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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

मृत्युके समय कृष्णकी आयु १०१ (?) वर्षकी थी। यह अर्जुनसे तीन महीने बड़े थे। अर्जुनसे पहले इनकी मृत्यु हुई। यादव युद्धके बाद कृष्ण एक पीपलके पेड़के नीचे अपने दाहिने घुटनों पर बायां पैर रख कर जब चिंतन मग्न हो पड़े थे तब जरा नामके व्याधने-एकलव्य-पुत्र ? पक्षी मानकर इसी पैरमें बाण मारा। इसी बाणसे कृष्णकी इह लीला समाप्त हुई। इनके इस महा निर्वाणके बाद द्वारका डूब गयी। गीता अ० १. श्लो० १६-युधिष्ठिर— पांडुराजका ज्येष्ठ पुत्र। माताका नाम कुंती। मृगयामें हुई एक घटनासे दुःखी हो कर पांडुराजा वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करके कुंती और माद्रीके साथ वनमें रहने लगा। इसी अवस्थामें युधिष्ठिरका जन्म हुआ। इसका जन्मस्थान शतशृंग पर्वतका वन था। इसका पहला शस्त्र गृह शस्त्र शर्याती पुत्र शुक्र। प्रथम उसीके पास यह शस्त्र और शास्त्र सीखा। हस्तिनापुरमें आनेके बाद कृप और द्रोण इसके आचार्य बने। यह तोमर-विद्यामें प्रवीण था। हस्तिनापुर आनेके बाद धृतराष्ट्रने इसको युवराज्याभिषेक कराया। इससे दुर्योधन युधिष्ठिरसे जलने लगा। दुर्योधनने पांडवोंके विरुद्ध षड्यंत्र रचनाप्रारंभ कर दिया। सर्व प्रथम दुर्योधनने पांडव और कुंतीको लाक्षागृहमें जलाकर मार डालनेका प्रयास किया। विदुरकी सहायतासे यह वहांसे मां और भाइयोंके साथ बचकर निकला। लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद ब्राह्मण-वेषमें यह अपने भाइयोंके साथ द्रौपदी स्वयंवरमें प्रकट हुआ। द्रौपदी स्वयंवरके बाद द्रुपद राजाने बड़े वैभवके साथ इसे हस्तिनापुर पहुंचाया। वहांकी प्रजाने भी इसका हार्दिक स्वागत किया। यह सब देखकर धृतराष्ट्रने आधा राज देकर इसको अलग कर दिया। युधिष्ठिरने भी इंद्रप्रस्थको राजधानी बनाकर राज्य करना प्रारंभ किया। नारदने इसको राजनीति शास्त्र सिखाया। इंद्र, वरुण, यम, कुबेर आदिकी राज्यव्यवस्था समझायी। तथा राजसूय- यज्ञ करनेको कहा। इसके राजसूय यज्ञमें स्वयं वेदव्यास ब्रह्मा थे। सुसामन् सामग था। याज्ञवल्क्य अध्वर्यु था। इस यज्ञके ऋत्विजोंमें पौम्य, धौम्य, आदि ऋषियोंकी लंबी सूची मिलती है। इसी यज्ञमें भीष्मपितामहकी आज्ञासे युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको अग्रपूजाका मान दिया था। यह देखकर कौरवोंने युधिष्ठिरका विरोध किया। दूसरी बात, युधिष्ठिरके इस यज्ञमें दुर्योधन कोषाध्यक्ष था। यज्ञमें दुर्योधनकी ओरसे अनापशनाप खर्च करने पर भी, जब राजकोश रीता नहीं हुआ तब दुर्योधन पांडवोंको दारिद्र्यमें लोटानेका उपाय ढूंढने लगा। एक बार शकुनी मामा ने इससे कहा "पांडवोंको दरिद्री बनानेके दोही साधन हैं। एक युद्ध और दूसरा द्यूत।" इसीसे द्यूतक्रीड़ाकी योजना बनी। धृतराष्ट्रने विदुरके द्वारा युधिष्ठिरको द्यूतके लिये निमंत्रण भेजा। दुर्योधनकी ओरसे शकुनी युधिष्ठिरसे जूआ खेला। युधिष्ठिर हारता गया। अंतमें सर्वस्व खोनेके बाद इसने दुर्योधनकी प्रेरणासे द्रौपदीको दांवपर लगाया और उसमें भी हार गया। इसके साथ ही पांडवोंको बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास भोगना था। इस अज्ञातवासमें पकड़े जानेपर "पुनः बारह वर्ष वनवास" ऐसी भी शर्त थी। युधिष्ठिर जब अपने भाइयोंके साथ वनवासके लिये निकला तब इसकी प्रजा भी शोकाकुल हो कर वनवास जानेके लिये तैयार हो गयी थी। बहुत ही समझा बुझा कर उसको राज्यमें रहनेके ३३ परिशिष्ट १.

लिये तैयार करना पड़ा । फिर भी पुरोहित धौम्य आदि कुछ उसके साथ गये थे। वनवासमें किर्मीर राक्षस इसका रास्ता रोक कर भीमसे मारा गया। द्रौपदी और भीमने प्रह्लाद और बलीका अनुकरण करके दुर्योधनको मारकर राज्य लेनेकी बात कही थी किंतु युधिष्ठिरने इसका अस्वीकार किया। द्वैतवनमें यह व्याससे प्रति-स्मृति विद्या सीखा। व्यासने इससे वनमें एक ही स्थान पर न रह कर भ्रमण करनेको कहा। व्यासकी आज्ञासे युधिष्ठिर द्वैतवनसे काम्यकवनमें गया। काम्यकवनमें इसको बृहदश्व ऋषिने नलका इतिहास कहा और अक्ष-विद्या सिखाई । फिर युधिष्ठिर तीर्थ-यात्रा करने लगा । इस तीर्थ यात्रामें बृहदश्वऋषि युधिष्ठिरके साथ रहा । ऋषिने इसे अनेक तीर्थोंका इतिहास कहा। पांडव जब काम्यकवनमें थे तब कृष्ण इनसे मिलने आये थे । यहीं युधिष्ठिर मार्कंडेय ऋषिसे मिला। मार्कंडेय ऋषिने युधिष्ठिरको परलोकके विषयमें जानकारी दी। अज्ञातवासमें यह कंक नामसे विराट राजाके घर रहा । यह विराटराजाके साथ जूआ खेलता था । इस समय युधिष्ठिरका गुप्तनाम "जय" था। जब युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ विराटके राज्यमें था तब विराट पर त्रिगर्तके सुशर्माने आक्रमण कर दिया। लड़ाईमें सुशर्मा जीता और विराट हारा। सुशर्माने विराटको बंदी बनाया। तब युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीम सुशर्माको जीत कर बंदी बनाके ले आया । एक बार क्रोधमें आकर विराटने अपने आश्रित कंककी नाक पर पांसा मारा और नाकसे जो खून बहने लगा वह द्रौपदीने पोंछा । इस घटनाके दो ही दिन बाद पांडव प्रकट हुए । उस समय विराट राजाने पुनः पुनः पांडवोंकी क्षमा मांगी ।

पांडवोंके प्रकट होते ही द्रुपदराजाके पुरोहितको संधान के लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा गया । द्रुपद-पुरोहितने पांडवोंकी मांग धृतराष्ट्रके सम्मुख रखी। भीष्म, द्रोण, विदुरने उसका समर्थन किया । धृतराष्ट्रने भी "धृतराष्ट्र पांडवोंका सख्य चाहता है।" ऐसा संदेश देकर पुरोहितको लौटा दिया। इसके बाद कृष्ण संधानके लिये आया। कृष्णका प्रयत्न भी व्यर्थ गया। तब कृष्णने कहा "युधिष्ठिरने कहा है आधे राज्यके स्थान पर (१) अविस्थल (२) वृकस्थल (३) माकंदी (४) वारणावत (५) कोई भी एक ग्राम और दें" किंतु दुर्योधनने "बिना युद्धके सुईके नोकके बराबरकी भी भूमि न दूंगा !" कह कर कृष्णको लोटा दिया। इससे संधान व्यर्थ गया और कुरुक्षेत्रपर हिरण्यवती नदीके किनारे खाइयां खोदकर युद्धकी तैयारियां होने लगीं।

