ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 982, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीता अ० १. श्लो० १६-नकुल- पांच पांडवोंमें चौथा, माद्रीका पुत्र । नकुल और सहदेव जुड़वा भाई थे । इसका जन्म शतशृंग पर्वत पर हुआ । इसकी शिक्षा दीक्षा कृप और द्रोणाचार्यके पास हुई । इसकी दो पत्नियां थीं । एक द्रौपदी और दूसरी शिशुपालकी कन्या रेणुमति । राजसूय यज्ञमें इसने पश्चिम दिशाका विजय किया था । इसने रोहितक पर्वतपर मत्तकयूरोंसे युद्ध करके उनको जीत लिया । इसके बाद मरुभूमि, बहुधान्यक; शैरीषक; तथा महेश्य ये देश जीत लिये । आक्रोश नामके राजऋषीको पराजित किया । आगे चल कर इसने दशार्ण, शिबि, त्रिगर्त, अंबष्ठ, मालव, कर्पट, मध्यकेक्य आदि राज्योंको जीता । फिर, पुष्कर बनजातियां, उत्सवसंकेतगण, सिंधुतीरके ग्रामगण, सरस्वती तीरके मत्स्याहारी, शूद्र, आभीर, पंचनद, अमर पर्वत, दिव्यकटपूर, द्वारपाल, रामठ, राहूगण, मद्रदेशके शाकल गण, यादव आदिसे अपनी सत्ता स्वीकार कराली ! फिर समुद्र किनारेकी पह्लव, बर्बर, यवन, शक आदि जातियों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर एक हजार ऊंटो पर इन देशोंसे अनेक प्रकारकी संपत्ति लेकर इंद्रप्रस्थमें आया । जब यह विराटनगरमें अज्ञातवासमें था तब इसका गुप्तनाम "जयत्सेन" था तथा व्यवहारके लिये वामग्रंथिक कहलाता था । यह अश्व-विद्यामें कुशल था । घोड़ोंकी बीमारी अच्छी करना, उनकी बुरी आदतें बदलना, उनको अपने काबूमें लाना इन सब बातोंमें यह अत्यंत कुशल था । विराटने इसको अपनी अश्वशालाका प्रमुख बनाया था। जब कृष्ण संधानके लिये कौरवोंके पास जाने लगा तब इसने "संधान होकर युद्ध टलेगा इसकी संभावना मानकर वैसा प्रयत्न करना चाहिए" ऐसा अपना मत दिया था । युद्ध प्रारंभ होनेके बाद, नकुलने दुर्योधनसे युद्ध किया । युद्धमें दुर्योधनके दाहिने जाकर इसने उस पर सैकड़ों बाण छोड़े । दुर्योधनने इसका असह्य अपमान मानकर नकुलके दाहिने जानेका प्रयास किया । किंतु नकुलने ऐसे होने नहीं दिया । इतना ही नहीं दुर्योधनसे "खडा रहो वहां !" "कहाँ जाता है !" कहते हुए उसका उपहास किया । किंतु कर्णके सामने इसकी एक भी नहीं चली । कुंतीको दिया गया वचन स्मरणकर कर्णने इसे जाने दिया । नहीं तो कर्ण इसे मार सकता था । कर्णसे पराजित हो कर, यह युद्धभूमि छोड चला गया । युधिष्ठिरके अश्वमेधमें भी यह दक्षिण दिग्विजयके लिये गया था । अंतमें स्वर्गारोहणके समय, उत्तरमें हिमालयके बाद, बालुका सागरमें चलते समय थक कर यह मर गया । नकुलके पतन पर अर्जुनने युधिष्ठिरसे पूछा "नकुल बीचमें क्यों पड़ा ?" युधिष्ठिरने तब कहा था "इसे अपने सौंदर्यका अभिमान था। अपनी मृत्युके समय इसकी आयु १०५ वर्ष थी । इसको द्रौपदीसे शतानीक और रेणुमतीसे निरमित्र ऐसे दो पुत्र थे । इसका शंख सुघोष । गीता अ० १. श्लो० १६-सहदेव- अंतिम पांडव । माद्रीके जुड़वे बच्चोंमें छोटा । इसका जन्म भी शतश्रृंग पर्वत पर हुआ था । द्रोणसे यह शस्त्रविद्या सीखा। इसकी चार पत्नियां थीं। द्रौपदी, यादवकन्या विजया, भानुकी लडकी भानुमती, तथा जरासंधकी पुत्री । -ज्ञानेश्वरी १९