ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगायोंको मुक्त किया।” (२) अहि-अहिका अर्थ दैत्य अथवा सर्प है। अनेक विद्वानोंने अहिको वृत्र कहा है जो इंद्रका सबसे बड़ा शत्रु है। (३) श्वघ्न-दो तीन बार इसका वर्णन आया है। कहा गया है “इंद्रने इसका निवासस्थान उध्वस्त किया।” “इंद्रने सूर्यको उदय होनेको कह कर इस लोभीका संहार किया।” (४) इलीविश-केवल एक बार इसका उल्लेख है। “इंद्रने इसको धूलमें मिला दिया।” इसको “पानीको रोकनेवाला” कहा है। (५) कांरज-यह सदैव वृत्रके साथ रहता है। इंद्रने इसका दो बार पराजय किया। (६) कुयव-यह शब्द विशेषण बनकर कई बार आया है। कुछ विद्वानोंने इसका अर्थ “बुरा बोलनेवाला” ऐसा किया है। तो कुछ विद्वानोंने इसका अस्वीकार किया है। (७) निमुचि-पाणिनीने इसका अर्थ वर्षा न होने देने वाला ऐसा किया है। इंद्रने इसका सिर उड़ाया था। (८) नववास्त्व-कई बार इस का नाम आया है। “जिसका वसति-स्थान नया वह” एक स्थान पर इसका उल्लेख “बृहद्रथ” इस नामसे आया है। इंद्रने इसके रथ और इसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। (९) पणि-सदैव यह गायोंको भगाकर छिपा देता है। अथर्वन् अंगीरसकी प्रेरणासे इंद्रने इसको मारा। (१०) विमृ-इसको “कानून तोड़नेवाला” कहा गया है। साथ साथ यह विशालकाय है। शुष्ण और शंबरके साथ लड़ने आता है। इंद्रने इसको मारा है। (१०) वर्षिन्-यह सदैव शंबरके साथ है। इसके साथ इसकी एक खास सेना है। इसको भी इंद्रने मारा है। (११) वल-वलका अर्थ गुफा है। यह सदैव गुफामें रहता है। इंद्रने इसको तोड़कर पणीका संहार किया। एक स्थान पर “बृहस्पतिने वलका स्थान दिखाया” ऐसा उल्लेख है। (१२) शंबर-वाजसेनीय संहितामें इसको दैत्याधिपति कहा गया है। वेदमें इसको दास कहा गया है। इसको कौलीत्तर अथवा कुलत्तरका लड़का कहा गया है। पाश्चात्य विद्वानोंका मत है कि यह किसी आर्येतर जाति-कुलका नाम होगा। इंद्रने “दूसरे राक्षसके साथ शंबरका वध किया” है। “शंबर पर्वत पर रहता है चाहे वह पृथ्वी पर रहता हो अथवा अंतरिक्षमें बादलों पर रहता हो !” एक स्थान पर लिखा गया है “शंबर अपनेको देव मानता था !” पर्वतों पर इस शंबरके १०० किले थे। इसका अंतिम किला रातको गिरा। शंबरको मारनेके लिये इंद्रको ४० वर्ष लगे। इतने दिन तक इंद्र शंबरको खोजता रहा। कई विद्वानोंने इसका ऐसे अर्थ किया “४० वर्ष तक बवंडर चलता रहा।” वस्तुतः शंबरका मुख्य शत्रु दिवोदास है। दिवोदास इंद्रका भक्त है। अश्विनीने इस काममें सहायता की है। १३ शुष्ण, १४ स्वर्भानु आदि ४० इंद्र-शत्रुओंका नाम मिलता है जिन्हें इंद्रने मारा है। वैदिक ऋषि पुनः पुनः प्रार्थना करके इंद्रको “पराक्रम करनेकी प्रेरणा” देते हैं। इंद्रसे लड़नेवाले सभी “वर्षाको रोकते हैं गायको छिपा देते हैं!” इंद्रसे जब जो युद्ध हो कर इंद्र शत्रुको मारता है तब “सदैव उषा और सूर्य आकाशमें प्रस्थापित होते हैं!” विद्वानोंकी यह मान्यता है “वातावरणके नैसर्गिक संघर्षको मानवी-युद्धका रूप देकर अवकर्षणायदि राष्ट्रीय आपत्तियोंको दूर करनेवाले इंद्रको राष्ट्र-पुरुष मानकर आर्योंने राष्ट्रीय भावनाका उदय और पोषण किया है।” इससे “राष्ट्र-हितके लिये अपना जीवन उत्सर्ग करनेका भाव भर दिया है।” “वृत्र” इंद्रका महान् शत्रु है। इंद्र-वृत्र-युद्ध मानो सृष्टि चमत्कारोंका सुंदर सजीव वर्णन माना जाता है। इसमें ऋषियोंकी काव्य-प्रतिभाका सजीव दर्शन होता है। (१) वृत्र गायोंको भगाने (२) सूर्यको छिपाने (३) सूर्योदय रोकने (४) वर्षाको रोकनेका “पराक्रम” करता है। वृत्र वराह-भक्षी है। शीघ्रगामी है। त्रसका वर्णन बादलोंके आकारोंका वर्णन है। मत्र कुहरेमें छिपकर बैठ जाता है।
- ज्ञानेश्वरी ५०