युद्धके समय कौरव सेनाको देख कर इसको बड़ा दुःख हुआ । क्यों कि दोनों सेनामें सभी इसके बंधु-जन थे । अज, अभिमन्यु, अर्जुन, उत्तमौजा, उत्तर, काशिक, काश्य, कुंतिभोज, कैकेय-पांचबंधु-क्षत्रदेव, क्षत्रधर्मन्, घटोत्कच, चंद्रसेन, चित्रायुध, चेकितान, जयंत, अमितौजस, सत्यजित, द्रुपद, द्रौपदीके पांच पुत्र, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, नील, पांचाल, पांड्य, पुरुजित, भोज, मदिराश्व, युधामन्यु, वसुदान, वार्षक्षेमी, विराट, व्याघ्रदत्त, शंख, शिखंडिन्, श्रेणिमत्, सत्यजित्, सात्यकी, सुकुमार, सूर्यवर्च, सेनबिंदु, आदि प्रधान अधीरथी महारथी थे । इसमें विराट और द्रुपद वृद्ध थे । ये दो वृद्ध-द्रुपद और विराट-तथा धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, शिखंडिन्, सहदेव, और सात्यकी ये सात पांडव सेनाके सेनापति थे । इन सेनापतियोंके आधीन एक एक अक्षौहिणी सेना थी।

और कौरवोंमें, अलंबुष, अनुविंद, अकंडुल, अश्वत्थामन्, उग्रायुध, कर्ण, कृतवर्मा, कृप, जयद्रथ, जरासंध, त्रिगर्त, दंडधर, दुर्योधन, दुश्शासन, द्रोण, नील, पौरव, बाह्लीक, बृहद्वल, भगदत्त, भीष्म, भूरिश्रवा, लक्ष्मण, विंद, वृषक, शकुनि, शल्य, सत्यश्रवस, सुदक्षिण, दुर्योधनकी ज्ञानेश्वरी ३४

ओरसे लड़नेवाले अतिथिमहारथी थे। इनमें भीष्म, द्रोण, और कृप ये तीन आचार्य सबसे अधिक वृद्ध थे। इनके अक्षौहिणी पति कृप, द्रोण, शल्य, जयद्रथ, सुदक्षिण, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शकुनि, बाह्लीक, ऐसे ग्यारह थे। युद्धके समय युधिष्ठिरने भीष्म द्रोण आदिसे आशीर्वाद लिये। इस युद्धके कौरवोंके प्रथम सेनापति भीष्म थे, भीष्मके बाद द्रोण, द्रोणके बाद कर्ण, कर्णके बाद शल्य, फिर स्वयं दुर्योधन !! दुर्योधनने द्रोणसे "युधिष्ठिरको सजीव बंदी बना देनेका" वर मांगा। द्रोणने "अर्जुनकी अनुपस्थितिमें" ऐसे करनेका वचन दिया। युधिष्ठिरको पुनः द्यूतका निमंत्रण देकर दुर्योधन पुनः वनवासका शर्त रखना चाहता था। यह सुनते ही अर्जुनने "द्रोणकी यह प्रतिज्ञा निष्फल करूंगा !" ऐसी प्रतिज्ञा की। युद्धमें द्रोणने युधिष्ठिरको विरथ भी किया किंतु युधिष्ठिर द्रोणके हाथ नहीं आया। आगे युधिष्ठिरके "अश्वत्थामा हतः" ऐसे असत्य-वचन कहनेसे द्रोणका वध हुआ। सेनापति बनते ही कर्णने इसको अत्यंत त्रस्त किया। इससे यह बडा उद्विग्न हुआ। किंतु, अर्जुनने कर्ण-वधकी प्रतिज्ञा करने पर यह शांत हुआ। अर्जुनने बिना विलंब कर्ण-वध किया भी। कर्णका प्रेत देखकर गांधारीने कहा है "इसके भयसे युधिष्ठिरको नींद नहीं आती थी !!" युद्धकी समाप्ति के बाद रातको अश्वत्थामाने जो महान् हत्याकांड किया इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ। तथा सभी कौरवोंकी अंतिम-क्रिया करते समय, जब इसको मालूम हुआ कि कर्ण इसका बडा भाई था तब अत्यंत दुःखी हुआ। उसी समय दुःखावेगमें यह अपना राज्यादि सब कुछ छोड़कर चले जानेको तैयार हो गया था किंतु दूसरे भाइयोंके समझा बुझानेपर शांत हुआ। भारत-युद्धमें जो विनाश हुआ इससे यह अत्यंत दुःखी हुआ था। तब इसको मार्कंडेय ऋषिने प्रयाग-यात्राका उपदेश दिया। कृष्णने इसका राज्याभिषेक किया। भीम युवराज बना। अर्जुन सेनापति बना। राज्या- भिषेकके तुरंत बाद यह प्रयागराज जाकर आया। भीष्मने इसको राजनीतिका उपदेश दिया। बृहस्पतिसे इसे आध्यात्मिक ज्ञान मिला। बंधुवधके प्रायश्चित्तके रूपमें इसने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञमें व्यास आचार्य बने थे। बकदाल्भ्य ब्रह्मा थे। वामदेव, याज्ञवल्क्य, पैल, आदि सोलह ऋषि ऋत्विज थे। इस यज्ञके बाद, धृतराष्ट्र वनवासके लिये चला गया। जाते समय धृतराष्ट्रने इसको धर्मोपदेश दिया। विदुरके निर्वाणके समय यह उसके पास था। अंतमें यह परीक्षितिको राज्याभिषेक करके स्वर्गारोहणके लिये चल दिया। रास्तेमें प्रथम द्रौपदी, फिर सहदेव, नकुल, अर्जुन, भीम इसके सामने गिरे। अंतमें यह जब स्वर्गद्वारमें पहुंचा तब इसके साथ एक कुत्ता था। इसने स्वर्ग-द्वारमें पहुंचनेके बाद "साथके कुत्तेको छोड़कर स्वर्गमें प्रवेश पाना अस्वीकार किया !" तब कुत्तेके साथ यह स्वर्गमें गया। इसका धनुष्य महेंद्र। शंख अनंत विजय। नक्षत्रोंसह अर्धचंद्र इसका स्वर्ण-ध्वज। इसके ध्वजपर नंद उपनंद नामके दो यंत्रचालित मृदंग थे। यह अपनी आयुके सोलहवे सालमें सर्व-प्रथम हस्तिनापुर आया। वहां तेरह साल रहा। इसके बाद छः महीने जतुगृह,-लाक्षागृह-छ महीने एकचक्रपुर, एक वर्ष द्रुपदगृह, पांच वर्ष युवराजके रूपमें दुर्योधनके साथ, तेवीस वर्ष इंद्रप्रस्थका राज्य, तेरह वर्ष वनवास अज्ञातवास, तथा युद्धके बाद इसने छत्तीस वर्ष राज्य किया। ३५ परिशिष्ट १

