। राज्या- भिषेकके तुरंत बाद यह प्रयागराज जाकर आया। भीष्मने इसको राजनीतिका उपदेश दिया। बृहस्पतिसे इसे आध्यात्मिक ज्ञान मिला। बंधुवधके प्रायश्चित्तके रूपमें इसने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञमें व्यास आचार्य बने थे। बकदाल्भ्य ब्रह्मा थे। वामदेव, याज्ञवल्क्य, पैल, आदि सोलह ऋषि ऋत्विज थे। इस यज्ञके बाद, धृतराष्ट्र वनवासके लिये चला गया। जाते समय धृतराष्ट्रने इसको धर्मोपदेश दिया। विदुरके निर्वाणके समय यह उसके पास था। अंतमें यह परीक्षितिको राज्याभिषेक करके स्वर्गारोहणके लिये चल दिया। रास्तेमें प्रथम द्रौपदी, फिर सहदेव, नकुल, अर्जुन, भीम इसके सामने गिरे। अंतमें यह जब स्वर्गद्वारमें पहुंचा तब इसके साथ एक कुत्ता था। इसने स्वर्ग-द्वारमें पहुंचनेके बाद "साथके कुत्तेको छोड़कर स्वर्गमें प्रवेश पाना अस्वीकार किया !" तब कुत्तेके साथ यह स्वर्गमें गया। इसका धनुष्य महेंद्र। शंख अनंत विजय। नक्षत्रोंसह अर्धचंद्र इसका स्वर्ण-ध्वज। इसके ध्वजपर नंद उपनंद नामके दो यंत्रचालित मृदंग थे। यह अपनी आयुके सोलहवे सालमें सर्व-प्रथम हस्तिनापुर आया। वहां तेरह साल रहा। इसके बाद छः महीने जतुगृह,-लाक्षागृह-छ महीने एकचक्रपुर, एक वर्ष द्रुपदगृह, पांच वर्ष युवराजके रूपमें दुर्योधनके साथ, तेवीस वर्ष इंद्रप्रस्थका राज्य, तेरह वर्ष वनवास अज्ञातवास, तथा युद्धके बाद इसने छत्तीस वर्ष राज्य किया। ३५ परिशिष्ट १

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