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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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प्रत्येक वेदके ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषद् ऐसे अलग अलग भाग हैं। ब्राह्मण वेदका कर्मकांड है। इसमें यज्ञ-यागादि विधि-विधान कैसे करना चाहिए इसका सविस्तर और सूक्ष्माति- सूक्ष्म, विवरण है और आरण्यक उपासना कांड है। इसमें आध्यात्मिक चिंतनका विवेचन है। और उपनिषद् इस विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको जाननेका प्रयासरूप ज्ञानकांड है। ऋग्वेदके ऐसे ५ ब्राह्मण ९ आरण्यक और ४ उपनिषद हैं। ऋग्वेदका रचनाकाल विद्वानोंके अनुसार ६००० से ८००० वर्ष प्राचीन है। यजुर्वेद-यजुर्वेद यज्ञ संबंधि अधिक है। यजन विषयक ज्ञान-यजुर्वेद है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन कालमें इसकी १२२ शाखायें थीं। "यजन पद्धतिके भिन्नताके कारण ही ये शाखायें हुईं" ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। आज, यजुर्वेदकी पांच संहिताएँ उपलब्ध हैं। (१) काठक- संहिता (२) कठ-संहिता (३) मैत्रायणी-संहिता (४) तैत्तिरीय-संहिता (५) वाजसेनीय- संहिता। वाजसेनीय संहिताकी काण्व और माध्यंदिन ऐसी दो शाखाएं हैं। तैत्तिरीय संहिताको कृष्णयजुर्वेद कहते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेदका उपवेद माना जाता है। यजुर्वेद गद्य पद्यात्मक है। यजुर्वेदके दो ब्राह्मण, दो आरण्यक, और ७ उपनिषद हैं। प्रसिद्ध ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदका अंतिम ४० वां अध्याय है। सामवेद-प्राचीन ग्रंथोंको देखनेसे ऐसा लगताहै कि प्राचीन-कालमें इसकी अनेक संहितायें थीं। अब केवल एक ही संहिता उपलब्ध है। पुनरुक्ति छोड़ दी जाय तो उसमें १५४९ ऋचायें हैं। इनमेंसे ७५ को छोड़ कर अन्य सभी ऋचाएं ऋग्वेदमें आई हैं। सामवेद-का अर्थ गानेका वेद ! विद्वानोंका ऐसा एक मत है कि भारतीय संगीतका प्रारंभ सामवेदसे हुवा है। यज्ञादिमें वेद गानेवालोंको उद्गाता कहनेकी परिपाठी थी। वैसे सामका प्रस्ताव-प्रारंभ-प्रस्तोता करता है। इसका मुख्य भाग-उद्गीथ-उद्गाता गाता है। और प्रतिहर्ता उसकी समाप्ति करता है। प्रत्येक ऋचा पर अनेक प्रकारके साम स्वर होते हैं। इन स्वरोंको यदि वर्तमान भाषामें 'स्वरलिपि' कहा जाय तो संभवतः अत्युक्ति नहीं होगी। सामवेदमें अनेक छंद हैं। पुरानी पोथियोंको देखनेसे पता चलता है कि सामवेदकी कई शाखाएँ थीं। किंतु आज केवल दो शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ३६ प्रकार आज उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ८ प्रकार हैं। इन्हे (१) जटा (२) माला (३) शिखा (४) रेखा (५) ध्वज (६) दंड (७) रथ (८) घन ऐसे कहते हैं। संभव है कि गीता-कालमें सामवेद सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रहा हो। तभी भगवानने वेदोंमें साम वेद मैं ऐसे कहा। अथर्ववेद-यह सामान्य लोगोंका वेद है। इसमें उतनी उदात्तता नहीं जितनी ऋग्वेदादिमें है। इसमें अभिचार-मंत्र और अभिचार विधि भी है। इसका प्राचीन नाम अथवांगिरस ऐसा है। इसका अर्थ है अंगिरस-वंशीय अथर्वा-ऋषिका कहा हुवा है। इसका और एक नाम भृग्वंगिरस भी है। भृगु ऋषि अंगिरस ऋषिके शिष्य थे। अथर्ववेदके प्रचारमें इन भृगु ऋषियोंका बडा महत्व है। साथ साथ अथर्ववेदको क्षात्र-वेद कहनेकी भी परिपाठी है। अथर्व वेदमें यज्ञोपयुक्त भाग अत्यंत अल्प है। अथर्व-वेदको पुरोहितोंका वेद भी कहते हैं। पहले अथर्ववेदके अध्ययन किये ज्ञानेश्वरी ४५