ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 998, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांख्यमतके अनुसार इंद्रिय ग्यारह हैं। पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रिय, एक मन। मन इंद्रियोंसे अलग न माननेसे इंद्रियोंमें मन कहा गया है। गीता अ० १०, श्लो० २२-चेतना भूत मात्रमें- जो कुछ चराचर पदार्थ है उसमें जो स्मृति, बोध, सुख, या संज्ञा है, वह चेतना है। प्रकृतिमें जो कुछ है उसमें जो तत्त्व है, जिस तत्वसे जिस किसीका अस्तित्व है वह चेतना है। चेतना अथवा चैतन्यका केवल अस्तित्व है। आकार प्रकार रंग रूप नहीं। केवल एक बोध है, जो इंद्रियातीत है, उसको दिखा नहीं सकते। बता नहीं सकते। कह नहीं सकते। जिसमेंसे "मैं" का स्फुरण होता है "मैं" का बोध होता है और स्मृति रहती है, वह चेतना है। वह चैतन्य सर्व-व्यापी है। भूतमात्रोंमें है। गीता अ० १०, श्लो० २३-रुद्रोंमें मैं सदाशिव- रुद्र-एक वैदिक देवता। ऋग्वेदमें इस पर तीन सूक्त हैं। वेदका रुद्र बडा शक्तिशाली, पराक्रमी, शत्रुओंको मारनेवाला है। वह अत्यंत भयप्रद है। जटाधारी है। बलिष्ठोंमें बलिष्ठ है। वज्रबाहु है। चिर-तरुण है। त्रिशूल इसका आयुध है। यह त्रिनेत्र है। इसका पेट काला और पीठ लाल है। इसका धनुष्य शक्तिशाली होता है। ऋग्वेदमें इसको क्रूर कहा है। यह संहारक है। ज्वर पैदा करनेवाला है। रुद्र रोग हरणमें कुशल है। श्रेष्ठ वैद्य है। देवोंसे भी रक्षा करनेके लिये ऋषि इससे प्रार्थना करते हैं। ऋग्वेदके रुद्र-सूक्त देखनेसे "सदैव प्रेम-वर्षा करनेवाली माँकी लाल आंखें देख कर- "माँ ! आंख मत दिखा, प्यार कर" कहनेवाले बालकका दर्शन होता है। किंतु पौराणिक रुद्र कश्यप और सुरभिके पुत्र हैं। अलग अलग पुराणोंमें इनके विषयमें अलग अलग बातें हैं। रुद्र ग्यारह हैं। इनको एकादश रुद्र कहा जाता है। इनके नामके विषयमें भी एक-वाक्यता नहीं है। अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग नाम हैं। महाभारतके आदि पर्वमें : (१) मृगव्याध (२) सर्प (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य (६) पिनाकी (७) दहन (८) ईश्वर (९) कपाली (१०) स्थाणु (११) भव ऐसे नाम दिये हैं। किंतु महाभारतके शांति पर्वमें (१) अजैकपाद (२) अहिर्बुध्न्य, (३) विरूपाक्ष (४) रैवत (५) हर (६) बहुरूप (७) त्र्यंबक (८) सुरेश्वर (९) सावित्र (१०) जयंत्य (११) पिनाकी है। किंतु ये नाम प्रसिद्ध हैं। (१) भूतेश (२) नीलरुद्र (३) कपाली (४) वृषवाहन (५) त्र्यंबक (६) महाकाल (७) भैरव (८) मृत्युंजय (९) कामेश (१०) योगेश (११) शंकर। शंकर-कश्यप और दनुका पुत्र। कैलासवासी, त्रिनेत्र। दक्षने इसे अपनी कन्या दी थी। दक्ष यज्ञमें इसने दक्षका संहार किया। समुद्रमंथनसे जो हलाहल विष निर्माण हुआ उसको इसने लोक-कल्याणार्थ पी लिया। इससे इसका गला नीला हो गया। इसीलिये इसको नीलकंठ कहते हैं। हालाहल विषके तापसे बचनेके लिये इसने जटामें चंद्र धारण किया। इस शंकरको शिव भी कहते हैं। शिवकी उपासना करनेवाले शैव। भारतीय संस्कृतिमें शैव-दर्शनका अत्यंत महत्त्वका स्थान है। अनेक पुराणोंमें शंकरकी कथाएँ हैं अथवा अनेक शैव-पुराण हैं। यह सदैव देवोंकी ओरसे दैत्योंसे लडने आया है ! ज्ञानेश्वरी ५२