भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 999, कुल 1172 में से

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गीता अ० १०. श्लो० २३-कुबेर यक्ष-रक्षोंमें— यक्ष—देवयोनिकी एक जाति। विद्याधरोंके निवासके निम्न भागमें मेरु पर्वत तक, जहां तक हवा चलती है यक्षोंका वास है। इन यक्ष-गणोंका स्वामी कुबेर है। कुबेर—पिताका नाम विश्रवा ऋषि। माताका नाम इडविडा अथवा मंदाकिनी। मांके नामके विषयमें मतभेद है। इडविडा विश्रवा ऋषिकी पत्नी है या माता ऐसा भ्रम होता है। ब्रह्माने इसको राक्षसगणोंके साथ लंका, पुष्पक विमान, यक्षोंका आधिपत्य, धनेशत्व, लोकपालत्व और रुद्रकी मित्रता दी थी। रावण इसका सावत्र बंधु। रावणने इससे लड़कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया फिर यह उत्तराधिपति बना। अलका इसकी राजधानी। मणिग्रीव और नलकूबर इसके पुत्र। इसको उत्तराधिपति कहा गया है। यह उत्तरके यक्ष लोगोंमें रहता है। ऋद्धि और सिद्धि इसकी शक्तियां हैं। मणिभद्र, पूर्णभद्र, मणिमत्, मणिकंधर मणिमूस, मणिस्रग्विन्, मणिकामुखधारक ये यक्ष इसके सेनापति हैं। कुबेर-सभा इसकी राज्यसभा है। गंधमादन पर्वतकी संपत्तिका चौथा हिस्सा इसके आधीन है और केवल सोलहवा हिस्सा मनुष्योंको मिला है। मेरु पर्वतके उत्तरमें विभावरी इसका वसति-स्थान है। इसका वन सौगंधिक है। जिस किसी राज्यमें ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी एकता रहती है उस राज्यका विकास होता है। ऐसा राज्य सुखी रहता है। यह कुबेरका राजनैतिक सिद्धांत है जो इसने मुचकुंदको कहा था ! गीता अ० १०. श्लो० २३-अग्नि मैं वसु वर्गमें— वसु—वैवस्वत मन्वंतरकी दक्ष-कन्या वसुके आठ पुत्र वसु संज्ञक देव हैं। इन अष्ट-वसु ओंका नाम अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग है। पद्मपुराणमें—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास। भागवत पुराणमें— द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु, विभावसु ऐसे दिये हैं इसमें पावक। अग्नि—अग्निका अर्थ करते समय ॥ सदैव ऊपर उठता है वह ॥ ऐसे किया गया है। अग्नि वैदिक देवता भी है किंतु यहां वसुके अग्निका विचार करना है। धर्म-और वसुका पुत्र अग्नि, इसकी पत्नी वसोर्धारा। द्रविणक पुत्र। अग्नि अनेक मिलते हैं किंतु अष्टवसुओंमें जो अग्नि है उसकी इससे अधिक जानकारी नहीं। गीता अ० १०. श्लो० २३-मेरु मैं गिरिमालामें भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें जगह जगह पर मेरु पर्वतका वर्णन आता है। किंतु इसकी भौगोलिक जानकारी नहीं मिली। किंतु स्वर्गारोहणपर्वमें लिखा गया है कि पांडव मेरु-पर्वत पर जाने निकले। वे हस्तिनापुरसे पूर्वकी ओर चले। अनेक देशोंसे प्रवास करते करते समुद्रके किनारे गये। वहां समुद्र पार करके हिमवत् पर्वतके उस पार जो मेरु शिखर था वह चढ़नेके लिये उसके पास आये। मेरु शिखरको वंदन करके उस पर चढ़ने लगे। मेरु शिखर पर चढ़ते समय प्रथम द्रौपदीका पतन हुआ। ५३ परिशिष्ट ३

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