गीता अ० १. श्लो० १६-नकुल- पांच पांडवोंमें चौथा, माद्रीका पुत्र । नकुल और सहदेव जुड़वा भाई थे । इसका जन्म शतशृंग पर्वत पर हुआ । इसकी शिक्षा दीक्षा कृप और द्रोणाचार्यके पास हुई । इसकी दो पत्नियां थीं । एक द्रौपदी और दूसरी शिशुपालकी कन्या रेणुमति । राजसूय यज्ञमें इसने पश्चिम दिशाका विजय किया था । इसने रोहितक पर्वतपर मत्तकयूरोंसे युद्ध करके उनको जीत लिया । इसके बाद मरुभूमि, बहुधान्यक; शैरीषक; तथा महेश्य ये देश जीत लिये । आक्रोश नामके राजऋषीको पराजित किया । आगे चल कर इसने दशार्ण, शिबि, त्रिगर्त, अंबष्ठ, मालव, कर्पट, मध्यकेक्य आदि राज्योंको जीता । फिर, पुष्कर बनजातियां, उत्सवसंकेतगण, सिंधुतीरके ग्रामगण, सरस्वती तीरके मत्स्याहारी, शूद्र, आभीर, पंचनद, अमर पर्वत, दिव्यकटपूर, द्वारपाल, रामठ, राहूगण, मद्रदेशके शाकल गण, यादव आदिसे अपनी सत्ता स्वीकार कराली ! फिर समुद्र किनारेकी पह्लव, बर्बर, यवन, शक आदि जातियों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर एक हजार ऊंटो पर इन देशोंसे अनेक प्रकारकी संपत्ति लेकर इंद्रप्रस्थमें आया । जब यह विराटनगरमें अज्ञातवासमें था तब इसका गुप्तनाम "जयत्सेन" था तथा व्यवहारके लिये वामग्रंथिक कहलाता था । यह अश्व-विद्यामें कुशल था । घोड़ोंकी बीमारी अच्छी करना, उनकी बुरी आदतें बदलना, उनको अपने काबूमें लाना इन सब बातोंमें यह अत्यंत कुशल था । विराटने इसको अपनी अश्वशालाका प्रमुख बनाया था। जब कृष्ण संधानके लिये कौरवोंके पास जाने लगा तब इसने "संधान होकर युद्ध टलेगा इसकी संभावना मानकर वैसा प्रयत्न करना चाहिए" ऐसा अपना मत दिया था । युद्ध प्रारंभ होनेके बाद, नकुलने दुर्योधनसे युद्ध किया । युद्धमें दुर्योधनके दाहिने जाकर इसने उस पर सैकड़ों बाण छोड़े । दुर्योधनने इसका असह्य अपमान मानकर नकुलके दाहिने जानेका प्रयास किया । किंतु नकुलने ऐसे होने नहीं दिया । इतना ही नहीं दुर्योधनसे "खडा रहो वहां !" "कहाँ जाता है !" कहते हुए उसका उपहास किया । किंतु कर्णके सामने इसकी एक भी नहीं चली । कुंतीको दिया गया वचन स्मरणकर कर्णने इसे जाने दिया । नहीं तो कर्ण इसे मार सकता था । कर्णसे पराजित हो कर, यह युद्धभूमि छोड चला गया । युधिष्ठिरके अश्वमेधमें भी यह दक्षिण दिग्विजयके लिये गया था । अंतमें स्वर्गारोहणके समय, उत्तरमें हिमालयके बाद, बालुका सागरमें चलते समय थक कर यह मर गया । नकुलके पतन पर अर्जुनने युधिष्ठिरसे पूछा "नकुल बीचमें क्यों पड़ा ?" युधिष्ठिरने तब कहा था "इसे अपने सौंदर्यका अभिमान था। अपनी मृत्युके समय इसकी आयु १०५ वर्ष थी । इसको द्रौपदीसे शतानीक और रेणुमतीसे निरमित्र ऐसे दो पुत्र थे । इसका शंख सुघोष । गीता अ० १. श्लो० १६-सहदेव- अंतिम पांडव । माद्रीके जुड़वे बच्चोंमें छोटा । इसका जन्म भी शतश्रृंग पर्वत पर हुआ था । द्रोणसे यह शस्त्रविद्या सीखा। इसकी चार पत्नियां थीं। द्रौपदी, यादवकन्या विजया, भानुकी लडकी भानुमती, तथा जरासंधकी पुत्री । -ज्ञानेश्वरी १९

द्रौपदी स्वयंवरके समय जो लड़ाई हुई उस समय इसने दुःशासनको पराजित किया था । राजसूय-यज्ञके समय यह दक्षिण-विजयके लिये निकला था । इसने प्रथम मत्स्यराजको जीता । करूषदेशके दंतवक्रको जीत कर उससे उससे राजस्व ले लिया । उसके बाद पश्चिम मल्ल, सुमित्रराज, चोरदेश, निषादभूमि, श्रेणिगिरि, गोश्रृंग, और श्रेणिमान राजाओंको पराजित करके उनसे राजस्व ले लिया । कुंतिभोजने सहदेवका स्वागत करके युधिष्ठिरकी सत्ता माननेकी घोषणा की क्यों कि उसके मनमें पांडवोंके प्रति प्रेम था । चर्मण्वतीके तीर पर जंभकासुरके पुत्रसे घोर युद्ध करके उसको पराजित किया । यहांसे सहदेवको अगणित संपत्ति मिली । वहांसे नर्मदाके किनारे अवंतिकापति विंद अनुविंदोंसे लड़कर उनको पराजित किया । उनसे राजस्व लेकर भोजकट और भीष्मकोंसे युद्ध करके उनको जीता । आगे कोशल, वेण्यातीर, कांतारमें घुसकर कांतारक, प्राक्कोसल, नारकेय, हेरंबक आदि राजाओंको युद्धमें जीतकर उन सबसे बड़ा राजस्व ले लिया । दक्षिणमें आगे बढ़ते बढ़ते यह, मारुध, रम्यग्राम, नाचीन, अनधुंक, वनाधिप, पुलिंद, पांड्य आदि राजाओंको जीतता जीतता यह किष्किंधाकी गुफा तक आया था । वहां मैद और द्विविद नामके वानर राजाओंसे इनको सात दिन तक युद्ध करना पड़ा । अंतमें वानर राजाओंने सहदेवको राजस्व देकर युधिष्ठिरके यज्ञमें सहायक होना स्वीकार किया । इस युद्धमें जब नील सहदेवकी सेना जला देने लगा तब इसको अपने पराभवका ज्ञान हुआ । सहदेवने तब अग्नि-स्तवनसे उस अग्निको शांत किया और नीलने युधिष्ठिरको राजस्व देना स्वीकार किया । आगे सहदेवने त्रैपुरको स्वाधीन किया । पौरवेश्वरको जीता । फिर सुराष्ट्रक कौशिकाचार्य आहूति, रुक्मिन, भीष्मक, आदि राजाओंसे राजस्व लेकर शूर्पारक, तालकट, दंडक, म्लेंच्छ, निषाद, पुरुषाय, कर्णप्रावरण, कालमुख, कोलगिरि, सुरभिपट्टण, ताम्रद्वीप, आदि १५-२० देशोंको जीतकर यह इंद्रप्रस्थ आया । इसने दूतके रूपमें घटोत्कचको लंका भेजकर साम द्वारा विभीषणसे भी युधिष्ठिरके राजसूयके लिये राजस्व-धन प्राप्त किया था । द्यूतमें हारकर वनवास जाते समय कौरवोंकी ओरसे उपहास किया जानेपर धृतराष्ट्रके सम्मुख इसने शकुनीके वधकी प्रतिज्ञा की थी । यह भी अज्ञातवासमें तंतिपालके नामसे विराटकी अश्वशालामें काम करता था । द्रोणाचार्य पर आक्रमण करते समय यह कर्णसे पराजित हुआ । इसने अपनी प्रतिज्ञानुसार शकुनीका वध किया । स्वर्गारोहणके समय इसकी आयु १०५ की थी । इसके दो पुत्र थे । द्रौपदीसे श्रुतसेन । विजयासे सुहोत्र । यह उत्तम रथी था । सभी प्रकारकी शस्त्र-विद्यामें दक्ष था । खङ्ग-युद्धमें विशेष दक्ष था । इसके ध्वजपर हंसका चिन्ह था । इसके धनुष्यका नाम अश्विन । शंख मणिपुष्पक । ॐ १७ परिशिष्ट १ -

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परिशिष्ट दूसरा गीताके चौथे अध्यायमें कर्म-योगकी परंपरा बताते समय कुछ राजाओंका नाम आया है। इस परिशिष्टमें उनका कुछ जीवन परिचय है।

