भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 974

अश्वत्थामा और कृतवर्मा, विचार मग्न हो एक वृक्षके नीचे आये थे। तब एक उल्लू वहीं एक घोंसलेके अनेक कौवोंको मार गिरा रहा था। यह देखकर अश्वत्थामाके मस्तिष्कमें एक नई बात आयी। रातको पांडवोंकी छावनी पर हमला करके ऐसे ही निद्रस्थ सेनाका सफाया किया जा सकता है! इसने अपना यह विचार कृपाचार्य और कृतवर्मासे कहा। उन्होंने इसका अस्वीकार करके अश्वत्थामाको इस विचारसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया परंतु अश्वत्थामाने नहीं माना। वह अकेला हमला करनेके लिये चल पड़ा और अभिचार पूर्ण यज्ञमें अपने मांसकी आहुति देकर रुद्र खङ्ग प्राप्त करके इसने निद्रस्थ सेनानियोंका संहार करना प्रारंभ किया। इस हत्याकांडमें द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, पांचालकुल, सूत, सोम, शिखंडी, आदि अनेक वीर मारे गये। इतना सब करके, यह खबर देनेके लिये कृपाचार्य और कृतवर्माको साथ लेकर युद्ध भूमिपर क्षत-विक्षत हो पडे हुए दुर्योधनके पास गया। दुर्योधन मृत्यु-पीडासे तडप रहा था। वहां जाकर अश्वत्थामाने कहा "दोनो सेनामें अब बस कृष्ण, पांच पांडव और हम तीन ही रहे हैं! और सब मारे गये।" वह सुनकर दुर्योधनके प्राण पखेरू उड़ गये। किंतु इससे द्रौपदीको अत्यंत दुःख हुवा। द्रौपदीने "अश्वत्थमाके सिर पर जो मणि है वह युधिष्ठिरके सिर पर देख कर ही जीवित रहूंगी" ऐसी प्रतिज्ञा की और इस प्रतिज्ञाकी पूर्तिका लिये भीम गदा लेकर चल पडा। किंतु अश्वत्थामाके अस्त्र प्रभावके आगे भीमका कुछ भी नहीं चलेगा यह जान कर कृष्णार्जुन भी उसके साथ चले। अश्वत्थामाने पांडवोंके विनाशके लिये ब्रह्मा- सिरस् नामके अस्त्रका प्रयोग किया और इसका प्रतिकार करनेके लिये अर्जुनने भी उसी अस्त्रका प्रयोग किया, परिणाम स्वरूप पृथ्वी कांप उठी। अश्वत्थामाके अविचारके लिये व्यास्रादने उसकी भर्त्सना की और सिरका दिव्य मणि देकर अर्जुन को शरण जानेको कहा। अश्वत्थामाने वह मणि तो दिया किंतु यह अस्त्र पांडव वंशका नाश करके शांत होगा ऐसा कहा। यह सुन कर, कृष्णने अश्वत्थामाको महा-रोगसे पीडित होकर मूक भावमें लंबी आयु भोगनेका शाप दिया और इस अस्त्रसे उत्तराके गर्भमें जो पांडव-वंश बढ़ रहा था उसकी रक्षा की। इसे चीरजीवी कहा गया है। गीता अ० १. श्लो० ८-विकर्ण- धृतराष्ट्र-पुत्र । द्रौपदी स्वयंवरमें गया था। यह महारथी था। न्यायवान था। जब द्रौपदीको सभामें लाया जा रहा था तब इसने कहा था "यह अन्याय है!" युद्धमें यह नकुलसे पराजित हुवा और भीमसे मारा गया। गीता अ० १. श्लो० ८-सौमदत्ति- यह सोमदत्तका पुत्र। इसका वास्तविक नाम भूरिश्रवा। यह अत्यंत पराक्रमी था। महाभारत युद्धमें इसने सात्यकीको पराजित किया था। अर्जुनने सात्यकीको इसके हाथसे बचानेके लिये भूरिश्रवाके हाथ तोडे। तब भूरिश्रवाका कहना था अर्जुनने उनके साथ अन्याय किया। अन्यायके प्रतिकार के लिये इसने टूटा हुवा हाथ अर्जुनकी ओर फेंक दिया और सात्यकीने इसका सिर उडाया। यह अग्निहोत्री था। इसने सात्यकीके दस पुत्र मारे थे संभवतः इसीलिये सात्यकीको इस पर इतना क्रोध था। ज्ञानेश्वरी २६