ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 967, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइनका पालन किया था। जब ये हस्तिनापुर आये और इनको युवराज्याभिषेक हुवा तब ये ३६ वर्षके थे। जब देवव्रत राज्य कार्य कर रहे थे तब शांतनु सत्यवती नामकी एक शूद्र कन्यासे मोहित हो गया। शांतनुने सत्यवतीके पितासे मंगनी की किंतु "सत्यवतीके पुत्रोंको राज्य नहीं मिलेगा" इस कारणसे उसने शांतनुकी मांग अस्वीकार कर दी। देवव्रतको जब यह ज्ञात हुवा तब इन्होंने पिताके सुखके लिये राज्याधिकार त्यागने तथा सत्यवतीके पुत्रोंके वंशमें ही राज्य रहे इसलिये आभरण ब्रह्मचर्यसे रहनेकी भी भीषण प्रतिज्ञा की। तबसे देवव्रत भीष्म इस नामसे प्रसिद्ध हुए। देवव्रतकी इस प्रतिज्ञासे सत्यवतीका शांतनुसे विवाह होकर उससे चित्रांगद और विचि- त्रवीर्य ऐसे दो पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगदको गद्दी पर बिठाकर भीष्म राज्य करने लगे। शांतनुकी मृत्युके बाद तुरंत उग्रायुधने भीष्मको संदेशा भेजकर विमाता सत्यवतीकी मंगनी की। भीष्मने इससे क्रुद्ध होकर तुरंत सेना सिद्ध करनेकी आज्ञा दी। किंतु पिताकी मृत्यु-दिनोंमें युद्ध प्रारंभ नहीं कर सकते, उग्रायुध अपनी मांग नहीं छोड़ता तब भीष्मने तीन दिन तक अथक युद्ध करके उसका वध किया। इसके बाद चित्रांगद किसी गंधर्वसे लड़ते समय मारा गया। भीष्मने विचित्रवीर्यको गद्दी पर बिठाया। विचित्रवीर्य भीष्मके नेतृत्वमें राज्य-कार्य चलाता था। कुछ काल बाद काशीराजाने अपनी तीन कन्याओंके स्वयंवरकी घोषणा की। भीष्म उस स्वयंवरमें गये और वहां जो राजा उपस्थित थे उन सबको आह्वान देकर तीनों राजकुमारियोंको उठाकर ले आये। हस्तिनापुरमें आकर भीष्मने इन तीनों लड़कियोंका विचित्रवीर्यसे विवाह करनेका निश्चय किया, तब जेष्ठ कन्या अंबाने कहा "मनसे मैंने शाल्वका वरण किया है।" यह सुनकर भीष्मने उसकी इच्छानुसार सब व्यवस्था कर दी किंतु शाल्वने उसका अस्वीकार कर दिया। इस पर वह तप करने लगी और भीष्मने अंबाकी अन्य दो बहने अंबिका और अंबालिकाका विचित्रवीर्यसे विवाह कर दिया। अंबा जहां तपस्या कर रही थी वहां उसको अपने वृद्ध नानाका दर्शन हुवा। नानाने नाती- की राम कहानी सुनकर परशुरामको शरण जानेको कहा और अंबा परशुरामको शरण जाकर भीष्म वधकी प्रार्थना करने लगी। परशुरामने केवल ब्राह्मण-कार्यार्थ ही शस्त्र लेनेका निर्णय करनेके कारण अन्य उपायसे अंबाका कार्य करनेका निश्चय करके गुरुके नाते भीष्मसे अंबाका स्वीकार करनेको कहा किंतु भीष्मने जिसने मनसे दूसरेका वरण किया है, उसके विषयमें भाईसे बात करनेसे अस्वीकार कर दिया। परशुरामने तब भीष्मको युद्धका आवाहन दिया। भीष्मने परशुरामको बहुतेरा समझाया किंतु व्यर्थ। अंतमें भीष्म और परशुरामका द्वंद्व युद्ध हुवा। चार दिन तक यह युद्ध हुवा और अन्तमें परशुराम पराजित हुए। प्रस्वाप अस्त्रके कारण परशुरामका पराजय हुवा। वह अस्त्र भीष्मके अलावा और कोइ नहीं जानता था। फिर अंबा भीष्मके नाशके लिये तप करने लगी। तब महादेवने तेरे ही हाथसे भीष्मका वध होगा ऐसा वर दिया और अंबाने शरीर त्याग दिया। यहां विचित्रवीर्यको क्षय हुवा। सत्यवतीने भीष्मसे विवाहकी प्रार्थना की। भीष्मने प्रतिज्ञा- भंग अस्वीकार कर दिया। तब व्याससे अंबिका अंबालिकामें संतानोंत्पादन कराया गया। उसमें धृतराष्ट्र अंधा था इसलिये पांडुको गद्दीपर बिठाकर भीष्म राज्य देखने लगे। कौरव पांडवोंमें वितुष आकर पांडवोंको बनवास, अज्ञातवास, करना पड़ा। उनके वनवासके बाद द्रुपदराजाने अपने पुरोहितको संधानके लिये धृतराष्ट्रके पास भेजा। उस समय भीष्मने पांडवोंके अधिकारको स्वीकार ३१ परिशिष्ट १