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परिशिष्ट दूसरा पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय । मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ गीता अ० ४. श्लो० १- विवस्वत—गीतामें सूर्यके लिये विवस्वत शब्द आया है । ऋग्वेदमें इसको अश्विनी तथा यमका पिता कहा गया है । कहीं कहीं सभी देव विवस्वतके संतान होनेकी बात भी कही गयी है । इसके विषयमें कहा गया है "यह आयु बढाता है ।" "यह आरोग्य देता है !" "यही विश्व निर्माण करनेवाला है !" "यह देवोंका पुरोहित है !" ऋग्वेदके अनेक वर्णन सूर्य बिंबका वर्णन करनेवाले हैं । किंतु यहां विशेष रूपमें, मानवोचित वर्णन ही दिये गये हैं । ऋग्वेदमें कहा गया है "इसके कारण जगत जीता है !" अग्निको विवस्वतका दूत कहा गया है । आदित्य, सूर्य, विवस्वत्, पूषन्, अर्यमन्, आदि सूर्यके ही भिन्न भिन्न रूप माने गये हैं। देव भी सूर्योदयके समय इसकी प्रार्थना करके कहते हैं "हम निष्पाप हैं यह सभी देवोंसे कहो !" इसकी तीन पत्नियां हैं । त्वष्टाकी पुत्री संज्ञा रैवतकी पुत्री राज्ञी और प्रभा । कहीं कहीं इनकी पत्नियोंके नाममें द्यौ, राज्ञी, पृथ्वी, निक्षुभा ऐसे नाम भी आते हैं । विवस्वत्से संज्ञाको तीन पुत्र हुए । (१) श्रुति सवस्ः सावर्णिमनु (२) श्रुतिकर्मन्ः शनि (३) तपती-यमुना । मत्स्यपुराणमें अश्विनी कुमार और विष्णुको सूर्यका पुत्र माना गया है और प्रभासे प्रभात, राज्ञीसे रेवत ये विवस्वत्के पुत्र हैं । इनमें यम और यमी-यमुना, तथा अश्विनी कुमार जुड़वे बच्चे हैं । और एक मत ऐसा है कि विवस्वतकी पत्नी संज्ञा-द्यौः उसकी छाया निक्षुभा पृथ्वी और इनकी संतति जल और धान्य-वनस्पति-है । गरमीके दिनोंमें सूर्य पानी खींच लेता है और वर्षाके रूपमें वह पृथ्वी पर बरसाता है इस लिये वह जगत्पिता है । यह ब्राह्मण ग्रंथोंका कहना है । वह इतना अधिक तेजस्वी था कि जिससे विश्व जलने लगा तब इसके तेजसे विष्णुने सुदर्शनचक्र, शंकरने अपना त्रिशूल, अष्टवसु देव (१) ध्रुव (२) घोर (३) सोम (४) आप (५) नल (६) अनिल (७) प्रत्यूष (८) प्रभास, कार्तिकेयकी शक्ति, कुबेरकी पालकी आदिका निर्माण किया गया । तब कहीं इसका तेज कुछ सहने योग्य हुआ । .४१ परिशिष्ट २ (4)

इसके १४०० किरणे हैं। चंद्र नक्षत्र आदि इसीसे बने हैं। मनु—सावर्ण मनु अथवा वैवस्वत मनु। विवस्वतका पुत्र। ऋग्वेदमें दो बार इसका वर्णन आया है। यह अत्यंत उदार था। इसने जो दक्षिणा दी उसकी अत्यंत प्रशंसा की गयी है। यह विवस्वतकी पत्नी संज्ञाका पुत्र है। इसको वैवस्वतमत्त मनु भी कहा गया है। इसको मानव-जातिका पिता माना गया है। पुराणोंमें जितने वंश कहे गये हैं उन सब वंशोंका मूल पुरुष यह है। इसे "पहला यज्ञकर्ता" कहा गया है। यदु, तुर्वसु वंशके राजाओंने इसको अनेक उपहार दिये थे। वैवस्वत मनु राजा था। प्रलयके समय मत्स्यने मनुका संरक्षण किया था, मत्स्य-पुराणमें विस्तार पूर्वक इसका तथा इसके तपका सुंदर वर्णन किया गया है। अलग अलग पुराणोंमें इसके अलग अलग नाम मिलते हैं। भागवतमें इसको द्रविड़ाधिपति कहा गया है। यज्ञ-कर्मसे इसका वैभव बढ़ता गया। वसिष्ठको इसने ब्रह्मविद्या सिखाई, इससे वसिष्ठ ब्रह्मनिष्ठ बना। यह धर्म-नियमोंका प्रवर्तक था। इसी मनुको भारतीय धर्म-शास्त्रका मूलपुरुष माना जाता है। "बड़े बड़े ऋषियोंने इसके पास आकर धर्म-संबंधी अपने प्रश्न पूछे। अपनी समस्याएं इसके सामने रखीं। इसने उन सबका उत्तर दिया और उन उन ऋषियोंने अपने शिष्य प्रशिष्योंको यह विद्या दी," ऐसा उल्लेख मिलता है। मेक्समुलर जैसे आधुनिक विद्वान भी यह मानते हैं "मूल मानव-धर्म सूत्रोंके आधारसे आजकी मनुस्मृति लिखी गयी है।" वैवस्वत मनु अपने समयका अत्यंत विद्वान राजा था। विद्वानोंकी ऐसी मान्यता है कि संभव है जब मनुस्मृतिकी रचना हुई होगी तब वैवस्वत मनुके नाम पर पर्याप्त साहित्य उपलब्ध रहा होगा। वैदिक विद्वानोंकी यह भी मान्यता है कि उपलब्ध मनुस्मृतिको देख कर लगता है कि वह बुद्धोत्तर रचना है। आद्य शंकराचार्यने मनुस्मृतिको मान्यता दी है। ई० स० ५७१ में लिखे गये एक शिलालेखमें "मनुस्मृतिके आदेशानुसार शासन करने वाले एक राजा" का उल्लेख है। ई० स ५०० से भी पहले जो श्री शबर स्वामी हो गये उन्होंने उपलब्ध मनुस्मृतिका उल्लेख किया है। वैसे ही ई० स० दूसरी सदीके कुछ लेखकोंने मनुके विचारोंको ग्राह्य माना है! इससे ऐसे लगता है "मनुके प्राचीन धर्मशास्त्रमें, समय समय पर कुछ वृद्धि होती गयी है ! संभव है कि तीसरी सदीसे पूर्व ही इसमें ऐसी वृद्धि होना प्रारंभ हुवा हो !!" सामान्यतः विद्वानोंकी ऐसी राय है कि "ई० स० पू० १००-४०० से ई० स० २०० तक यह स्मृति बनी होगी।" इक्ष्वाकु—वैवस्वत मनुके दस पुत्रोंमें एक। सबसे ज्येष्ठ पुत्र। एक राजकुलका प्रथम पुरुष। मनुने इक्ष्वाकुको दंडनीति सिखाई। "दंडसे प्रजा पालन करना किंतु अकारण दंडका प्रयोग नहीं करना!" यह इस नीतिका सार है। इक्ष्वाकु वंशका कुलगुरु वसिष्ठ। इक्ष्वाकु अयोध्याका पहला राजा। इक्ष्वाकु वंशमें इक्ष्वाकुसे कुरुयुद्धके समय राज्य करनेवाले बृहद्वल तक ८८ पीढियां हो चुकी थीं। कुछका मत ९१ है। इस कुलमें दिलीप, रघु, सगर, भगीरथ हरिश्चंद्र, राम आदि अनेक महापुरुष हो गये हैं। इसलिये सभी पुराणोंमें इस वंशके विषयमें कुछ न कुछ जानकारी मिलती है। ॐ ज्ञानेश्वरी ४२

परिशिष्ट तीसरा गीताके दसवे अध्यायमें भगवानने अपने ७५ विभूतियां कहीं हैं । उनमेंसे कुछ समझमें नहीं आनसे छोड दी हैं । जिसके विषयमें जो जानकारी मिली वह यहां दी है ।

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परिशिष्ट तीसरा गीता अ० १०, श्लो० २१-आदित्योंमें महाविष्णु— आदित्य १२ हैं। आदित्यका अर्थ है सूर्य। सूर्यके १२ नाम हैं। ये नाम भिन्न भिन्न हैं। सूर्य-नमस्कारके लिये (१) मित्र (२) रवि (३) सूर्य (४) भानु (५) खग (६) पूषा (७) हिरण्यगर्भ (८) मरीचि (९) आदित्य (१०) सविता (११) अर्क (१२) भास्कर हैं। किंतु द्वादशादित्योंमें (१) धाता (२) मित्र (३) अर्यमा (४) शुक्र (५) वरुण (६) अंशु (७) भग (८) विवस्वान् (९) पूषा (१०) सविता (११) त्वष्टा (१२) विष्णु हैं। विष्णु—ऋग्वेदमें "विष्णुने तीन पगमें त्रिलोक जीत लिया" ऐसा वर्णन आया है। ऋग्वेदमें "सब दो लोक जानते हैं तो ये तीन लोक जानता है। सब पर इसकी कृपा रहती है। यह सबका उत्पादक और आधार है। यह सदैव सबको संकट-मुक्त करता है। पृथ्वी जीव- मात्रको रहने योग्य हो इसीलिये इसने तीन पगसे इसका आक्रमण किया" आदि वर्णन है। उपनिषदोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन देखनेको मिलता है। ॐकारमें "उ" विष्णु-निदर्शक मात्रा है यह "नृसिंहोत्तरतापिनी"में कहा गया है। यह आदित्योंमें प्रमुख है। वैष्णव पुराणोंमें विष्णु-तत्त्वको आख्यान रूपसे समझाया गया है। इसके दस अवतार माने गये हैं। विष्णु-तत्त्वको सर्व-सामान्य लोगोंको समझानेके लिये पुराणोंमें आख्यान रूपसे-कथा कहानियोंके रूपमें-बहुत कुछ कहा गया है। भारतमें गीताकी भांति "विष्णु सहस्र नाम" स्तोत्र महत्त्वका है। महाभारत, हरिवंश, भागवत, ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, आदि पुराणोंमें विष्णुके आख्यान हैं। गीता अ० १०, श्लो० २१-सूर्य मैं ज्योतिमानमें— द्युतः प्रकाशना इस धातुसे ज्योतिष प्रकाशनेवाले ऐसा शब्द बना है। प्रकाशनेवालेमें रवि-अंशुमान सूर्य। गीता अ० १०, श्लो० २१-मरीचि मुख्य वायुमें— मरुद्गण देवताओंका संघ है। ये ७-७ के टुकड़ियोंमें रहते हैं। ४५ परिशिष्ट ३ ०

