ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुहेरेको लपेट कर आक्रमण करता है। गडगडाहटसे इंद्रको डरानेका प्रयास करता है। इससे देव भाग जाते हैं किंतु इंद्र अपना स्थान नहीं छोड़ता। इंद्रके वज्र प्रहारसे विश्व कांप उठा। वृत्र मर गया। ऊपरका वर्णन इंद्रका स्वरूप समझनेके लिये पर्याप्त है। इंद्र आर्योंके आत्म-विश्वासकी जीती जागती मूर्ति है। इंद्रके पराक्रमका फल प्रकाश है। इंद्रके युद्धारंभ सदैव अंधकारमें होते हैं। तमावरणमें वह शत्रुको मारता है। उसके बाद आकाशमें उषा और सूर्यकी प्रस्थापना होती है ! इस लिये “ इंद्र शिवः सखा” है। वैदिक ऋषि उससे “न्याय, सामर्थ्य, तेज, दिगंतकीर्ति, और ऐश्वर्य” मांगते हैं। इंद्र भी कहता है “मैंने ही यह भूमि आर्योंको दी है।” इसलिये वह आर्योंका राष्ट्र- पुरुष है। इस पर १९९ सूक्त हैं। ऊपर वैदिक इंद्रका वर्णन है। पुराणोंमें प्रत्येक मन्वंतरोंमें एक इंद्र होता है। सौ यज्ञ सांग करनेवाला इंद्र-पद पाता है। प्रजा-संरक्षण इसका मुख्य कार्य है। असुरोंमेंसे हिरण्य-कश्यपु, प्रल्हाद, और बलि इन तीनोंने इंद्र-पद प्राप्त किया है। इससे इंद्र-पदकी राजनैतिक स्थितिका बोध होता है। त्रिशंकु, वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, रोहित, गौतम, गृत्समद, भारद्वाज, सोम, इंदुल, अर्जुन आदिके जीवनमेंसे भी इंद्र-पदका राजनैतिक रूप स्पष्ट होता है। इंद्र कश्यप और अदितिका पुत्र। देवोंका राजा। वर्षाका देव। इंद्र-पद प्राप्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञ नष्ट करना तपोभंग करना इसका काम। हिरण्यपुत्र महाशलिने इसको जीता है। वरुणने इसको बंधन-मुक्त किया। ऐरावत, कल्पवृक्ष, अमृत आदि पर इसका स्वामित्व। गरुडने एक बार इससे लडकर अमृत ले लिया। फिर गरुडके कहनेसे इंद्रने चालाकीसे यह पुनः पालिया। नहुष-मानव-भी एकबार इंद्र बना था! पुराणोंमें इंद्र प्रथम-स्थानका देवता नहीं है। यह अंतरिक्षमें पूर्व दिशाका स्वामी है। इंद्रने कई बार कई लोगोंसे मार खाई है। कई लोगोंके शापसे भ्रस्त हुआ है। इसका निवासस्थान स्वर्ग। अमरावती इसकी राजधानी। इसका राजप्रासाद वैजयंत। बाग नंदनवन। वाहन ऐरावत। हत्यार वज्र। घोडा उच्चैः श्रवा। रथ विमान। सारथी मातली। धनुष्य शक्र। तलवार परंज। गीता अ० १०, श्लो० २२-मन हूं मैं इंद्रियोंमें- अपने अपने विषयोंको ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है। त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिव्हा, घ्राण, ये पांच ज्ञानेंद्रिय हैं। इनके विषय हैं स्पर्श, रूप, शब्द, रस, गंध। बिना इंद्रियोंके अन्य किसी साधनसे विषयोंका ज्ञान होना असंभव है। इन्ही इंद्रियोंसे शीतोष्ण सुख दुःखादिका बोध होता है। इंद्रिय शरीरसे संयुक्त अतींद्रिय और ज्ञानका कारण है। इन पांच ज्ञानेंद्रियोंको बहिरिंद्रियां कहते हुए मनको अंतरिंद्रिय कहा गया है। मनको अणुपरिमाण और हृदयके भीतर रहनेवाला अर्थात् अंतःकरण कहा गया है। बाह्य पांच ज्ञानेंद्रियोंके साथ पांच कर्मेंद्रियां भी होती हैं। हाथ, पैर, गुदा, शिश्न, और वाचा ये पांच कर्मेंद्रिय हैं। ये पांच अपना अपना कर्म करती हैं। इन पांच ज्ञानेंद्रिय और पांच कर्मेंद्रियों पर मनका स्वामित्व है। ये इंद्रिय मनुष्यको बाह्य विषयोंका ज्ञान कर देती हैं। बाह्य कर्म करती हैं किंतु अंतर्विषयको ज्ञानके लिये आंतरिक कर्मके लिये इनकी आवश्यकता नहीं होती। अंतःकरण या मनके द्वारा आंतरिक ज्ञान सुख दुःखादि होता है। वेदांतियोंके मतानुसार वह दर्पणके समान होता है। ५१ परिशिष्ट ३