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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 965

गीता अ० १. श्लो० ५-कुंतिभोज— प्रथम यह निपुत्रिक था । इसलिये वसुदेवके पिता शूरसेनने अपनी कन्या पृथा-जो कुंती नामसे प्रसिद्ध है-इसको दत्तक दी। यह शूरसेनकी बूभाका लडका था। आगे इसका पुरुजित् नामका पुत्र हुआ। इस पुरुजितके अलावा इसके और दस पुत्र भी हुए थे। ये भी सब कुरु-युद्धमें लडने आये थे और इन सबको अश्वत्थामाने मारा। इसका द्रोणाचार्यसे जो युद्ध हुआ उस युद्धमें यह द्रोणाचार्यसे मारा गया। और यह वंश भी कुरु-युद्धमें समाप्त हुआ।

गीता अ० १. श्लो० ६-युधामन्यु— पांचाल । महारथी । महाधनुर्धर । धनुर्विद्या और गदायुद्धमें प्रवीण । कुरु-युद्धमें इसने द्रोण, दुर्योधन आदिसे युद्ध किया है। कुरु-युद्धमें लडकर जो कुछ थोडेसे वीर अंत तक बचे रहे इसमें यह भी एक था। युद्धके अंतिम दिन रातको नींदमें अश्वत्थामाके द्वेषाग्निमें जो आहुति हुए उनमें यह भी एक है। इस समय भी इसने अश्वत्थामा पर सोये सोये ही गदा-प्रहार किया किंतु इसके उठनेके पहले ही अश्वत्थामाने इसका वध किया। कुरुयुद्धमें यह अत्यंत वीरतासे लडा था।

गीता अ० १. श्लो० ६-उत्तमौजा— पांचाल देशीय राजपुत्र । यह भी कुरु युद्धके अंतिम दिनको रातके हत्याकांडमें अश्वत्थामासे मारा गया।

गीता अ० १. श्लो० ६-सौभद्र— अभिमन्यु । अर्जुनका पुत्र । माताका नाम सुभद्रा। जन्मके समय ही यह अत्यंत निर्भय और क्रोधी-सा लगता था । इसीलिये इसे अभिमन्यु कहा गया । यह अर्जुनके नेतृत्वमें धनुर्विद्या सीखा। इसकी शस्त्र-रचना और अस्त्र-कौशल्यसे प्रसन्न होकर बलरामने इसको रौद्र नामका धनुष्य दिया था। अपने पराक्रमके बलपर यह अत्यंत अल्पायुमें ही महारथी कहलाया। कुरु-युद्धमें द्रोणाचार्यने अत्यंत कुशलतासे अर्जुनको दूसरे युद्धमें उलझा कर मुख्य-युद्धमें चक्र- व्यूहकी रचना की । पांडवसेनामें अर्जुनके बिना चक्रव्यूहका भेदन करनेवाला महारथी दूसरा कोई नहीं था। तब अभिमन्युने भीमकी सहायतासे चक्रव्यूहका भेदन करनेका निश्चय किया। इसको चक्रव्यूहमें कैसे घुसना चाहिये इसकी जानकारी थी किंतु व्यूह भेदन करके कैसे बाहर आना चाहिये इसकी जानकारी नहीं थी। यह धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञा और आशीर्वाद लेकर युद्ध-भूमिमें उतरा। द्रोणाचार्य स्वयं व्यूहकी रक्षा कर रहे थे। फिर भी अभिमन्यु व्यूह तोड कर अंदर घुस गया। व्यूहमें घुसते ही इसने अपने शौर्यसे बडे बडे महारथियोंको भी मैदान छोड़नेके लिये बाध्य किया। सारी सेना पीछे हटने लगी। यह देखकर स्वयं द्रोणाचार्य इस पर चढ आये । अभिमन्युने कुशलता-पूर्वक उनको टालकर अश्मक राजाका वध किया । शल्यके भाईको मारा । इस पर चढ़ाई करके आये हुए कर्णको जर्जर करके युद्ध भूमि छोड़नेके लिये बाध्य किया ।

१५ परिशिष्ट १