पहले गणमें ( १ ) चित्रज्योतिस् ( २ ) चैत्य ( ३ ) ज्योतिष्मान् ( ४ ) शक्रज्योति ( ५ ) सत्य ( ६ ) सत्यज्योतिस् ( ७ ) सुतपस् । दूसरे गणमें-( १ ) अमित्र ( २ ) ऋतजित् ( ३ ) सत्यजित् ( ४ ) सुतमित्र ( ५ ) सुरमित्र ( ६ ) सुषेण ( ७ ) सेनजित् । तीसरे गणमें-( १ ) उग्र ( २ ) धनद ( ३ ) धातु ( ४ ) भीम ( ५ ) वरुण । और दो नाम नहीं मिले । चौथे गणमें-( १ ) अभियुक्तशिक्र ( २ ) साह्य । और नाम नहीं मिले । पांचवे गणमें-( १ ) अन्यादृश ( २ ) ईंदृश ( ३ ) तुम ( ४ ) मित ( ५ ) वृक्ष ( ६ ) समित् ( ७ ) सरित् । छठे गणमें-( १ ) ईदृश् ( २ ) नाभ्यादृश् ( ३ ) पुरुष ( ४ ) प्रतिहर्त्तृ ( ५ ) समचेतन ( ६ ) समवृत्ति ( ७ ) संमिति । सातवे गणके-नाम नहीं मिले । प्रत्येक गणमें सात मरुत् होने चाहिए । किंतु कुछ नाम नहीं मिलते । पहला गण पृथ्वीसे मेघ तक, दूसरा मेघसे सूर्य तक, तीसरा सूर्यसे सोमके निम्न भाग तक, चौथा सोमके ऊपर नक्षत्रों तक, पांचवा नक्षत्रोंके ऊपरसे ग्रहों तक, छठा ग्रहोंके ऊपरसे ऋषियों तक, सातवा ऋषियोंसे ध्रुव तक भ्रमण करते हैं । इनके अधिकार स्थान पृथ्वी, सूर्य, सोम, ज्योतिर्गण, ग्रह, सप्त ऋषि मंडल, ध्रुव है । इनका रथ हरिण खींचते हैं । ये जब वेगसे दौडते हैं तब पर्वत कांपते हैं। वृक्ष जड-मूलसे उखड पडते हैं । सारा विश्व डांवाडोल होता है । इनके हाथमें धनुष्य बाण और भाला होता है । वज्र और सोनेकी कुल्हाडी होती है । ये इंद्रके मित्र हैं । वर्षा गिराना इनका मुख्य कार्य है ये कुल ४९ हैं । वेदादिका सारा वर्णन देखनेसे लगता है कि आंधी बवंडर आदिका इनसे गहरा संबंध है । इनका पिता रुद्र और माता पृश्नी है । कहीं कहीं ये दिति और कश्यपके पुत्र माने गये हैं । पुराणोंमें इन्हे "वायुके सात प्रवाहोंमें संचार करनेवाले दिति-पुत्र" कहा गया है । इन सात प्रकारके वायुमंडलोंकी ( १ ) आवह-पृथ्वीसे मेघमंडल तक (२) प्रवह - मेघ- मंडलसे सूर्यमंडल तक ( ३ ) उद्वह - चंद्र और सूर्यमंडल तक ( ४ ) संवह - चंद्रमंडलसे नक्षत्र- मंडल तक ( ५ ) विवह - नक्षत्रमंडलोंमें- ( ६ ) परिवह - शनिमंडलसे सप्तऋषि मंडल तक ( ७ ) परावह - ऋषिमंडलसे ध्रुव तक कार्य सीमा है । मरीचि - विशेष जानकारी नहीं मिली । गीता अ० १०, श्लो० २१-नक्षत्रोंमें शशांक मैं- आकाशके पूर्व-पश्चिम परिवर्त्तमें जो तारा पुंज झिलमिलाता है उन्हे नक्षत्र कहते हैं । पाणिनीने "जो क्षति नहीं होता" उसे नक्षत्र कहा है। वेदोंमें नक्षत्रोंकी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष चर्चा है । कहीं कहीं क्षीरसागरके मंथनके समय चंद्रोत्पत्ति होते हुए जो सागर तुषार उछले या छलके उससे नक्षत्र बने ऐसा काव्यमय वर्णन है । तो कहीं नक्षत्रोंको सूर्यकी चिनगारी माना गया है । ज्ञानेश्वरी ५३

इन नक्षत्रोंमें २७ विशिष्ट नक्षत्रोंका उल्लेख है जिनका ज्योतिष-शास्त्रमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन नक्षत्रोंमें मृग नक्षत्रका स्वामी चंद्र है। शशांक—पौराणिक आख्यानोंके अनुसार यह समुद्र-मंथनसे उत्पन्न हुआ। इसको सोम भी कहा गया है। नक्षत्रोंको चंद्रकी पत्नियां कहा गया है। इन सत्ताईस स्त्रियोंमेंसे रोहिणी पर इसका विशेष प्रेम था। इस ईर्ष्यासे अन्य स्त्रियोंने प्रजापतिसे शिकायत की। प्रजापतिने क्षयरोगी होनेका शाप देकर पुनः वृद्धि होनेका उद्धशाप दिया। इससे प्रति मास क्षय पक्ष और वृद्धि पक्ष माने जाने लगे। चंद्रके विषयमें अन्यान्य पुराणोंमें अनेक कथायें हैं। चंद्रको "आह्लाद देनेवाला" कहा जाता है। क्यों कि चंद्र शब्द "चदि" आह्लाद दायक धातुसे बना है। ज्योतिष शास्त्रमें यह ग्रह है। यह पृथ्वीका उपग्रह माना जाता है। यह पृथ्वीसे २३९००० मील पर है। इसकी परिधि २१६० मील है। २७ दिन, ७ घंटे, ४३ मिनिट १४ सेकंडमें यह पृथ्वी प्रदक्षिणा करता है। यह पर प्रकाशित है। सूर्यके प्रकाशसे चमकता है। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है "चंद्र किरण वास्तवमें सूर्य किरण ही हैं।" अमावास्याके दिन सूर्य और चंद्र पृथ्वीकी एक ही ओर आते हैं। ऋग्वेदके पुरुष सूक्तमें "चंद्रमा विराट पुरुषके मनसे हुआ" ऐसा कहा गया है। कुछ प्राचीन ग्रंथोंमें चंद्रमाको "पानीका पुष्प" अथवा "पानीसे बना हुआ" कहा गया है। भारतीय धर्म ग्रंथोंमें अनेक प्रकारसे चंद्र-लोककी कल्पना की गयी है। गीताके आठवे अध्यायके पच्चीसवे श्लोकमें भी दक्षिणायनकी रातके समय मृत्यु पानेवाला चंद्र-लोक जा कर पुनः जन्म पाता है ऐसा कहा गया है। उपनिषदोंमें भी यह कल्पना है। प्राचीन भारतीय साहित्यमें "चंद्र सोमरस है।" "चंद्रमा प्राण है" "चंद्रमा मन है" "चंद्रमा प्रजापति है!" "चंद्रमा मनुष्य लोक है!" "चंद्रमा अन्न है!" ऐसा वर्णन मिलता है। इस प्रकार चंद्रमाका पृथ्वीके साथ घनिष्ठ तम संबंध बताया गया है। फल ज्योतिषमें चंद्रमाको चंचल, मनका प्रतीक माना गया है। गीता अ० १०, श्लो० २२-मैं सामवेद वेदोंमें— वेद-वेद भारतके ही नहीं विश्वके प्राचीनतम ग्रंथ हैं। वेद काव्य हैं। धर्म-ग्रंथ हैं। प्रेरणा ग्रंथ हैं। वेद भारतीयोंका जीवन सूत्र है। वेद भारतीय जन-जीवनका मूल स्रोत है। वैदिक वाङ्मय विपुल है। जितनां है उससे अधिक नष्ट हुआ है। वैदिक वाङ्मयके चार विभाग हैं। (१) जो श्रुति कहाते हैं वे हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वणवेद। श्रुतिका अर्थ सुनकर पाठकुंठ-किया हुआ। बडोंसे सुना और कंठ कर रखा गया, वह श्रुति। ऋग्वेद-ऋग्वेदमें- जो आज उपलब्ध है- १० मंडल, ८ अष्टक प्रत्येक अष्टकमें ८ अध्यायके अनुसार ६४ अध्याय, उनके २०७ वर्ग और परिशिष्टके साथ १०२८ सूक्त हैं। इन सूक्तोंमें १०५७० ऋचाएं हैं। इन्हें मंत्र कहते हैं। इन मंत्रोंमें १,५३,८२८ शब्द और पूर्ण उच्चार होनेवाले ४,३२,००० अक्षर हैं। ऋग्वेद-आज जो भाग उपलब्ध हैं उसको शाकलशाखा कहते हैं। ३७ परिशिष्ट ३

