ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· इस युद्धमें अभिमन्युका रक्षक भीम इससे दूर फेंका गया । अभिमन्युको अकेला देख कर दुःशासनने इसपर हमला किया । दुःशासनको युद्ध-भूमिसे भगाकर यह कौरव-सेनाका संहार करते करते इतना दूर निकल गया कि यद्यपि इसने भीमके लिये रास्ता खुला रखा था भीम इसके पास नहीं आ सका । अभिमन्युको अकेला देखकर दुर्योधनका पुत्र लक्ष्मणने इस पर आक्रमण किया किंतु यह अभिमन्युसे मारा गया । कर्ण पुत्र आक्रमण करके भाग गया । साथ साथ अन्य अनेक वीरोंको इसने स्वर्गकी राह दिखाई । यह देखकर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, बृहद्रथ, बृहद्वल ये सात महारथी एक साथ इससे लड़ने लगे । यह अकेला ही इन सबका निवारण करने लगा । सबने मिलकर अत्यंत कठिनाईसे इसको विरथ किया । तब अभिमन्यु ढाल और तलवार लेकर लड़ने लगा । द्रोणने वह भी तोड़ दिया । तब इसने गदा हाथमें उठाई । दुःशासनके पुत्रसे इसने गदायुद्ध प्रारंभ किया । यह अत्यंत थका हुवा था । भीम इससे दूर था । वहां जयद्रथने भीमको रोक रखा था । अभिमन्यू अकेला सात महारथियोंसे लड़ रहा था । दुःशासन पुत्रके गदा प्रहारसे वह मूर्च्छित हो गया । इस मूर्च्छासे सावध होनेके पहले ही दुःशासनके पुत्रने इस पर और एक गदा प्रहार किया जिससे अभिमन्यु मर गया । विराट कन्या उत्तरा इसकी पत्नी थी । जब अभिमन्युकी मृत्यु हुई तब उत्तरा गर्भवती थी । इसका पुत्र परीक्षित ही कुरु-युद्धमें समाप्त कुरु-कुलका एक मात्र संतान रहा, इसीने कुरु-कुलका प्रतिनिधि बनकर आगे राज्य किया । गीता अ० १. श्लो. ६ द्रौपदेय— (१) युधिष्ठिरसे प्रतिविंध्य, (२) भीमसे सुतसोम, (३) अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, (४) नकुलसे शतानीक (५) सहदेवसे श्रुतसेन । प्रतिविंध्य— भारत युद्धके अंतिम दिन युद्ध समाप्तिके बाद शिबिरमें निद्रित अवस्थामें अश्वत्थामासे मारा गया । सुतसोम— कोई जानकारी नहीं मिली । श्रुतकीर्ति— युद्धमें शल्यसे इसका पराभव हुवा था । इसको भी अश्वत्थामाने नींदमें मारा था । शतानीक— अश्वत्थामासे अंतिम दिन रातको मारा गया । श्रुतसेन— इसने कांबोज राजा सुदक्षिणसे युद्ध किया था । यह भी अश्वत्थामासे नींदमें मारा गया । गीता अ० १. श्लोक० ८ भीष्माचार्य— पिताका नाम शांतनु । माता गंगा । इनका शास्त्र-गुरु वसिष्ठ । बृहस्पति और शुक्रने इन्हे नीतिशास्त्र सिखाया था । परशुरामसे धनुर्वेद, राज-धर्म और अर्थ-शास्त्र सीखे । गंगा-पुत्र होनेसे इन्हे गांगेय भी कहा गया है । आमरण ब्रह्मचर्य और राज्याधिकार त्याग करनेकी घोर प्रतिज्ञा करनेके कारण ये भीष्म या भीष्माचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए किंतु वैसे इनका नाम देवव्रत था । एकके बाद एक तीर छोड़ कर ये गंगा प्रवाह रोक देते थे । जन्मके बाद ये इतना अधिक गुरुकुलमें रहे कि बाप भी इनको भूल गया था !! प्रथमावस्थामें गंगाने ही ज्ञानेश्वरी ३०