ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब शांतनु इन बालकोंको अपने पास ले गया तब गौतमको इसकी जानकारी हुई। शांतनुको गौतमने कृप-कृपीका जन्म-वृत्तांत सुनाया और उन्हें योग्य शिक्षा दी। कृपाचार्य चार प्रकारके धनुर्वेद तथा अन्य शास्त्रमें पारंगत-आचार्य हो गये। धृतराष्ट्रने अपने सभी लडकोंको विद्याध्ययनके लिये कृपाचार्यके पास ही रखा था। सभी कौरव द्रोणाचार्यके पहले कृपाचार्यके विद्यार्थी थे। भारतीय युद्धमें यह कौरवोंकी ओरसे लडे थे। सदैव ये पांडवोंकी स्तुति और कर्णकी निंदा करते थे। ऐसे ही एक बार कर्णने इन्हें कहा था "हे दुर्मते! फिर यदि तू ऐसा भाषण करेगा तो तेरी जीभ ही काटकर फेंक दूंगा!" कृपाचार्यने भारतीय युद्धमें महान पराक्रम किया है। पांडव पक्षके कई वीर इनके हाथसे मारे गये हैं। किंतु जयद्रथके वधके बाद जब ये अश्वत्थामाके साथ अर्जुन पर चढ दौडे तब अर्जुनके बाणोंसे जर्जर हो गये। इन्होंने धृष्टद्युम्नको अपने बाणोंसे जर्जर किया था। दुर्योधनका पतन हो कर जब भारतीय युद्ध समाप्त हुवा तब अश्वत्थामा अत्यंत अस्वस्थ हो गया था। अश्वत्थामाने निश्शस्त्र पांडव और पांडव-पुत्रोंके वधकी अपनी योजना कृपाचार्यको सुनायी तब कृपाचार्यने कहा था "उद्योग क्षीण होनेके बाद दैव कुछ नहीं कर सकता। किसी भी मनुष्यको अपना उद्योग प्रारंभ करते समय अपने बुजुर्गोंसे सलाह करनी चाहिये। इसलिये हम यह कार्य करनेसे पहले धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर आदिकी राय लें!" इन्होंने विवाह नहीं किया। कौरवोंकी मृत्युके बाद इन्होंने धृतराष्ट्र और गांधारीको सांत्वन दिया था। फिर ये घोडेपर बैठ कर अज्ञात स्थान चले गये। गीता अ० १. श्लो० ८-अश्वत्थामा- पिताका नाम द्रोणाचार्य, माताका नाम गौतमी कृपी। इनका यह इकलौता पुत्र। जन्मके साथ यह उच्चैःश्रवा घोडेकी भांति हिनहिनाया इसलिये इसे अश्वत्थामा कहा गया। यह अत्यंत तेजस्वी तथा क्रोधी था। अश्वत्थामाने कौरव-पांडवोंके साथ द्रोणाचार्यसे अस्त्र-विद्या सीखी। भारत-युद्धके अंतमें जब सभी सेनापति पडे, भीम-दुर्योधनके युद्धमें दुर्योधन पड़ा तब मृत्यु समयमें दुर्योधनने अश्वत्थामाको सेनापति बनाया। तब अश्वत्थामाने पांडवोंका नाश करनेकी प्रतिज्ञा की। इसी एकने पांडवोंकी एक अक्षोहिणी सेना मारी है! अनेक बार यह भीमार्जुनसे लड़कर पराजित हुवा है। पांडवोंको अश्वत्थामा प्रिय था और अश्वत्थामाको पांडव! इतना होने पर भी, भारत- युद्धमें दुर्योधनकी कटूक्तियोंसे तंग आकर इसने द्रोण-पुत्रको शोभा दे ऐसा पराक्रम किया। भारत युद्धमें द्रोणाचार्यका वध हुवा। कौरव सेनामें तहलका मच गया। सारी सेना अस्त- व्यस्त हो कर भागने लगी। तब अश्वत्थामाने दुर्योधनसे पूछा "किसके वधसे यह सेना ऐसी भाग रही है?" धृष्टद्युम्नसे अपने पिताका वध हुवा यह सुनते ही अश्वत्थामाने धृष्टद्युम्नके वधकी प्रतिज्ञा की। पितृवधसे संतप्त अश्वत्थामाने, सात्यकी, धृष्टद्युम्न, तथा भीमसे लड़कर उनको भगा दिया। तब इसने पांडव सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। इससे पांडव सेनामें हाहाकार मच गया। तब कृष्णने सबको निःशस्त्र होनेको कहा। सबके निःशस्त्र होने पर वह नारायणास्त्र शांत हुवा। सभी कौरव मारे गये। हताश और क्षत-विक्षत दुर्योधन अश्वत्थामाको सेनापति बनाकर रणभूमिपर तड़पता पड़ा रहा। रातका समय। कौरव सेनाके तीन थके हुए सेनानी, कृपाचार्य, ३७ परिशिष्ट १.