प्रत्येक वेदके ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषद् ऐसे अलग अलग भाग हैं। ब्राह्मण वेदका कर्मकांड है। इसमें यज्ञ-यागादि विधि-विधान कैसे करना चाहिए इसका सविस्तर और सूक्ष्माति- सूक्ष्म, विवरण है और आरण्यक उपासना कांड है। इसमें आध्यात्मिक चिंतनका विवेचन है। और उपनिषद् इस विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको जाननेका प्रयासरूप ज्ञानकांड है। ऋग्वेदके ऐसे ५ ब्राह्मण ९ आरण्यक और ४ उपनिषद हैं। ऋग्वेदका रचनाकाल विद्वानोंके अनुसार ६००० से ८००० वर्ष प्राचीन है। यजुर्वेद-यजुर्वेद यज्ञ संबंधि अधिक है। यजन विषयक ज्ञान-यजुर्वेद है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन कालमें इसकी १२२ शाखायें थीं। "यजन पद्धतिके भिन्नताके कारण ही ये शाखायें हुईं" ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। आज, यजुर्वेदकी पांच संहिताएँ उपलब्ध हैं। (१) काठक- संहिता (२) कठ-संहिता (३) मैत्रायणी-संहिता (४) तैत्तिरीय-संहिता (५) वाजसेनीय- संहिता। वाजसेनीय संहिताकी काण्व और माध्यंदिन ऐसी दो शाखाएं हैं। तैत्तिरीय संहिताको कृष्णयजुर्वेद कहते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेदका उपवेद माना जाता है। यजुर्वेद गद्य पद्यात्मक है। यजुर्वेदके दो ब्राह्मण, दो आरण्यक, और ७ उपनिषद हैं। प्रसिद्ध ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदका अंतिम ४० वां अध्याय है। सामवेद-प्राचीन ग्रंथोंको देखनेसे ऐसा लगताहै कि प्राचीन-कालमें इसकी अनेक संहितायें थीं। अब केवल एक ही संहिता उपलब्ध है। पुनरुक्ति छोड़ दी जाय तो उसमें १५४९ ऋचायें हैं। इनमेंसे ७५ को छोड़ कर अन्य सभी ऋचाएं ऋग्वेदमें आई हैं। सामवेद-का अर्थ गानेका वेद ! विद्वानोंका ऐसा एक मत है कि भारतीय संगीतका प्रारंभ सामवेदसे हुवा है। यज्ञादिमें वेद गानेवालोंको उद्गाता कहनेकी परिपाठी थी। वैसे सामका प्रस्ताव-प्रारंभ-प्रस्तोता करता है। इसका मुख्य भाग-उद्गीथ-उद्गाता गाता है। और प्रतिहर्ता उसकी समाप्ति करता है। प्रत्येक ऋचा पर अनेक प्रकारके साम स्वर होते हैं। इन स्वरोंको यदि वर्तमान भाषामें 'स्वरलिपि' कहा जाय तो संभवतः अत्युक्ति नहीं होगी। सामवेदमें अनेक छंद हैं। पुरानी पोथियोंको देखनेसे पता चलता है कि सामवेदकी कई शाखाएँ थीं। किंतु आज केवल दो शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ३६ प्रकार आज उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ८ प्रकार हैं। इन्हे (१) जटा (२) माला (३) शिखा (४) रेखा (५) ध्वज (६) दंड (७) रथ (८) घन ऐसे कहते हैं। संभव है कि गीता-कालमें सामवेद सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रहा हो। तभी भगवानने वेदोंमें साम वेद मैं ऐसे कहा। अथर्ववेद-यह सामान्य लोगोंका वेद है। इसमें उतनी उदात्तता नहीं जितनी ऋग्वेदादिमें है। इसमें अभिचार-मंत्र और अभिचार विधि भी है। इसका प्राचीन नाम अथवांगिरस ऐसा है। इसका अर्थ है अंगिरस-वंशीय अथर्वा-ऋषिका कहा हुवा है। इसका और एक नाम भृग्वंगिरस भी है। भृगु ऋषि अंगिरस ऋषिके शिष्य थे। अथर्ववेदके प्रचारमें इन भृगु ऋषियोंका बडा महत्व है। साथ साथ अथर्ववेदको क्षात्र-वेद कहनेकी भी परिपाठी है। अथर्व वेदमें यज्ञोपयुक्त भाग अत्यंत अल्प है। अथर्व-वेदको पुरोहितोंका वेद भी कहते हैं। पहले अथर्ववेदके अध्ययन किये ज्ञानेश्वरी ४५

हुए ब्राह्मणको ही पुरोहित बनानेका नियम था । प्राचीन पोथियोंमें लिखा है "जिस राज्यमें अथर्ववेत्ता रहता है उस राज्यमें सभी उपद्रव शांत होते हैं।" राजनीति और युद्धोंमें ऐसे पुरोहितोंका बड़ा महत्त्व रहता था । अथर्व-वेदमें "राजकर्माणि" ऐसा एक बड़ा सूक्तसंग्रह है। इन सबका कर्माधिकार राजपुरोहितका होता है। इस वेदकी नौ शाखाएँ आज उपलब्ध हैं। अथर्व-वेदमें २० कांड और करीब ६००० मंत्र हैं । अलग अलग शाखाओंकी मंत्र-संख्या अलग अलग है। इसका एक बड़ा अंश ऋग्वेदसे लिया गया है। यह अग्नि उपासकोंका वेद ? है। इसमें आयुर्वेदके बीज भी देखनेको मिलते हैं। इसमें कुछ रोग और उसकी चिकित्साका विधान है। इसमें राष्ट्रीयता, सेना, शस्त्रास्त्र, सेना संचालन आदिका भी विवेचन है। साथ साथ कृषि गोपालन आदिका भी वर्णन या नियमादि हैं । अथर्व-वेदका एक ब्राह्मण और तीन उपनिषद हैं। आयुर्वेद, सर्पवेद, पिशाचवदे, असुरवदे आदि इसके उपवेद माने गये हैं । गीता अ० १०, श्लो० २२-देवों में देवराज मैं- देवराज-इंद्र ऋग्वेदका प्रधान देवता है। ऋग्वेदमें इंद्र पर सबसे अधिक सूक्त हैं। इंद्रके तीन रूप हैं । आकाशस्थ इंद्र देवता । शरीरस्थ इंद्र बुद्धि । इंद्रका मानवी रूप-सामाजिक-राजा । वैदिक ऋषियोंका यह राष्ट्रीय देवता है । इंद्र दस्युओंका शत्रु है। इंद्रका जन्म-वेदमें इंद्रके माता-पिताका पर्याप्त वर्णन होने पर भी उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। एक स्थान पर इंद्रके पिताका नाम "द्यु" मान कर माताका नाम "पृथ्वी" कहा है । एक स्थान पर इंद्र-जन्मके विषयमें अलंकारिक भाषामें कहा गया है । कहीं कहीं "बवंडर आया और जन्म हुवा !" ऐसे कहा गया है। जहां आकाशको इंद्रका पिता कहा गया है वहीं इंद्रके जन्मके साथ आकाश कांप उठनेका उल्लेख है। इंद्रके क्रोधसे आकाश कांप उठता है । पृथ्वी कांप उठती है । एक मंत्रमें कहा गया है "इंद्र अपने माता-पिताकी पर्वाह नहीं करता ।" "वह अपने माता-पिताको त्रस्त करता है।" बवंडरके समय भी तो पृथ्वी और आकाश त्रस्त होते हैं ! संभवतः इसीका यह वर्णन है। सभी ऋचाओंका सर्व-सामान्य अर्थ लिया तो बवंडरका सुंदर और भीकर वर्णन देखनेको मिलता है । इंद्र-जन्मका जितना अधिक अध्ययन किया जाय उतना वह अधिक दुर्बोध होता जाता है । एक स्थान पर इंद्रका मानवी स्वरूप देखनेको मिलता है। "इंद्रके जन्म-समयमें उसके चारों ओर चार दासियां एकत्र हुईं !" "इंद्रने जन्मते ही सोमपान किया !" "देवियोंने उसको पालनेमें झुला झुला कर उसके पराक्रमको जगाया !" एक स्थान पर इंद्र स्वयं कहता है "मेरे पिताने मुझे अशत्रु निर्माण किया।" "एक वीर-पत्नीके गर्भसे एक वीर पुत्रका जन्म हुवा" इंद्र सोमपानसे मत्त होकर झूमता हुवा बड़बड़ाता जाता है। फिर भी वेदके गहरे अध्ययन करनेवाले कहते हैं कि इंद्र बवंडरकी देवता है। इंद्रके शत्रुगण-इंद्रके साथ लड़नेवाले सबके सब "वर्षा चुराने वाले" हैं । (१) अर्बुद-एक मंत्रमें कहा गया है । "तूने उस गंदे अर्बुदको कुचल डाला ।" अर्बुदके पहाड़ोंसे ४९ परिशिष्ट ३

