भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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हुए ब्राह्मणको ही पुरोहित बनानेका नियम था । प्राचीन पोथियोंमें लिखा है "जिस राज्यमें अथर्ववेत्ता रहता है उस राज्यमें सभी उपद्रव शांत होते हैं।" राजनीति और युद्धोंमें ऐसे पुरोहितोंका बड़ा महत्त्व रहता था । अथर्व-वेदमें "राजकर्माणि" ऐसा एक बड़ा सूक्तसंग्रह है। इन सबका कर्माधिकार राजपुरोहितका होता है। इस वेदकी नौ शाखाएँ आज उपलब्ध हैं। अथर्व-वेदमें २० कांड और करीब ६००० मंत्र हैं । अलग अलग शाखाओंकी मंत्र-संख्या अलग अलग है। इसका एक बड़ा अंश ऋग्वेदसे लिया गया है। यह अग्नि उपासकोंका वेद ? है। इसमें आयुर्वेदके बीज भी देखनेको मिलते हैं। इसमें कुछ रोग और उसकी चिकित्साका विधान है। इसमें राष्ट्रीयता, सेना, शस्त्रास्त्र, सेना संचालन आदिका भी विवेचन है। साथ साथ कृषि गोपालन आदिका भी वर्णन या नियमादि हैं । अथर्व-वेदका एक ब्राह्मण और तीन उपनिषद हैं। आयुर्वेद, सर्पवेद, पिशाचवदे, असुरवदे आदि इसके उपवेद माने गये हैं । गीता अ० १०, श्लो० २२-देवों में देवराज मैं- देवराज-इंद्र ऋग्वेदका प्रधान देवता है। ऋग्वेदमें इंद्र पर सबसे अधिक सूक्त हैं। इंद्रके तीन रूप हैं । आकाशस्थ इंद्र देवता । शरीरस्थ इंद्र बुद्धि । इंद्रका मानवी रूप-सामाजिक-राजा । वैदिक ऋषियोंका यह राष्ट्रीय देवता है । इंद्र दस्युओंका शत्रु है। इंद्रका जन्म-वेदमें इंद्रके माता-पिताका पर्याप्त वर्णन होने पर भी उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। एक स्थान पर इंद्रके पिताका नाम "द्यु" मान कर माताका नाम "पृथ्वी" कहा है । एक स्थान पर इंद्र-जन्मके विषयमें अलंकारिक भाषामें कहा गया है । कहीं कहीं "बवंडर आया और जन्म हुवा !" ऐसे कहा गया है। जहां आकाशको इंद्रका पिता कहा गया है वहीं इंद्रके जन्मके साथ आकाश कांप उठनेका उल्लेख है। इंद्रके क्रोधसे आकाश कांप उठता है । पृथ्वी कांप उठती है । एक मंत्रमें कहा गया है "इंद्र अपने माता-पिताकी पर्वाह नहीं करता ।" "वह अपने माता-पिताको त्रस्त करता है।" बवंडरके समय भी तो पृथ्वी और आकाश त्रस्त होते हैं ! संभवतः इसीका यह वर्णन है। सभी ऋचाओंका सर्व-सामान्य अर्थ लिया तो बवंडरका सुंदर और भीकर वर्णन देखनेको मिलता है । इंद्र-जन्मका जितना अधिक अध्ययन किया जाय उतना वह अधिक दुर्बोध होता जाता है । एक स्थान पर इंद्रका मानवी स्वरूप देखनेको मिलता है। "इंद्रके जन्म-समयमें उसके चारों ओर चार दासियां एकत्र हुईं !" "इंद्रने जन्मते ही सोमपान किया !" "देवियोंने उसको पालनेमें झुला झुला कर उसके पराक्रमको जगाया !" एक स्थान पर इंद्र स्वयं कहता है "मेरे पिताने मुझे अशत्रु निर्माण किया।" "एक वीर-पत्नीके गर्भसे एक वीर पुत्रका जन्म हुवा" इंद्र सोमपानसे मत्त होकर झूमता हुवा बड़बड़ाता जाता है। फिर भी वेदके गहरे अध्ययन करनेवाले कहते हैं कि इंद्र बवंडरकी देवता है। इंद्रके शत्रुगण-इंद्रके साथ लड़नेवाले सबके सब "वर्षा चुराने वाले" हैं । (१) अर्बुद-एक मंत्रमें कहा गया है । "तूने उस गंदे अर्बुदको कुचल डाला ।" अर्बुदके पहाड़ोंसे ४९ परिशिष्ट ३