ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीता अ० १. श्लो० १४-माधव-
कृष्ण । वृष्णि कुलका यादव । बापका नाम वसुदेव । माताका देवकी । माता पिता अब कंसके बंदिगृहमें थे तब इसका जन्म हुवा । कृष्णका पिता वसुदेव उग्रसेनका प्रधान मंत्री था । अत्यंत राजकारण पटु । मुत्सैद् ! इसलिये इस पर कंसकी नज़र थी । बापको बंदी बनाकर कंसने राज्य- पद पाते ही इसको भी बंदी बना दिया । कंसके भयसे कृष्ण जन्म होते ही इसे गोकुलमें भेज दिया तथा नंदके घर जनमी हुई लड़की यहां लायी गयी । कंस इस बच्चीको मारने गया किंतु वह उस बच्चीको नहीं मार सका । कंसने बाल्यावस्थामें ही कृष्णको मार डालनेके लिये अनेक प्रयास किये जो व्यर्थ गये । नंद कृष्ण-जन्मसे अत्यंत प्रसन्न था । नंद, कंसका आधीन राजा था । कृष्णने गोकुलके बालकोंमें नया प्राण फूंक दिया । बचपनसे ही या स्वभावसे ही वे चतुर संघटक थे । खेलकूदमें बच्चोंके नेता बनकर उनको प्रोत्साहन और प्रेरणा देते रहते थे । वे अतुल बलशाली और धैर्यशाली थे । हर संकटके समय आगे बढ़कर संकटोंसे जूझते थे । संकटोंपर विजय पाते थे । इसलिये सारे गोप गोपियां इनके आधीन रहे । जब कृष्ण और बलराम-कृष्णके बड़े भाई-कौमार्यावस्थासे तारुण्यमें पदार्पण करने लगे तब कंसने धनुर्यागमें उनको निमंत्रित किया और उन्हे लानेके लिये अक्रूरको भेजा । नंद कंसके आधीन होनेसे ना नहीं कह सकते थे । अक्रूरके साथ कृष्ण बलराम मथुरा आये । मथुरामें सबने इन युवकोंका स्वागत किया । इससे कंस संतप्त हुवा । कृष्णने शस्त्रागारके एक भव्य धनुष्यको झुकानेके प्रयासमें तोड दिया । उत्सवमें कंसने कृष्ण बलरामसे चाणूर-मुष्टिकको कुश्ती खेलनेको कहा । कृष्ण बलराम जब मल्लशालाकी ओर बढ़ने लगे तब एक मस्त हाथी भड़काकर उन पर डाला गया । उस हाथीका नाम था कुवलयापीड़ । मल्लशालाके दरवाजे पर आते आते हाथी सामने आया और कृष्णने उसका प्रतिकार करके उसको मार डाला । कृष्ण बलरामने चाणूर मुष्टिकको कुश्तीमें ऐसे दबोचा कि बेचारे उठ भी नहीं पाये । इसके बाद, तोषलक कृष्णसे लड़ने आया और एक ही झटकेमें समाप्त हो गया । यह देख कर दूसरे मल्ल भाग गये और कृष्ण कंसकी ओर बढे । कृष्णने कंसके दरबारमें, उसीको सिंहासनपरसे नीचे खींच कर केवल मुष्टि-प्रहारसे ही मार डाला । इस भरे दरबारमें "सुनाभ" नामक कंसके एक अंग रक्षकके अलावा और कोई भी उसको बचाने आगे नहीं आया और कृष्णने सुनामको भी कंसके साथ परलोक दिखाया । इसके बाद बलराम-कृष्णका उपनयन संस्कार हुवा और ये दोनों विद्याध्ययनके लिये अवंतीकाके पास सांदीपनी आश्रममें भेज दिये गये । वहां वे शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखे । ये इतने बुद्धि-शाली थे कि जो बात इनके सामने आती तुरंत सीख लेते थे । ये गुरुकुलमें केवल ६४ दिन रहे । और, यहां कंसवधके बाद कंसकी पत्नियोंसे यह बात जरासंध तक गयी । कंस जरासंधका जामात था । जरासंधने कंसकी शक्ति देख कर अपनी दो पुत्रियां अस्ति और प्राप्ति कंसको देकर विवाह कर दिया था । अपने श्वशुरकी प्रेरणासे ही वह राजा बन बैठा था । जरासंध अत्यंत शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी राजा था । अपनी पुत्रियोंसे अपने पतिके वधकी बात सुनते ही अपनी प्रचंड सेनाके साथ मथुरा पर चढ़ आया । उनके साथ उनके आधीन राजा भी थे । मथुराके चारों दरवाजों पर जरासंधकी सेनाएं जम गयीं । दक्षिणमें दरद, चेदिराज और वह स्वयं
११ परिशिष्ट १.