गायोंको मुक्त किया।” (२) अहि-अहिका अर्थ दैत्य अथवा सर्प है। अनेक विद्वानोंने अहिको वृत्र कहा है जो इंद्रका सबसे बड़ा शत्रु है। (३) श्वघ्न-दो तीन बार इसका वर्णन आया है। कहा गया है “इंद्रने इसका निवासस्थान उध्वस्त किया।” “इंद्रने सूर्यको उदय होनेको कह कर इस लोभीका संहार किया।” (४) इलीविश-केवल एक बार इसका उल्लेख है। “इंद्रने इसको धूलमें मिला दिया।” इसको “पानीको रोकनेवाला” कहा है। (५) कांरज-यह सदैव वृत्रके साथ रहता है। इंद्रने इसका दो बार पराजय किया। (६) कुयव-यह शब्द विशेषण बनकर कई बार आया है। कुछ विद्वानोंने इसका अर्थ “बुरा बोलनेवाला” ऐसा किया है। तो कुछ विद्वानोंने इसका अस्वीकार किया है। (७) निमुचि-पाणिनीने इसका अर्थ वर्षा न होने देने वाला ऐसा किया है। इंद्रने इसका सिर उड़ाया था। (८) नववास्त्व-कई बार इस का नाम आया है। “जिसका वसति-स्थान नया वह” एक स्थान पर इसका उल्लेख “बृहद्रथ” इस नामसे आया है। इंद्रने इसके रथ और इसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। (९) पणि-सदैव यह गायोंको भगाकर छिपा देता है। अथर्वन् अंगीरसकी प्रेरणासे इंद्रने इसको मारा। (१०) विमृ-इसको “कानून तोड़नेवाला” कहा गया है। साथ साथ यह विशालकाय है। शुष्ण और शंबरके साथ लड़ने आता है। इंद्रने इसको मारा है। (१०) वर्षिन्-यह सदैव शंबरके साथ है। इसके साथ इसकी एक खास सेना है। इसको भी इंद्रने मारा है। (११) वल-वलका अर्थ गुफा है। यह सदैव गुफामें रहता है। इंद्रने इसको तोड़कर पणीका संहार किया। एक स्थान पर “बृहस्पतिने वलका स्थान दिखाया” ऐसा उल्लेख है। (१२) शंबर-वाजसेनीय संहितामें इसको दैत्याधिपति कहा गया है। वेदमें इसको दास कहा गया है। इसको कौलीत्तर अथवा कुलत्तरका लड़का कहा गया है। पाश्चात्य विद्वानोंका मत है कि यह किसी आर्येतर जाति-कुलका नाम होगा। इंद्रने “दूसरे राक्षसके साथ शंबरका वध किया” है। “शंबर पर्वत पर रहता है चाहे वह पृथ्वी पर रहता हो अथवा अंतरिक्षमें बादलों पर रहता हो !” एक स्थान पर लिखा गया है “शंबर अपनेको देव मानता था !” पर्वतों पर इस शंबरके १०० किले थे। इसका अंतिम किला रातको गिरा। शंबरको मारनेके लिये इंद्रको ४० वर्ष लगे। इतने दिन तक इंद्र शंबरको खोजता रहा। कई विद्वानोंने इसका ऐसे अर्थ किया “४० वर्ष तक बवंडर चलता रहा।” वस्तुतः शंबरका मुख्य शत्रु दिवोदास है। दिवोदास इंद्रका भक्त है। अश्विनीने इस काममें सहायता की है। १३ शुष्ण, १४ स्वर्भानु आदि ४० इंद्र-शत्रुओंका नाम मिलता है जिन्हें इंद्रने मारा है। वैदिक ऋषि पुनः पुनः प्रार्थना करके इंद्रको “पराक्रम करनेकी प्रेरणा” देते हैं। इंद्रसे लड़नेवाले सभी “वर्षाको रोकते हैं गायको छिपा देते हैं!” इंद्रसे जब जो युद्ध हो कर इंद्र शत्रुको मारता है तब “सदैव उषा और सूर्य आकाशमें प्रस्थापित होते हैं!” विद्वानोंकी यह मान्यता है “वातावरणके नैसर्गिक संघर्षको मानवी-युद्धका रूप देकर अवकर्षणायदि राष्ट्रीय आपत्तियोंको दूर करनेवाले इंद्रको राष्ट्र-पुरुष मानकर आर्योंने राष्ट्रीय भावनाका उदय और पोषण किया है।” इससे “राष्ट्र-हितके लिये अपना जीवन उत्सर्ग करनेका भाव भर दिया है।” “वृत्र” इंद्रका महान् शत्रु है। इंद्र-वृत्र-युद्ध मानो सृष्टि चमत्कारोंका सुंदर सजीव वर्णन माना जाता है। इसमें ऋषियोंकी काव्य-प्रतिभाका सजीव दर्शन होता है। (१) वृत्र गायोंको भगाने (२) सूर्यको छिपाने (३) सूर्योदय रोकने (४) वर्षाको रोकनेका “पराक्रम” करता है। वृत्र वराह-भक्षी है। शीघ्रगामी है। त्रसका वर्णन बादलोंके आकारोंका वर्णन है। मत्र कुहरेमें छिपकर बैठ जाता है।

  • ज्ञानेश्वरी ५०

कुहेरेको लपेट कर आक्रमण करता है। गडगडाहटसे इंद्रको डरानेका प्रयास करता है। इससे देव भाग जाते हैं किंतु इंद्र अपना स्थान नहीं छोड़ता। इंद्रके वज्र प्रहारसे विश्व कांप उठा। वृत्र मर गया। ऊपरका वर्णन इंद्रका स्वरूप समझनेके लिये पर्याप्त है। इंद्र आर्योंके आत्म-विश्वासकी जीती जागती मूर्ति है। इंद्रके पराक्रमका फल प्रकाश है। इंद्रके युद्धारंभ सदैव अंधकारमें होते हैं। तमावरणमें वह शत्रुको मारता है। उसके बाद आकाशमें उषा और सूर्यकी प्रस्थापना होती है ! इस लिये “ इंद्र शिवः सखा” है। वैदिक ऋषि उससे “न्याय, सामर्थ्य, तेज, दिगंतकीर्ति, और ऐश्वर्य” मांगते हैं। इंद्र भी कहता है “मैंने ही यह भूमि आर्योंको दी है।” इसलिये वह आर्योंका राष्ट्र- पुरुष है। इस पर १९९ सूक्त हैं। ऊपर वैदिक इंद्रका वर्णन है। पुराणोंमें प्रत्येक मन्वंतरोंमें एक इंद्र होता है। सौ यज्ञ सांग करनेवाला इंद्र-पद पाता है। प्रजा-संरक्षण इसका मुख्य कार्य है। असुरोंमेंसे हिरण्य-कश्यपु, प्रल्हाद, और बलि इन तीनोंने इंद्र-पद प्राप्त किया है। इससे इंद्र-पदकी राजनैतिक स्थितिका बोध होता है। त्रिशंकु, वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, रोहित, गौतम, गृत्समद, भारद्वाज, सोम, इंदुल, अर्जुन आदिके जीवनमेंसे भी इंद्र-पदका राजनैतिक रूप स्पष्ट होता है। इंद्र कश्यप और अदितिका पुत्र। देवोंका राजा। वर्षाका देव। इंद्र-पद प्राप्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञ नष्ट करना तपोभंग करना इसका काम। हिरण्यपुत्र महाशलिने इसको जीता है। वरुणने इसको बंधन-मुक्त किया। ऐरावत, कल्पवृक्ष, अमृत आदि पर इसका स्वामित्व। गरुडने एक बार इससे लडकर अमृत ले लिया। फिर गरुडके कहनेसे इंद्रने चालाकीसे यह पुनः पालिया। नहुष-मानव-भी एकबार इंद्र बना था! पुराणोंमें इंद्र प्रथम-स्थानका देवता नहीं है। यह अंतरिक्षमें पूर्व दिशाका स्वामी है। इंद्रने कई बार कई लोगोंसे मार खाई है। कई लोगोंके शापसे भ्रस्त हुआ है। इसका निवासस्थान स्वर्ग। अमरावती इसकी राजधानी। इसका राजप्रासाद वैजयंत। बाग नंदनवन। वाहन ऐरावत। हत्यार वज्र। घोडा उच्चैः श्रवा। रथ विमान। सारथी मातली। धनुष्य शक्र। तलवार परंज। गीता अ० १०, श्लो० २२-मन हूं मैं इंद्रियोंमें- अपने अपने विषयोंको ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है। त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिव्हा, घ्राण, ये पांच ज्ञानेंद्रिय हैं। इनके विषय हैं स्पर्श, रूप, शब्द, रस, गंध। बिना इंद्रियोंके अन्य किसी साधनसे विषयोंका ज्ञान होना असंभव है। इन्ही इंद्रियोंसे शीतोष्ण सुख दुःखादिका बोध होता है। इंद्रिय शरीरसे संयुक्त अतींद्रिय और ज्ञानका कारण है। इन पांच ज्ञानेंद्रियोंको बहिरिंद्रियां कहते हुए मनको अंतरिंद्रिय कहा गया है। मनको अणुपरिमाण और हृदयके भीतर रहनेवाला अर्थात् अंतःकरण कहा गया है। बाह्य पांच ज्ञानेंद्रियोंके साथ पांच कर्मेंद्रियां भी होती हैं। हाथ, पैर, गुदा, शिश्न, और वाचा ये पांच कर्मेंद्रिय हैं। ये पांच अपना अपना कर्म करती हैं। इन पांच ज्ञानेंद्रिय और पांच कर्मेंद्रियों पर मनका स्वामित्व है। ये इंद्रिय मनुष्यको बाह्य विषयोंका ज्ञान कर देती हैं। बाह्य कर्म करती हैं किंतु अंतर्विषयको ज्ञानके लिये आंतरिक कर्मके लिये इनकी आवश्यकता नहीं होती। अंतःकरण या मनके द्वारा आंतरिक ज्ञान सुख दुःखादि होता है। वेदांतियोंके मतानुसार वह दर्पणके समान होता है। ५१ परिशिष्ट ३

सांख्यमतके अनुसार इंद्रिय ग्यारह हैं। पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रिय, एक मन। मन इंद्रियोंसे अलग न माननेसे इंद्रियोंमें मन कहा गया है। गीता अ० १०, श्लो० २२-चेतना भूत मात्रमें- जो कुछ चराचर पदार्थ है उसमें जो स्मृति, बोध, सुख, या संज्ञा है, वह चेतना है। प्रकृतिमें जो कुछ है उसमें जो तत्त्व है, जिस तत्वसे जिस किसीका अस्तित्व है वह चेतना है। चेतना अथवा चैतन्यका केवल अस्तित्व है। आकार प्रकार रंग रूप नहीं। केवल एक बोध है, जो इंद्रियातीत है, उसको दिखा नहीं सकते। बता नहीं सकते। कह नहीं सकते। जिसमेंसे "मैं" का स्फुरण होता है "मैं" का बोध होता है और स्मृति रहती है, वह चेतना है। वह चैतन्य सर्व-व्यापी है। भूतमात्रोंमें है। गीता अ० १०, श्लो० २३-रुद्रोंमें मैं सदाशिव- रुद्र-एक वैदिक देवता। ऋग्वेदमें इस पर तीन सूक्त हैं। वेदका रुद्र बडा शक्तिशाली, पराक्रमी, शत्रुओंको मारनेवाला है। वह अत्यंत भयप्रद है। जटाधारी है। बलिष्ठोंमें बलिष्ठ है। वज्रबाहु है। चिर-तरुण है। त्रिशूल इसका आयुध है। यह त्रिनेत्र है। इसका पेट काला और पीठ लाल है। इसका धनुष्य शक्तिशाली होता है। ऋग्वेदमें इसको क्रूर कहा है। यह संहारक है। ज्वर पैदा करनेवाला है। रुद्र रोग हरणमें कुशल है। श्रेष्ठ वैद्य है। देवोंसे भी रक्षा करनेके लिये ऋषि इससे प्रार्थना करते हैं। ऋग्वेदके रुद्र-सूक्त देखनेसे "सदैव प्रेम-वर्षा करनेवाली माँकी लाल आंखें देख कर- "माँ ! आंख मत दिखा, प्यार कर" कहनेवाले बालकका दर्शन होता है। किंतु पौराणिक रुद्र कश्यप और सुरभिके पुत्र हैं। अलग अलग पुराणोंमें इनके विषयमें अलग अलग बातें हैं। रुद्र ग्यारह हैं। इनको एकादश रुद्र कहा जाता है। इनके नामके विषयमें भी एक-वाक्यता नहीं है। अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग नाम हैं। महाभारतके आदि पर्वमें : (१) मृगव्याध (२) सर्प (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य (६) पिनाकी (७) दहन (८) ईश्वर (९) कपाली (१०) स्थाणु (११) भव ऐसे नाम दिये हैं। किंतु महाभारतके शांति पर्वमें (१) अजैकपाद (२) अहिर्बुध्न्य, (३) विरूपाक्ष (४) रैवत (५) हर (६) बहुरूप (७) त्र्यंबक (८) सुरेश्वर (९) सावित्र (१०) जयंत्य (११) पिनाकी है। किंतु ये नाम प्रसिद्ध हैं। (१) भूतेश (२) नीलरुद्र (३) कपाली (४) वृषवाहन (५) त्र्यंबक (६) महाकाल (७) भैरव (८) मृत्युंजय (९) कामेश (१०) योगेश (११) शंकर। शंकर-कश्यप और दनुका पुत्र। कैलासवासी, त्रिनेत्र। दक्षने इसे अपनी कन्या दी थी। दक्ष यज्ञमें इसने दक्षका संहार किया। समुद्रमंथनसे जो हलाहल विष निर्माण हुआ उसको इसने लोक-कल्याणार्थ पी लिया। इससे इसका गला नीला हो गया। इसीलिये इसको नीलकंठ कहते हैं। हालाहल विषके तापसे बचनेके लिये इसने जटामें चंद्र धारण किया। इस शंकरको शिव भी कहते हैं। शिवकी उपासना करनेवाले शैव। भारतीय संस्कृतिमें शैव-दर्शनका अत्यंत महत्त्वका स्थान है। अनेक पुराणोंमें शंकरकी कथाएँ हैं अथवा अनेक शैव-पुराण हैं। यह सदैव देवोंकी ओरसे दैत्योंसे लडने आया है ! ज्ञानेश्वरी ५२